azdaad-e Khudaaii-13-24-dwarka das sho’la

اضدادِ  خدائی  ۔  منتخب  اشعار  (۱۳۔۲۳)  ۔  دوارکا  داس  شعلہؔ

۱۳

ہم  تو  مر  جائیں  گے  لے  لے  کے  ترا  نام  مگر

اے  خُدا  یہ  تو  بتا  تجھ  کو  خبر  بھی  ہوگی

۱۴

خدا  کے  فضل  سے  انساں  ہے  اشرف  المخلوق

خُدا  کا  فضل،  اُسے  اختیار  کچھ  بھی  نہیں

۱۵

نُزُولِ  رحمتِ  پروردگار  کے  جُویا

نُزُولِ  رحمتِ  پروردگار  کچھ  بھی  نہیں

۱۶

حشر  میں  داد  چاہنے  والے

گر  وہاں  بھی  یہی  خدا  نکلا

۱۷

آستانۂ  کعبہ  پوجوں  گا  نہ  بُت  خانے  کے  بُت

مجھ  کو  دونوں  ایک  سے  ہیں  کعبہ  کیا  بتخانہ  کیا

۱۸

پنڈت  و  مولوی  و  شیخ  و  برہمن  جھوٹے

یوں  کہ  سب  دین  کے  رکھتے  ہیں  حسابات  غلط

۱۹

تاکہ  معصوموں  پہ  قائم  رہے  اِن  کا  سکّہ

پیش  کرتے  ہیں  بزرگوں  کے  روایات  غلط

۲۰

غمِ  زندگی،  نالۂ  صبحگاہی،  مرے  شیخ  صاحب  کی  واہی  تباہی

اگر  ان  کے  ہوتے  وجودِ  الہٰی  حقیقت  نہیں  ہے  تو  پھر  اور  کیا  ہے

۲۱

رہتے  ہیں  خسارے  میں  بہ  ہر  کیف  و  بہ  ہرکار

ہاں  وہ  جو  سمجھتے  ہیں  ہمارا  بھی  خدا  ہے

۲۲

ترے  اختیار  میں  اے  خُدا  کوئی  شک  نہیں  ہے  مجھے  مگر

مرے  اختیار  میں  کچھ  نہیں  ترے  اختیار  کو  کیا  کروں

۲۳

وہ  میرے  عمل  ہی  کا  پابند  ہے

تو  بندہ  نوازی  کی  صورت  ہی  کیا

 

دوارکا  داس  شعلہؔ  (۱۹۱۰۔۱۹۸۳)  کا  تعلق  پہلے  لاہور  اور  پھر  پنجاب  اور  دہلی  سے  رہا۔  انہوں  نے  اردو  اس  لیے  سیکھنا  شروع  کی  کہ  انہیں  اپنے  آس  پاس  کے  ‘اردو  والے’  اور  ان  کا  انداز  پسند  تھا۔  ان  کی  باقاعدہ  تعلیم  صرف  آٹھویں  جماعت  تک  ہو  سکی،  کیونکہ  ان  کے  والد  نے  انہیں  خاندانی  دوائی  کے  کاروبار  میں  لگا  دیا  تھا۔  کہتے  ہیں  کہ  جب  وہ  دکان  پر  شیشیاں  اور  بوتلیں  دھوتے  تھے،  تو  ساتھ  ساتھ  اشعار  گنگناتے  رہتے  تھے،  اور  جلد  ہی  وہ  خود  اپنے  اشعار  گنگنانے  لگے۔  انہوں  نے  حفیظ  جالندھری  کو  اپنا  استاد  بنایا۔  وہ  کہتے  تھے  کہ  ان  کی  حفیظ  صاحب  سے  خوب  جمتی  تھی،  کیونکہ  حفیظ  صاحب  بھی  ان  ہی  کی  طرح  زیادہ  پڑھے  لکھے  نہیں  تھے  اور  پنجابی  میں  بات  کرتے  تھے۔  انہیں  وراثت  میں  دوا  سازی  (فارمیسی)  کا  کاروبار  ملا  تھا،  جسے  انہوں  نے  اتنی  ترقی  دی  کہ  ۱۹۴۲  کی  ‘انڈیا  ٹریڈ  ڈائریکٹری’  میں  ان  کا  نام  شامل  ہوا۔  ۱۹۴۷  میں  دہلی  ہجرت  کرنے  کے  بعد  بھی  انہوں  نے  اپنا  یہ  کاروبار  جاری  رکھا۔  وہ  یاسؔ  یگانہؔ  چنگیزی  کے  بھی  بہت  قریب  رہے،  اگرچہ  باقاعدہ  طور  پر  ان  کے  شاگرد  نہیں  تھے۔    یہ  اُن  کے  وہ  اشعار  کا  مجموع  ہے  جو  ‘اضدادِ  خدائی’  یعنی  خدا  کے  تصور  کے  حوالے  سے  تضادات  اور  الٹ  پھیر  کی  عکاسی  کرتے  ہیں۔

۱۳

ہم  تو  مر  جائیں  گے  لے  لے  کے  ترا  نام  مگر

اے  خُدا  یہ  تو  بتا  تجھ  کو  خبر۱  بھی  ہوگی

 

۱۔معلومات،  پتہ  لگنا

 

ہم  زندگی  بھر  تیری  عبادت  کرتے  ہوئے،  تیرا  نام  جپتے  جپتے  مر  تو  جائیں  گے،  لیکن  اے  اللہ!  سچ  تو  بتا،  کیا  تجھے  اس  بات  کا  پتہ  بھی  چلے  گا؟  (یعنی  کیا  ہماری  پکار  تجھ  تک  پہنچتی  بھی  ہے  یا  ہم  بس  خالی  دیواروں  سے  باتیں  کر  رہے  ہیں؟)

۱۴

خدا  کے  فضل  سے  انساں  ہے  اشرف۱  المخلوق۲

خُدا  کا  فضل۳،  اُسے  اختیار  کچھ  بھی  نہیں

 

۱۔افضل،  superior    ۲۔خلقت،  creation    ۳۔مہربانی،   benevolence

 

اللہ  کی  مہربانی  (فضل)  دیکھیے  کہ  اس  نے  انسان  کو  ‘اشرف  المخلوق’  (سب  سے  افضل)  بنایا،  مگر  طنز  یہ  ہے  کہ  اسی  فضل  کی  وجہ  سے  انسان  کے  پاس  اپنی  مرضی  سے  کچھ  کرنے  کی  طاقت  ہی  نہیں  چھوڑی۔  (یعنی  یہ  کیسی  برتری  ہے  جہاں  انسان  بس  ایک  کٹھ  پتلی  ہے؟)

۱۵

نُزُولِ۱  رحمتِ  پروردگار  کے  جُویا۲

نُزُولِ  رحمتِ  پروردگار  کچھ  بھی  نہیں

 

۱۔اُترنا،  آسمان  سے  اُترنا  ۲۔ڈھونڈنے  والا

 

اے  وہ  شخص  جو  خدا  کی  رحمت  کے  نازل  ہونے  کا  انتظار  کر  رہا  ہے  یا  اسے  ڈھونڈ  رہا  ہے،  سن  لے  کہ  ‘خدا  کی  رحمت’  نام  کی  کوئی  چیز  حقیقت  میں  ہے  ہی  نہیں۔

۱۶

حشر۱  میں  داد۲  چاہنے  والے

گر  وہاں  بھی  یہی  خدا  نکلا

 

۱۔قیامت  کے  دن  کا  اِنصاف  ۲۔اِنعام،  اِنصاف

 

اے  وہ  لوگو  جو  قیامت  کے  دن  انعامات  اور  انصاف  کی  امید  لگائے  بیٹھے  ہو،  ذرا  سوچو  کہ  اگر  وہاں  بھی  وہی  خدا  نکلا  جس  کا  تجربہ  ہمیں  اس  دنیا  میں  ہوا  ہے  (جہاں  دکھ  اور  بے  بسی  ہے)،  تو  پھر  وہاں  بھی  خیر  کی  کیا  امید  رکھ  رہے  ہو؟  ہری  چند  اخترؔ  کا  کہنا  ہے  ۔۔۔

بھروسہ  کِس  قدر  ہے  تجھ  کو  اَخْتَر  اُس  کی  رحمت  پر
اگر  وہ  شیخ  صاحب  کا  خدا  نکلا  تو  کیا  ہو  گا

۱۷

آستانۂ۱  کعبہ  پُوجُوں  گا  نہ  بُت  خانے  کے  بُت

مجھ  کو  دونوں  ایک  سے  ہیں  کعبہ  کیا  بتخانہ  کیا

 

۱۔چوکھٹ،  در

 

میں  نہ  تو  کعبہ  کی  چوکھٹ  پر  سجدہ  کروں  گا  اور  نہ  مندر  کے  بتوں  کے  آگے  جھکوں  گا۔  میرے  لیے  دونوں  ایک  برابر  (بے  معنی)  ہیں۔  اکثر  شعراء  کہتے  ہیں  کہ  دونوں  جگہ  خدا  ملتا  ہے،  اس  لیے  دونوں  کا  احترام  کرتے  ہیں،  مگر  شعلہ  کہتا  ہے  کہ  دونوں  میں  کچھ  نہیں،  اس  لیے  میں  کہیں  نہیں  جاتا۔

۱۸

پنڈت  و  مولوی  و  شیخ  و  برہمن  جھوٹے

یوں  کہ  سب  دین  کے  رکھتے  ہیں  حِسابات  غلط

 

یہ  تمام  مذہبی  عالم  اور  پیشوا  جھوٹ  بولتے  ہیں،  کیونکہ  یہ  سب  اپنے  اپنے  دین  کو  سچا  اور  دوسرے  کو  غلط  ثابت  کرنے  کے  لیے  غلط  حساب  کتاب  (منطق)  پیش  کرتے  ہیں۔  جب  ہر  کوئی  دوسرے  کو  جھوٹا  کہہ  رہا  ہے،  تو  پھر  سبھی  جھوٹے  ہیں۔

۱۹

تاکہ  معصوموں  پہ  قائم  رہے  اِن  کا  سکّہ

پیش  کرتے  ہیں  بزرگوں  کے  روایات  غلط

 

یہ  مذہبی  لوگ  صرف  اس  لیے  غلط  اور  من  گھڑت  روایات  (بزرگوں  کے  قصے)  سناتے  ہیں  تاکہ  عام  اور  بھولے  بھالے  لوگوں  پر  اپنا  رعب  اور  دھاک  جما  سکیں  اور  انہیں  اپنے  قابو  میں  رکھ  سکیں۔

۲۰

غمِ  زندگی،  نالۂ  صبحگاہی۱،  مرے  شیخ  صاحب  کی  واہی  تباہی۲

اگر  ان  کے  ہوتے  وجودِ  الہٰی  حقیقت  نہیں  ہے  تو  پھر  اور  کیا  ہے

 

۱۔صبح  صبح  کا  نالہ/شور  ۲۔بکواس،  بیوقوفی  کے  بول

 

زندگی  کی  تکلیفیں،  صبح  صبح  کی  عبادتوں  کا  شور  (جو  نیند  خراب  کرے)،  اور  شیخ  صاحب  کی  فضول  باتیں؛  اگر  ان  سب  چیزوں  کی  موجودگی  کے  باوجود  مجھے  ‘خدا’  کو  ایک  حقیقت  ماننا  پڑ  رہا  ہے،  تو  پھر  یہ  زبردستی  کی  حقیقت  ہی  ہے،  کوئی  خوشی  کا  سودا  نہیں  ہے۔  (شاعر  ان  سب  چیزوں  کو  ایک  ہی  زمرے  میں  رکھ  رہا  ہے  جو  اسے  تنگ  کرتی  ہیں)۔    داغ  دہلوی  نے  کہا  ۔۔۔

دی  شبِ  وصل  موذن  نے  اذاں  پچھلی  رات

ہاے  کم  بخت  کو  کِس  وقت  خدا  یاد  آیا

۲۱

رہتے  ہیں  خسارے۱  میں  بہ  ہر  کیف  و  بہ  ہرکار۲

ہاں  وہ  جو  سمجھتے  ہیں  ہمارا  بھی  خدا  ہے

 

۱۔نقسان  ۲۔ہر  صورت  میں،  ہر  حال  میں

 

وہ  لوگ  جو  یہ  سمجھتے  ہیں  کہ  ان  کا  کوئی  خدا  ہے  جو  ان  کی  مدد  کرے  گا،  وہ  زندگی  کے  ہر  موڑ  پر  اور  ہر  کام  میں  نقصان  (گھاٹے)  میں  رہتے  ہیں۔  وہ  خدا  کے  بھروسے  بیٹھے  رہتے  ہیں  اور  عملی  طور  پر  کچھ  حاصل  نہیں  کر  پاتے۔  مرزا  غالب  نے  کہا  ہے  ۔۔۔

زندگی  اپنی  جب  اس  شکل  سے  گزری  غالبؔ

ہم  بھی  کیا  یاد  رکھیں  گے  کہ  خدا  رکھتے  تھے

۲۲

ترے  اختیار۱  میں  اے  خُدا  کوئی  شک  نہیں  ہے  مجھے  مگر

مرے  اختیار  میں  کچھ  نہیں  ترے  اختیار  کو  کیا  کروں

 

۱۔مرضی

 

اے  خدا!  مجھے  اس  میں  کوئی  شک  نہیں  کہ  ساری  طاقت  تیرے  پاس  ہے،  لیکن  جب  میرے  پاس  اپنی  مرضی  سے  کچھ  کرنے  کا  اختیار  ہی  نہیں،  تو  میں  تیری  اس  طاقت  کا  اچار  ڈالوں؟  (یعنی  جب  میں  بے  بس  ہوں  تو  تیری  طاقت  میرے  کس  کام  کی؟)

۲۳

وہ  میرے  عمل۱  ہی  کا  پابند۲  ہے

تو  بندہ  نوازی۳  کی  صورت  ہی  کیا

 

۱۔کام،  کار،  فعل  ۲۔مجبور  ۳۔بندہ  پروری،  مہربانی

 

اگر  خدا  نے  یہ  قانون  بنا  رکھا  ہے  کہ  وہ  صرف  اچھے  عمل  پر  جزا  اور  برے  پر  سزا  دے  گا،  تو  پھر  وہ  اپنے  قانون  کا  قیدی  (پابند)  ہوا۔  اگر  وہ  صرف  میرے  عمل  کے  حساب  سے  چل  رہا  ہے،  تو  پھر  اس  کی  اپنی  ‘مہربانی’  یا  ‘بندہ  نوازی’  کہاں  گئی؟  وہ  تو  بس  ایک  منشی  یا  اکاؤنٹنٹ  بن  کر  رہ  گیا۔

 

अज़्दाद-ए ख़ुदाई-मुंतख़ब अश’आर (१३-२३) – द्वारका दास शो’ला

१३

हम तो मर जाएंगे ले ले के तेरा नाम मगर

अए ख़ुदा ये तो बता तुझ को ख़बर भी होगी

१४

ख़ुदा के फ़ज़्ल से इंसां है अश्रफ़-उल-मख़्लूक़

ख़ुदा का फ़ज़्ल, उसे एख़्तियार कुछ भी नहीं

१५

नुज़ूल-ए रहमत-ए परबरदिगार के जूया

नुज़ूल-ए रहम-ए परवरदिगार कुछ भी नहीं

१६

हश्र में दाद चाहने वाले

गर वहां यही ख़ुदा निकला

१७

आस्ताना-ए का’बा पूजूंगा न बुत-ख़ाने के बुत

मुझ को दोनों एक से हैं का’बा क्या, बुत-ख़ाना क्या

१८

पंडित ओ मौलवी ओ शैख़ ओ बरहमन झूटे

यूं के सब दीन के रखते हैं हिसाबात ग़लत

१९

ता के मासूमौं पे क़ा’एम रहे इन का सिक्का

पेश करते हैं बुज़ुर्गौं के रिवायात ग़लत

२०

ग़म-ए ज़िन्दगी, नाला-ए सुबहगाही, मेरे शैख़ साहब कि वाही-तबाही

अगर इन के होते वुजूद-ए इलाही हक़ीक़त नहीं है तो फिर और क्या है

२१

रहते हैं ख़सारे में ब-हर कैफ़ ओ ब-हर कार

हां जो समझते हैं हमारा भी ख़ुदा है

२२

तेरे एख़्तियार में अए ख़ुदा कोई शक नहीं है मुझे मगर

मेरे एख़्तियार में कुछ नहीं तेरे एख़्तियार को क्या करूं

२३

वो मेरे अमल की का पाबंद है

तो बन्दा-नवाज़ी कि सूरत हि क्या

 

द्वारका दास शोला (१९१०-१९८३) लाहौर, पंजाब और देहली। उन्होंने उर्दू इसलिए सीखना शुरू की के उन्हें अपने आस-पास के ‘उर्दू वाले’ लोग और उनका लहजा बहुत पसंद था। उनकी स्कूली पढ़ाई सिर्फ़ आठवीं क्लास तक ही हो पाई, क्यूंके उनके पिता ने उन्हें ख़ानदानी दवाई के कारोबार में लगा दिया।  दुकान पर शीशियां और बोतलें धोते-धोते वो अक्सर दूसरों के शे’र गुनगुनाते रहते थे, और जल्द ही उन पर ख़ुद अपने शे’र उतरने लगे। उन्होंने हफ़ीज़ जालंधरी को अपना उस्ताद बनाया। वो कहते थे के हफ़ीज़ से उनकी ख़ूब पटती थी, क्यूंके हफ़ीज़ भी उन्हीं की तरह ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे और अक्सर पंजाबी में बात करते थे।

उन्हें विरासत में दवाइयों (फ़ार्मेसी) का कारोबार मिला था, जिसे उन्होंने इतनी तरक़्क़ी दी के १९४२ की ‘इंडिया ट्रेड डायरेक्टरी’ में उनका नाम शामिल हुआ। १९४७ में दिल्ली आने के बाद भी उन्होंने अपना काम जारी रखा। वो यास यगाना चंगेज़ी के भी बहुत क़रीब रहे, हालांके वो उनके बाक़ा’एदा शागिर्द नहीं थे।  यहां उनके वो अश’आर जमा’ किये गए हैं जो ‘अज़्दाद-ए ख़ुदाई’ यानी ख़ुदा के तसव्वुर (concept) में मौजूद विरोधाभास और उलझनों को दिखाते हैं।

१३

हम तो मर जाएंगे ले ले के तेरा नाम मगर

अए ख़ुदा ये तो बता तुझ को ख़बर भी होगी

 

१-मालूम होना, पता चलना

 

हम तो पूरी ज़िंदगी तेरा नाम जपते-जपते जान दे देंगे, लेकिन अए भगवान, सच-सच बताना, क्या तुझे इस बात की भनक भी लगेगी? (मतलब, क्या हमारी प्रार्थना तुझ तक पहुँचती भी है या हम बस हवा में बातें कर रहे हैं?)

१४

ख़ुदा के फ़ज़्ल से इंसां है अश्रफ़-उल-मख़्लूक़

ख़ुदा का फ़ज़्ल, उसे एख़्तियार कुछ भी नहीं

 

१-मेहरबानी, दया २-सब से ऊंचा, हर चीज़ पे हक़्दार ३-जीव-जन्तू ४-ज़ोर

 

ऊपर वाले की ‘मेहरबानी’ (फ़ज़्ल) तो देखो कि उसने इंसान को सारी दुनिया का राजा (अश्रफ़-उल-मख़्लूक़) बना दिया, पर मज़ाक ये है कि उसी मेहरबानी की वजह से इंसान के हाथ में अपनी मर्जी चलाने की कोई ताक़त ही नहीं छोड़ी। (मतलब, ये कैसी इज़्ज़त है जहाँ हम अपनी मर्ज़ी से एक पत्ता भी नहीं हिला सकते?)

१५

नुज़ूल-ए रहमत-ए परवरदिगार के जूया

नुज़ूल-ए रहम-ए परवरदिगार कुछ भी नहीं

 

१-आसमान से उतरना २-दया ३-भगवान ४-ढूंडने वाला, इच्छुक

 

अए वो इंसान जो भगवान की दया या रहमत के बरसने का इंतेज़ार कर रहा है, कान खोलकर सुन ले—’भगवान की रहमत’ जैसा असल में कुछ होता ही नहीं है।

१६

हश्र में दाद चाहने वाले

गर वहां यही ख़ुदा निकला

 

१-क़यामत, महा-प्रलय २-इनाम, न्याय

 

ओ क़यामत के दिन इनाम और न्याय की उम्मीद रखने वाले! ज़रा सोच, अगर वहां भी वही भगवान निकला जिससे हमारा पाला इस दुनिया में पड़ा है (जहाँ बस दुख और बेबसी मिली), तो फिर वहां भी तुझे क्या नया मिल जाएगा? हरी चंद अख़्तर का कहना है —

भरोसा किस क़दर है तुझ को अख़्तर उस की रहमत पर

अगर वो शैख़ साहब का ख़ुदा निकला तो क्या होगा

१७

आस्ताना-ए का’बा पूजूंगा न बुत-ख़ाने के बुत

मुझ को दोनों एक से हैं का’बा क्या, बुत-ख़ाना क्या

 

१-चौखट, द्वार २-मंदिर ३-मूर्ती

 

न तो मैं का’बा की चौखट पर माथा टेकूँगा और न ही मंदिर के बुतों के आगे झुकूँगा। मेरे लिये दोनों एक जैसे (बेकार) हैं। दूसरे कवि कहते हैं के दोनों जगह भगवान है, इसलिये वे दोनों की इज़्ज़त करते हैं, पर शो’ला कहता है के दोनों जगह कुछ नहीं है, इसलिए मैं कहीं नहीं जाता।

१८

पंडित ओ मौलवी ओ शैख़ ओ बरहमन झूटे

यूं के सब दीन के रखते हैं हिसाबात ग़लत

 

१-धर्म, मज़्हब

 

ये सारे पंडित, मौलवी और धर्म-गुरु झूठे हैं। ये सब अपने धर्म को सही और दूसरे को ग़लत साबित करने के लिये बड़े-बड़े और बेकार के तर्क (logic) देते हैं। जब सब एक-दूसरे को ग़लत कह रहे हैं, तो ज़ाहिर है के सब के सब ग़लत हैं।

१९

ता के मासूमौं पे क़ा’एम रहे इन का सिक्का

पेश करते हैं बुज़ुर्गौं के रिवायात ग़लत

 

१-सीधे साधे २-स्थापित, बैठा देना ३-उपस्थित करना ४-पूर्वज ५-परंपरा

 

ये लोग सिर्फ़ इसलिये हमारे पूर्वजों की बातों और कहानियों को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं ताकि हम जैसे मासूम लोगों पर अपना दबदबा और डर बनाए रख सकें।

२०

ग़म-ए ज़िन्दगी, नाला-ए सुबहगाही, मेरे शैख़ साहब कि वाही-तबाही

अगर इन के होते वुजूद-ए इलाही हक़ीक़त नहीं है तो फिर और क्या है

 

१-शोर २-भोर, सुब्ह-सुब्ह ३-बक्वास, अंट-शंट ४-होना, अस्तित्व ५-वास्तविक

 

ज़िंदगी की मुसीबतें, सुब्ह-सुब्ह की अज़ान/इबादत का शोर (जिससे नींद खुल जाए) और इन धर्म गुरुओं की बकवास; अगर इन सब परेशानियों के बाद भी मुझे भगवान के होने को ‘सच’ मानना पड़ रहा है, तो ये सच नहीं बल्के एक ज़बरदस्ती का बोझ है।  दाग़ देहलवी ने कहा है —

दी शब-ए वस्ल मो’अज़्ज़िन ने अज़ाँ पिछली रात

हाए कम-बख़्त को किस वक़्त ख़ुदा याद आया

२१

रहते हैं ख़सारे में ब-हर कैफ़ ओ ब-हर कार

हां जो समझते हैं हमारा भी ख़ुदा है

 

१-नुक़्सान, घाटा २-हर हाल में

 

वो लोग जो इस भरोसे बैठे रहते हैं के कोई भगवान उनकी मदद करेगा, वो ज़िंदगी के हर काम और हर मोड़ पर घाटे (नुक़्सान) में ही रहते हैं। क्यूंके वो भगवान के भरोसे अपनी मेहनत छोड़ देते हैं और हाथ कुछ नहीं आता।  ग़ालिब ने कहा —

ज़िन्दगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़्री ग़ालिब

हम भी क्या याद करेंगे के ख़ुदा रखते थे

२२

तेरे एख़्तियार में अए ख़ुदा कोई शक नहीं है मुझे मगर

मेरे एख़्तियार में कुछ नहीं तेरे एख़्तियार को क्या करूं

 

१-बल, इरादा, ताक़त २-शंका, संदेह

 

अए भगवान! मुझे पता है कि तू बहुत ताक़तवर है, पर जब मेरे ख़ुद के हाथ में कोई बल नहीं है, तो तेरे उस एख़्तियार का मैं क्या करूँ? (मतलब, जब मैं ख़ुद कुछ बदल ही नहीं सकता, तो तेरी महानता मेरे किस काम की?)

२३

वो मेरे अमल की का पाबंद है

तो बन्दा-नवाज़ी कि सूरत हि क्या

 

१-काम २-मज्बूर ३-भक्त पर दया ४-तरीक़ा

 

अगर भगवान ने ये नियम बना रखा है के वो सिर्फ़ अच्छे काम पर इनाम और बुरे पर सज़ा देगा, तो फिर वो अपनी ही बनाई जेल का क़ैदी बन गया। अगर उसे सिर्फ़ मेरे काम (amal) के हिसाब से ही चलना है, तो फिर उसकी अपनी ‘मेहरबानी’ (banda-navaazi) कहाँ गई? वो तो बस एक हिसाब रखने वाला मुंशी बन गया।

 

azdaad-e Khudaa’ii-muntaKhab ash’aar (13-23)-dwarka das sho’la
13
ham to mar jaa’eNge le le ke tera naam magar
aye Khuda ye to bata tujh ko Khabar bhi hogi
14
Khuda ke fazl se insaaN hai ashraf-ul-maKhluuq
Khuda ka fazl, us’e eKhtiyaar kuchh bhi nahiiN
15
nuzool-e rahmat-e parvardigaar ke juuya
nuzool-e rahmat-e parvardigaar kuchh bhi nahiiN
16
hashr meN daad chaahne vaale
gar vahaaN yahi Khuda nikla
17
aastaana-e k’aaba poojuuNga na but-Khaane ke but
mujh ko donoN aek se haiN, k’aaba kya, but-Khaana kya
18
panDit o maulvi o shaiKh o barhaman jhooTe
yuN keh sab diin ke rakhte haiN hisaabaat Ghalat
19
taa-keh maasuumoN pe qaa’em rahe in ka sikka
pesh karte haiN buzurgoN ke rivaayaat7 Ghalat
20
Gham-e-zindagi, naala-e-sub’h-gaahi, mer’e shaiKh saahib ki vaahi-tabaahi
agar in ke hot’e vujood-e-ilaahi, haqiiqat nahiiN hai to phir aur kya hai
21
rahte haiN Khasaare meN ba-har-kaif o ba-har-kaar
haaN jo samajhte haiN hamaara bhi Khuda hai
22
tere eKhtiyaar meN aye Khuda koii shak nahiN hai mujh’e magar
mere eKhtiyaar meN kuchh nahiN, tere eKhtiyaar ko kya karuN
23
vo mer’e amal hii ka paaband hai
to banda-navaazi ki suurat hi kya

dwarka das sho’la (1910-1983), lahore and later punjab and dehli.  He started learning urdu because he liked ‘urdu-vaale’ around him.  He received formal schooling only up to 8th grade because his father recruited him in the family business.  While washing bottles/vials he kept humming ash’aar and soon his own ash’aar began occouring to him naturally.  He sought out hafiz jalandhari to be his ustaad.  He says they clicked because hafiz jaalandhari was equally unschooled and talked in panjabi.  He inherited the family pharmacy business and grew it enough to get a mention in Who’s Who, India Trade Directory, 1942 and continued the business after the family’s move to dehli in 1947.  He grew very close to yaas yagaana chaNgezi without formally being his shaagird.  This is a collection of his ash’aar reflecting the ‘azdaad’ – anamolies and contraditions about the concept of god.
13
ham to mar jaa’eNge le le ke tera naam magar
aye Khuda ye to bata tujh ko Khabar1 bhi hogi

1.awareness, knowledge

We may die chanting your name (praying to you) but, O god, tell me will you even know.
14
Khuda ke fazl1 se insaaN hai ashraf-ul-maKhluuq2
Khuda ka fazl, us’e eKhtiyaar3 kuchh bhi nahiiN

1.benevolence 2.noblest of all creation 3.free will

Because of divine benevolence, human beings are the noblest of all creatures.  Because of divine benevolence (this could be a sarcastic expression), they don’t have any free will.
15
nuzool1-e rahmat2-e parvardigaar3 ke juuya4
nuzool-e rahmat-e parvardigaar5 kuchh bhi nahiiN

1.descent, arrival 2.kindness 3.god 4.seeker 5.god

O you, who seek, the descent of the kindness of god, there is no such thing as ‘kindness of god’.
16
hashr1 meN daad2 chaahne vaale
gar3 vahaaN yahi Khuda nikla

1.judgement day 2.recompense, reward 3.if

O you, who seek rewards on judgement, what if the same god turns up there i.e., the experience with god in this world has not been very good, why would you expect anything different on judgement day.  Says hari chand aKhtar …
bharosa kis qadar hai tujh ko aKhtar us ki rahmat par
agar vo shaiKh saahib ka Khuda nikla to kya hoga
17
aastaana1-e k’aaba poojuuNga2 na but-Khaane3 ke but4
mujh ko donoN aek se haiN, k’aaba kya, but-Khaana kya

1.threshold 2.worship 3.idol-house, temple 4.idols

I will neither worship at the threshold of the k’aaba nor before the idols of the temple.  Both the k’aaba and the temple are the same for me.  Many other poets who also say that both are the same, are happy to offer prayers/worship at both.  This poet chooses neither.
18
panDit1 o maulvi2 o shaiKh3 o barhaman4 jhooTe
yuN keh sab diin5 ke rakhte haiN hisaabaat6 Ghalat

1.hindu scholar 2.muslim scholar 3.muslim preacher 4.hindu preacher 5.faith 6.reckoning, accounting

muslim and hindu scholars and preachers are all liars because they reckon (and say) that other faiths are wrong – thus they are all wrong, each stating/proving the other wrong.
19
taa-keh1 maasuumoN2 pe qaa’em3 rahe in ka sikka4
pesh5 karte haiN buzurgoN6 ke rivaayaat7 Ghalat

1.so that 2.innocents, simpletons 3.established 4.sikka qaa’em rahna is an expression meaning establish credibility/control 5.present, put forward 6.elders 7.sayings

So that they keep control over innocents/simpletons, they present the sayings/traditions of elders wrongly (distorted to serve their own ends).
20
Gham-e-zindagi1, naala-e-sub’h-gaahi2, mer’e shaiKh3 saahib ki vaahi-tabaahi4
agar in ke hot’e vujood-e-ilaahi5, haqiiqat6 nahiiN hai to phir aur kya hai

1.sorrow/pain/struggle of life 2.wailing/chanting at dawn 3.preacher 4.nonsense 5.existence of god 6.truth, reality

In playful interpretation, I might take naala-e sub’h gaahi to mean the call for prayer at dawn (waking the poet up from his sleep).  Recall daaGh dehlavi –
dii shab-e vasl mo’azzin ne azaaN pichhli raat
haa’e kambaKht to kis vaqt Khuda yaad aaya
.
The struggle for life, this early morning wakeup call, the nonsense of the shaiKh; with all this going on, if I do not acquiesce to accepting the existence of god as haqiiqat truth, what else can I do (or is he saying that vujood-e-ilaahi gives him the same irritability as all these others.
21
rahte haiN Khasaare1 meN ba-har-kaif2 o ba-har-kaar3
haaN jo samajhte haiN hamaara bhi Khuda hai

1.loss, short-changed 2.under all circumstances 3.in every action, in all aspects

Yes, those who think that they have a god are short-changed in all aspects of life and under all circumstances.  In every action/aspect of life means … intellectual as well as material.  They leave things in the ‘hands of god’ and do not achieve anything.  Said Ghalib …
zindagi apni jab iss shakl se guzri Ghalib
ham bhi kya yaad rakheNge ke Khuda rakht’e th’e

22
tere eKhtiyaar1 meN aye Khuda koii shak2 nahiN hai mujh’e magar3
mere eKhtiyaar meN kuchh nahiN, tere eKhtiyaar ko kya karuN

1.control, discretion, power 2.doubt 3.but

I have no doubt about your power O god, but, there is nothing in my power, so my belief in your power is also because of your power, not my choosing; so what can I do about your power!
23
vo mer’e amal1 hii ka paaband2 hai
to banda-navaazi3 ki suurat4 hi kya

1.action, deeds 2.bound, constrained 3.nurturing/cherishing the devotee, being kind 4.way, methodology

god is bound/constrained by the actions of human beings i.e., reward for good and punishment for bad actions.  Given this constraint what is the way in which he can show any banda-navaazi – cherishing/nurturing his devotees.  This is like saying that god cannot be banda-navaaz and powerful at the same time.  But really, it is making fun of the whole concept.