lahu ki zaat likhna-hardayal siNgh datta kaNval ziaa’ii

لہو  کی  ذات  لکھنا  ۔  ہردیال  سنگھ  دتّہ  کنولؔ  ضیائی

۱

کہاں  تک  بڑھ  گئی  ہے  بات  لکھنا

مرے  گاؤں  کے  سب  حالات  لکھنا

۲

جواں  بیٹوں  کی  لاشوں  کے  علاوہ

ملی  ہے  کون  سی  سوغات  لکھنا

۳

کوئی  سوتا  ہے  یا  سب  جاگتے  ہیں

وہاں  کٹتی  ہے  کیسے  رات  لکھنا

۴

لہو  دھرتی  میں  کتنا  بو  چکے  ہو

نئی  فصلوں  کی  بھی  اوقات  لکھنا

۵

کہاں  جلتا  رہا  دھرتی  کا  سینہ

کہاں  ہوتی  رہی  برسات  لکھنا

۶

ہماری  سر  زمیں  کس  رنگ  میں  ہے

وہاں  بہتے  لہو  کی  ذات  لکھنا

۷

میں  چھپ  کر  گھر  میں  آنا  چاہتا  ہوں

لگی  ہے  کس  گلی  میں  گھات  لکھنا

 

کنولؔ ضیائی۔ہردیال سنگھ دتّہ (۱۹۲۷۔۲۰۱۱) ۔ وہ سیالکوٹ میں پیدا ہوئے اور دہرادون میں وفات پائی۔ آزادی اور تقسیمِ ہند کے بعد وہ ہندوستان آ گئے اور انہوں نے  (Ministry of Relief and Rehabilitation)  میں کام کیا۔ جب یہ وزارت ختم کر دی گئی تو ان کا تبادلہ Ministry of Defence وزارتِ دفاع (Ministry of Defense)  میں ہو گیا، جہاں سے وہ ریٹائر ہوئے اور مستقل طور پر دہرادون میں بس گئے۔ ان کے کلام کے کم از کم دو مجموعے شائع ہو چکے ہیں۔ بعض سوانح میں انہیں مہر لال سونی ضیاؔ کا شاگرد بتایا گیا ہے، جنہیں خراجِِ عقیدت پیش کرنے کے لیے انہوں نے اپنے تخلُّص کے ساتھ ‘ضیائی’ کا اضافہ کیا۔ جبکہ کچھ دوسری جگہوں پر اُنہیں بال مکند عرشؔ ملسیانی کا شاگرد کہا گیا ہے۔

۱

کہاں  تک  بڑھ  گئی  ہے  بات  لکھنا

مرے  گاؤں  کے  سب  حالات  لکھنا

 

شاعر  پوچھ  رہا  ہے  کہ  حالات  کتنے  بگڑ  چکے  ہیں،  مجھے  سچ  سچ  بتانا۔  “گاؤں”  کا  ذکر  کر  کے  وہ  اس  بڑے  دکھ  کو  ایک  چھوٹی  اور  اپنی  سی  جگہ  سے  جوڑ  رہا  ہے۔  وہ  بڑی  بڑی  سیاست  کی  باتیں  نہیں  پوچھ  رہا،  بلکہ  اپنے  ان  لوگوں  کی  زمینی  حقیقت  اور  اپنے  اس  گھر  کا  حال  جاننا  چاہتا  ہے  جسے  وہ  بٹوارے  کے  وقت  پیچھے  چھوڑ  آیا  تھا۔

۲

جواں  بیٹوں  کی  لاشوں  کے  علاوہ

ملی  ہے  کون  سی  سوغات۱  لکھنا

 

۱۔تحفے

 

یہ  ایک  بہت  ہی  دردناک  اور  طنزیہ  شعر  ہے۔  شاعر  پوچھتا  ہے  کہ  “جوان  بیٹوں  کے  جنازوں  کے  علاوہ  اس  دور  (فسادات  اور  جنگوں)  نے  ہمیں  کون  سے  ‘تحفے’  (سوغات)  دیے  ہیں؟”  وہ  سیاست  کی  وجہ  سے  چھن  جانے  والی  جوان  زندگیوں  کے  دکھ  کی  طرف  اشارہ  کر  رہا  ہے۔  اس  کا  مطلب  یہ  ہے  کہ  لیڈروں  کے  تمام  وعدوں  کے  بدلے  میں  عام  آدمی  کو  صرف  موت  ہی  ملی  ہے۔  ساحر  لدھیانوی  نے  بھی  کہا  تھا۔۔۔

بہت  دنوں  سے  ہے  یہ  مشغلہ  سیاست  کا

کہ  جب  جوان  ہوں  بچے  تو  قتل  ہو  جائیں

۳

کوئی  سوتا  ہے  یا  سب  جاگتے  ہیں

وہاں  کٹتی  ہے  کیسے  رات  لکھنا

 

یہاں  شاعر  لوگوں  کے  دماغی  حال،  ان  کی  بے  چینی  اور  ڈر  کے  بارے  میں  پوچھ  رہا  ہے۔  “نیند”  کا  مطلب  امن  اور  سکون  ہے،  جبکہ  “جاگنے”  کا  مطلب  ڈر  اور  دکھ  ہے۔  وہ  جاننا  چاہتا  ہے  کہ  کیا  گاؤں  ابھی  تک  اس  “رات”  (یعنی  بُرے  وقت)  کے  خوف  تلے  دبا  ہوا  ہے،  اور  لوگ  ڈر  کے  ان  لمبے  گھنٹوں  کو  کیسے  گزارتے  ہیں۔

۴

لہو  دھرتی  میں  کتنا  بو۱  چکے  ہو

نئی  فصلوں  کی  بھی  اوقات  لکھنا

 

۱۔کاشت  کرنا،      sow,  plant

 

اس  شعر  میں  کھیتی  باڑی  کی  مثال  دی  گئی  ہے۔  شاعر  پوچھتا  ہے  کہ  تم  لوگوں  نے  زمین  میں  کتنا  خون  “بویا”  ہے؟  اور  پھر  پوچھتا  ہے  کہ  اس  خون  سے  جو  نئی  فصلیں  (یعنی  نئی  نسل  یا  نیا  دور)  پیدا  ہوں  گی،  ان  کی  کیا  “حیثیت”  ہوگی؟  وہ  آنے  والے  وقت  پر  سوال  اٹھا  رہا  ہے  کہ  اگر  بنیاد  ہی  خون  پر  رکھی  گئی  ہے،  تو  انجام  کتنا  زہریلا  ہوگا۔  ساحر  لدھیانوی  نے  کہا  تھا۔۔۔

جنگ  تو  خود  ہی  ایک  مسئلہ  ہے

جنگ  کیا  مسئلوں  کا  حل  دے  گی

آگ  اور  خون  آج  بخشے  گی

بھوک  اور  احتیاج  کل  دے  گی

۵

کہاں  جلتا  رہا  دھرتی  کا  سینہ

کہاں  ہوتی  رہی  برسات  لکھنا

 

شاعر  یہاں  دکھ  اور  امداد  کے  فرق  کو  دکھا  رہا  ہے۔  وہ  پوچھتا  ہے  کہ  زمین  کا  دل  کہاں  جلتا  رہا  (جہاں  تشدُّد  یا  آگ  تھی)  اور  “بارش”  (یعنی  مدد  یا  رحمت)  کہاں  برستی  رہی؟  یہ  حکومت  کی  اس  ناکامی  پر  طنز  ہے  کہ  جہاں  مدد  کی  سب  سے  زیادہ  ضرورت  تھی  وہاں  کچھ  نہ  پہنچا،  اور  امداد  اکثر  ان  جگہوں  کو  چھوڑ  دیتی  ہے  جہاں  سب  سے  زیادہ  درد  ہوتا  ہے۔

۶

ہماری  سرزمیں  کس  رنگ  میں  ہے

وہاں  بہتے  لہو  کی  ذات۱  لکھنا

 

۱۔فرقہ،  مذہب

 

وہ  پوچھتا  ہے  کہ  اب  ہمارے  وطن  کا  حال  (رنگ)  کیسا  ہے؟  اور  سب  سے  ضروری  بات  یہ  کہ  جو  خون  وہاں  بہہ  رہا  ہے،  اس  کی  “ذات”  یا  مذہب  کیا  ہے؟  یہ  فرقہ  وارانہ  جھگڑوں  کی  طرف  ایک  بہت  گہرا  اشارہ  ہے  ۔  یہ  دکھ  بتانا  کہ  لڑائی  میں  لوگ  “انسان”  کا  خون  دیکھنا  بھول  جاتے  ہیں  اور  اسے  مذہب  یا  برادری  کے  خانوں  میں  بانٹ  دیتے  ہیں،  جس  سے  صرف  نفرت  بڑھتی  ہے۔  ساحر  نے  کہا  ۔۔۔

خون  اپنا  ہو  یا  پرایا

نسلِ  آدم  کا  خوں  ہے  آخر

۷

میں  چھپ  کر  گھر  میں  آنا  چاہتا  ہوں

لگی  ہے  کس  گلی  میں  گھات۱  لکھنا

 

۱۔چال،  داؤ،  تاک

 

آخری  شعر  ایک  ایسے  شخص  کا  دکھ  دکھاتا  ہے  جسے  اپنا  گھر  چھوڑنا  پڑا۔  شاعر  اپنے  گھر  واپس  آنا  چاہتا  ہے،  لیکن  وہ  یہ  کام  صرف  چھپ  کر  ہی  کر  سکتا  ہے۔  وہ  ان  “گھاتوں”  (یعنی  چھپے  ہوئے  خطروں  اور  دشمنوں)  کا  پتا  پوچھ  رہا  ہے  جو  گلیوں  میں  اس  کا  انتظار  کر  رہی  ہیں۔  یہ  ایک  ایسے  گھر  کی  تصویر  ہے  جو  اب  ایک  جال  بن  چکا  ہے،  جہاں  اپنی  جڑوں  کی  طرف  لوٹنا  بھی  جان  لیوا  ہو  سکتا  ہے۔

 

लहू की ज़ात लिखना – हरदयाल सिंघ दत्ता कंवल ज़ियाई

कहाँ तक बढ़ गई है बात लिखना

मेरे गाँव के सब हालात लिखना

जवाँ बेटों की लाशों के अलावा

मिली है कौन सी सौग़ात लिखना

कोई सोता है या सब जागते हैं

वहाँ कटती है कैसे रात लिखना

लहू धरती में कितना बो चुके हो

नई फ़स्लों की भी औक़ात लिखना

कहाँ जलता रहा धरती का सीना

कहाँ होती रही बरसात लिखना

हमारी सर-ज़मीं किस रंग में है

वहाँ बहते लहू की ज़ात लिखना

मैं छुप कर घर में आना चाहता हूँ

लगी है किस गली में घात लिखना

 

कँवल ज़ियाई-हरदयाल सिंह दत्ता (१९२७-२०११)। उन का जन्म सियालकोट में हुआ और देहरादून में उनका देहांत हुआ। आज़ादी और बटवारे के बाद वो भारत आ गए और उन्होंने (Ministry of Relief and Rehabilitation) में नौकरी की। बाद में जब ये मंत्रालय ख़त्म कर दिया गया, तो उनका तबादला ‘रक्षा मंत्रालय’ (Ministry of Defense) में हो गया, जहाँ से वो रिटा’एर हुए और देहरादून में बस गए। उनकी शा’एरी के कम से कम दो संग्रह (किताबें) मौजूद हैं। कुछ जीवनियों में उन्हें मेहर लाल सोनी ज़िया का शागिर्द बताया गया है, जिन्हें सम्मान देने के लिये उन्होंने अपने तख़ल्लुस (उपनाम) के साथ ‘ज़ियाई’ जोड़ा था। वहीं कुछ दूसरी जगहों पर उन्हें बालमुकुंद अर्श मल्सियानी का शागिर्द कहा गया है।

कहाँ तक बढ़ गई है बात लिखना

मेरे गाँव के सब हालात लिखना

 

कवि पूछ रहा है के हालात कितने बिगड़ चुके हैं, मुझे सच-सच बताना। “गाँव” का ज़िक्र करके वो इस बड़ी घटना को एक छोटी और अपनी सी जगह से जोड़ रहा है। वो बड़ी-बड़ी राजनीति की बातें नहीं पूछ रहा, बल्के अपने उन लोगों की ज़मीनी सच्चाई और अपने उस घर का हाल जानना चाहता है जिसे वो बटवारे के वक़्त पीछे छोड़ आया था।

जवाँ बेटों की लाशों के अलावा

मिली है कौन सी सौग़ात लिखना

 

१-तोहफ़े, भेंट

 

ये एक बहुत ही दर्दनाक और तंज़ भरा शे’र है। कवि पूछता है के “जवान बेटों के जनाज़ों के अलावा इस दौर (दंगों और जंगों) ने हमें कौन से ‘तोहफ़े’ (सौग़ात) दिये हैं?” वो राजनीति की वजह से छिन जाने वाली जवान ज़िंदगियों के दुख की तरफ़ इशारा कर रहा है। उसका मतलब ये है के लीडरों के तमाम वादों के बदले में आम आदमी को सिर्फ़ मौत ही मिली है। साहिर लुधियानवी ने भी कहा था —

बहुत दिनों से है ये मश्ग़ला सियासत का

के जब जवान हों बच्चे तो क़त्ल हो जाएँ

कोई सोता है या सब जागते हैं

वहाँ कटती है कैसे रात लिखना

 

यहाँ कवि लोगों के हाल, उनकी बेचैनी और डर के बारे में पूछ रहा है। “नींद” का मतलब अमन और सुकून है, जबके “जागने” का मतलब डर और दुख है। वो जानना चाहता है के क्या गाँव अभी तक उस “रात” (यानी बुरे वक़्त) के ख़ौफ़ के साये में जी रहा है, और लोग डर के उन लंबे घंटों को कैसे गुज़ारते हैं।

लहू धरती में कितना बो चुके हो

नई फ़स्लों की भी औक़ात लिखना

 

१-ख़ून २-बीज बोना ३-हालत

 

इस शे’र में खेती-बाड़ी की मिसाल दी गई है। कवि पूछता है के तुम लोगों ने ज़मीन में कितना ख़ून “बोया” है? और फिर पूछता है के इस ख़ून से जो नई फ़सलें (यानी नई पीढ़ी या नया दौर) पैदा होंगी, उन की क्या “हैसियत” होगी? वो आने वाले वक़्त पर सवाल उठा रहा है के अगर बुनियाद ही ख़ून पर रखी गई है, तो अंजाम कितना ज़हरीला होगा। साहिर लुधियानवी ने कहा था — जंग तो ख़ूद ही एक मसला है

जंग क्या मसलों का हल देगी

आग और ख़ून आज बख़्शेगी

भूक और एहतियाज कल देगी

कहाँ जलता रहा धरती का सीना

कहाँ होती रही बरसात लिखना

 

कवि यहाँ दुख और मदद के फ़र्क़ को दिखा रहा है। वो पूछता है के ज़मीन का दिल कहाँ जलता रहा (जहाँ हिंसा या आग थी) और “बारिश” (यानी मदद या सुकून) कहाँ बरसती रही? ये सरकार की उस नाकामी पर तंज़ है के जहाँ मदद की सब से ज़्यादा ज़रूरत थी वहाँ कुछ नहीं पहुँचा, और राहत अक्सर उन जगहों को छोड़ देती है जहाँ सब से ज़्यादा दर्द होता है।

हमारी सर-ज़मीं किस रंग में है

वहाँ बहते लहू की ज़ात लिखना

 

१-मात्र-भूमी २-ख़ून ३-जाती, धर्म

 

वो पूछता है के अब हमारे वतन का हाल कैसा है? और सबसे ज़रूरी बात ये के जो ख़ून वहाँ बह रहा है, उसकी “ज़ात” या धर्म क्या है? ये सांप्रदायिक झगड़ों की तरफ़ एक बहुत गहरा इशारा है – ये दुख बताना के लड़ाई में लोग “इंसान” का ख़ून देखना भूल जाते हैं और उसे मज़्हब या बिरादरी के ख़ानों में बाट देते हैं, जिससे सिर्फ़ नफ़्रत बढ़ती है।  साहिर लुध्यानवी —

ख़ून अपना हो या पराया हो

नस्ल-ए आदम का ख़ून है आख़िर

मैं छुप कर घर में आना चाहता हूँ

लगी है किस गली में घात लिखना

 

१-चाल, ताक, छुप कर हमला करना

 

आख़िरी शे’र एक ऐसे शख़्स का दुख दिखाता है जिसे अपना घर छोड़ना पड़ा। कवि अपने घर वापस आना चाहता है, लेकिन वो ये काम सिर्फ़ छुप कर ही कर सकता है। वो उन “घातों” (यानी छुपे हुए ख़तरों और दुश्मनों) का पता पूछ रहा है जो गलियों में उस का इंतज़ार कर रही हैं। ये एक ऐसे घर की तस्वीर है जो अब एक जाल बन चुका है, जहाँ अपनी जड़ों की तरफ़ लौटना भी जानलेवा हो सकता है।

 

lahuu ki zaat likhna – hardayal siNgh datta kaNval ziaa’ii
1
kahaaN tak baRh ga’ii hai baat likhna
mer’e gaaNv ke sab haalaat likhna
2
javaaN beToN ki laashoN ke alaava
milii hai kaun sii sauGhaat likhna
3
koii sotaa hai yaa sab jaagt’e haiN
vahaaN kaTtii hai kaise raat likhna
4
lahuu dhartii meN kitnaa bo chuk’e ho
na’ii fasloN ki bhii auqaat likhna
5
kahaaN jaltaa rahaa dhartii kaa siina
kahaaN hotii rahii barsaat likhna
6
hamaarii sar-zamiiN kis raNg meN hai
vahaaN baht’e lahuu ki zaat likhna
7
maiN chhup kar ghar meN aanaa chaahta huN
lagii hai kis galii meN ghaat likhna

kaNval ziaa’ii, hardayal siNgh datta, (1927-2011), sialkoT-dehradun.  He moved to India after independence/partition and worked for the Ministry of Relief and Rehabilitation.  Later, when this cabinet ministry was abolished he was transferred to the Ministry of Defense from which he retired and settled in dehradun.  There are at least two collections of his verse.  In some biographies he is shown to be shaagird of mehr lal soni zia, as a tribute to whom he added ziaa’ii to his taKhallus.  In other biographies he is said to have been a shaagird of baalmukund arsh malsiani.
1
kahaaN tak baRh ga’ii hai baat likhna
mer’e gaaNv ke sab haalaat likhna

The poet asks for an honest update on how far the crisis has escalated. By focusing on the “village” (gaaNv), he grounds the tragedy in the most intimate and fundamental unit of society. He isn’t asking for global politics; he wants to know the ground reality of his own people and the specific conditions of his home, which he left behind after independence/partition.
2
javaaN beToN ki laashoN1 ke alaava2
milii hai kaun sii sauGhaat3 likhna

1.corpses 2.in addition to 3.gifts

This is a devastatingly cynical verse. He asks, “Besides the corpses of our young sons, what other ‘gifts’ (sauGhaat) has this era (partition riots, wars) given us?” He is pointing out the ultimate cost of political upheaval, the loss of the youthful lives, and implies that for all the promises made by leaders, the only tangible result for the common person has been death.  Said saahir ludhianavi –
bahut dinoN se hai ye mashGhala siyaasat ka
keh jab javaan hoN bachche to qatl ho jaa’eN
3
koii sotaa hai yaa sab jaagt’e haiN
vahaaN kaTtii1 hai kaise raat likhna

1.passes, gets spent

Here, the poet inquires about the psychological state, anxieties and fears of the people. Sleep represents peace and security, while wakefulness (jaagt’e) suggests fear, anxiety, or mourning. He wants to know if the village is still paralyzed by the terror of the “night” – the dark period of uncertainty – and how they manage to survive the long hours of darkness.
4
lahuu1 dhartii2 meN kitnaa bo3 chuk’e ho
na’ii fasloN4 ki bhii auqaat5 likhna

1.blood 2.earth 3.sow 4.harvest 5.condition

This verse uses a powerful agricultural metaphor. He asks how much blood has already been “sown” into the earth. Following this, he asks about the “worth” or “status” (auqaat) of the new crops. He is questioning the future: if the foundation of this new era is built on bloodshed, what kind of poisoned harvest will the next generation reap?  Said saahir ludhianavi …
juNg to Khud hi ek masala hai
juNg kya masaloN ka hal degi
aag aur Khuun aaj baKhsegi
bhook aur ehtiyaaj kal degi
5
kahaaN jaltaa rahaa dhartii1 kaa siina2
kahaaN hotii rahii barsaat3 likhna

1.earth 2.bosom 3.rain

The poet highlights the inequality of suffering and relief. He asks where the “bosom/heart of the earth” continued to burn (symbolizing drought, fire, or violence) and where the “rain” (relief, resources, or peace) actually fell. This is a critique of the state’s failure to provide aid where it was most needed, suggesting that relief often bypasses the areas of greatest pain.
6
hamaarii sar-zamiiN1 kis raNg2 meN hai
vahaaN baht’e lahuu3 ki zaat4 likhna

1.homeland 2.colour, condition 3.blood 4.caste, community, religion

He asks about the current “color” or character of the motherland. More importantly, he asks for the “caste/religion” or “identity” (zaat) of the blood being spilled. This is a poignant reference to communal and sectarian violence – noticing that in conflict, people stop seeing “human” blood and start categorizing it by religion or tribe, which only fuels more hatred.  Said saahir
Khoon apna ho ya paraaya
nasl-e aadam ka Khoon hai aaKhir

7
maiN chhup kar ghar meN aanaa chaahta huN
lagii hai kis galii meN ghaat1 likhna

1.ambush, hidden attack

The final verse captures the tragedy of the exile or the fearful citizen. The poet wants to return home, but he can only do so secretly, slyly hiding (chhup kar). He asks for a map of the “ambushes” (ghaat) – the hidden dangers and betrayals – waiting in the streets. It portrays a home that has become a death trap, where even a return to one’s roots is a life-threatening risk.

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