faiz ke saath sargoshiyaaN-inteKhaab aalam-ZhaNg Shixuaan

فیض  کے  ساتھ  سرگوشیاں  ۔  ژانگ  شی  شوان  انتخاب  عالمؔ

۱

سب  ہیں  اہلِ  گلشنِ  شعر  و  سخن  نغمہ  سرا

آہ  چپ  ہے  تُو  مگر  اے  طائرِ  شیریں  نوا

۲

اُڑ  رہا  ہے  راہِ  منزل  پر  غبارِ  پا،  مگر

حیف  تُجھ  سے  آج  ہے  محروم  فن  کا  قافلہ

۳

گونجتی  ہے  جب  صدائے  شعر  بزمِ  گوش  میں

گونج  اُٹھتا  ہے  فضائے  دل  میں  تیرا  زمزمہ

۴

شاخِ  آزادی  پہ  کِھلتا  ہے  گُلِ  نو  جب  کوئی

اس  سے  آتی  ہے  تری  مانوس  خوشبوئے  وفا

۵

مصر  کا  بازار  پہلے  کی  طرح  ہی  گرم  ہے

چل  رہا  ہے  آج  بھی  سوداگروں  کا  سِلسِلہ

۶

ہے  خزاں  ایک  گوشۂ  گُلشن  پہ  اب  بھی  حکمراں

تک  رہے  ہیں  اب  بھی  گُل  سوئے  گزرگاہ  صبا

۷

طالبِ  نشتر  تھی  کل  اپنی  یہ  دنیا  جس  طرح

دے  رہی  ہے  اب  بھی  شیشوں  کے  مسیحا  کو  صدا

۸

پاسِ  وعدہ  کر  ذرا  اے  شاعرِ  نور  و  سحر

پھر  قلم  کی  لرزشوں  سے  سونے  والوں  کو  جگا

 

انتخابِ عالم—ژانگ شی شوان (۱۹۳۳۔۲۰۲۶)، بیجنگ، چین۔ شی شوان کا اُردو میں ترجمہ “انتخابِ عالم” ہوتا ہے، اسی لیے انہوں نے یہ تخلُّص چُنا۔ وہ ایک چینی شہری، کلاسک شاعری کے دلدادہ عالِم اور خود بھی ایک شاعر تھے۔ جب وہ صحافت (journalism)  کے طالب علم تھے، تب انہیں اُردو کے ایک سخت کورس میں بھیج دیا گیا اور پاک-چین تعلقات کو بہتر بنانے کی ذمّہ داری دی گئی۔ وہ اُردو میں مہارت حاصل کرتے گئے، اُردو شاعری میں ان کی دلچسپی بڑھی اور انہوں نے بہت مطالعہ کرنا شروع کیا۔ ۱۹۷۰ کی دہائی میں، انہوں نے پاکستان سے آئے ہوئے شاعر منظر حسین رازی سے علمِ عروض (شاعری کے اوزان) سیکھا۔ اُنہیں پاکستان کی بیجنگ فارن اسٹڈیز یونیورسٹی میں پڑھانے کی دعوت دی گئی، جہاں اپنا کام مکمل کر کے وہ ۱۹۸۶ میں بیجنگ واپس آ گئے۔ اس کے بعد کچھ عرصے کے لیے ان کا اُردو شاعری اور تہذیب سے رابطہ ٹوٹ گیا، لیکن بیجنگ میں پاکستانی سفارت خانے کے مشاعروں میں شرکت کی وجہ سے یہ رابطہ دوبارہ بحال ہو گیا۔ ان کا کلام پاکستان کے ادبی رسالوں میں چھپتا رہا۔ اُنہوں نے فیض احمد فیضؔ کے مجموعہ کلام کا چینی زبان میں ترجمہ بھی کیا۔ پاکستان اکیڈمی آف لیٹرز نے ان کا سارا کلام جمع کر کے ۱۹۹۵ میں ان کا ایک دیوان شائع کیا۔

۱

سب  ہیں  اہلِ  گلشنِ  شعر  و  سخن  نغمہ  سرا

آہ  چپ  ہے  تُو  مگر  اے  طائرِ  شیریں  نوا

 

شاعر  شعر  و  ادب  کی  دنیا  (گلشنِ  شعر  و  سخن)  کو  دیکھتا  ہے  اور  کہتا  ہے  کہ  جہاں  باقی  سب  ابھی  نغمہ  سرا  ہیں  اور  لکھ  رہے  ہیں،  وہیں  میٹھی  آواز  والا  پرندہ  (طائرِ  شیریں  نوا)  یعنی  فیض  احمد  فیض  افسوس  کہ  خاموش  ہو  چکا  ہے۔  یہ  فیض  کے  انتقال  اور  ان  کی  بااثر  آواز  کے  خاموش  ہونے  پر  ایک  سیدھا  ماتم  ہے۔

۲

اُڑ  رہا  ہے  راہِ  منزل  پر  غبارِ  پا،  مگر

حیف  تُجھ  سے  آج  ہے  محروم  فن  کا  قافلہ

 

فن  کا  قافلہ  اپنی  منزل  کی  راہ  پر  مسافروں  کے  قدموں  کا  غبار  (غبارِ  پا)  پیچھے  چھوڑتے  ہوئے  مسلسل  آگے  بڑھ  رہا  ہے۔  لیکن  یہ  بڑے  دُکھ  کی  بات  (حیف)  ہے  کہ  اب  اس  قافلے  کو  فیض  کے  بغیر  ہی  آگے  کا  سفر  طے  کرنا  ہوگا،  اور  وہ  ان  کی  غیر  معمولی  صلاحیت،  رہنمائی  اور  فنکارانہ  عظمت  سے  محروم  ہو  چکا  ہے۔

۳

گونجتی  ہے  جب  صدائے  شعر  بزمِ  گوش  میں

گونج  اُٹھتا  ہے  فضائے  دل  میں  تیرا  زمزمہ

 

جب  بھی  سننے  والوں  کی  کسی  محفل  (بزمِ  گوش)  میں  شعر  گونجتے  ہے،  تو  تمہارا  سریلا  نغمہ  (زمزمہ)  فوراً  دل  میں  بازگشت  پیدا  کرتا  ہے۔  شاعر  کے  لیے  کوئی  بھی  خوبصورت  شعر  فوراً  فیض  کے  منفرد  انداز  کی  یادیں  تازہ  کر  دیتا  ہے  اور  ان  کے  دل  کی  فضا  میں  گونجنے  لگتا  ہے۔

۴

شاخِ  آزادی  پہ  کِھلتا  ہے  گُلِ  نو  جب  کوئی

اس  سے  آتی  ہے  تری  مانوس  خوشبوئے  وفا

 

فیض  بنیادی  طور  پر  انقلاب،  جدوجہد  اور  آزادی  کے  شاعر  مانے  جاتے  ہیں۔  شاعر  کہتا  ہے  کہ  جب  بھی  آزادی  کی  شاخ  پر  کوئی  نیا  پھول  (گلِ  نو)  کھلتا  ہے—یعنی  کوئی  نیا  شاعر  یا  کوئی  نیا  شعر  سامنے  آتا  ہے—تو  اس  میں  سے  فیض  کی  اس  وفاداری  اور  نظریاتی  وابستگی  کی  جانی  پہچانی  خوشبو  (مانوس  خوشبوئے  وفا)  آتی  ہے  جو  انہوں  نے  زندگی  بھر  اس  مقصد  کے  لیے  برقرار  رکھی۔

۵

مصر  کا  بازار  پہلے  کی  طرح  ہی  گرم  ہے

چل  رہا  ہے  آج  بھی  سوداگروں  کا  سِلسِلہ

 

اس  شعر  میں  مصر  کے  بازار  کا  کلاسیکی  استعارہ  استعمال  کیا  گیا  ہے  جہاں  یوسف  کو  غلام  بنا  کر  بیچا  گیا  تھا۔  مِصر  کا  بازار  استحصال  اور  لالچ  کی  علامت  ہے۔  شاعر  افسوس  کا  اظہار  کرتا  ہے  کہ  دنیا  بالکل  نہیں  بدلی؛  سیاسی  اور  سماجی  بازار  آج  بھی  ویسا  ہی  گرم  ہے،  اور  لالچی  سوداگروں  (استحصال  کرنے  والوں)  کا  یہ  سلسلہ  اب  بھی  دھڑلے  سے  چل  رہا  ہے۔

۶

ہے  خزاں  ایک  گوشۂ  گُلشن  پہ  اب  بھی  حکمراں

تک  رہے  ہیں  اب  بھی  گُل  سوئے  گزرگاہ  صبا

 

خزاں،  جو  کہ  ویرانی  کا  استعارہ  ہے،  چمن  کے  ایک  گوشے  پر  اب  بھی  راج  کر  رہی  ہے،  جو  مُسلسِل  ظلم  اور  سیاسی  بے  حسی  کی  عکاسی  کرتی  ہے۔  نجات  اور  آس  کی  امید  میں  پھول  اب  بھی  بادِ  صبا  کے  گزرنے  کے  راستے  (گزرگاہِ  صبا)  کی  طرف  بڑی  حسرت  سے  دیکھ  رہے  ہیں،  تاکہ  انہیں  امید  اور  تبدیلی  کی  کوئی  آہٹ  مل  سکے۔  اس  میں  فیض  کے  مشہور  شعری  مجموعے  ‘دستِ  صبا’  کی  جھلک  بھی  نظر  آتی  ہے۔

۷

طالبِ  نشتر  تھی  کل  اپنی  یہ  دنیا  جس  طرح

دے  رہی  ہے  اب  بھی  شیشوں  کے  مسیحا  کو  صدا

 

یہ  شعر  فیض  کے  اپنے  فلسفے  اور  تخیل  کی  خوبصورت  عکاسی  کرتا  ہے۔  ‘طالبِ  نشتر’  کا  حوالہ  براہِ  راست  فیض  کے  اس  مشہور  تشخیصی  مصرعے  کی  یاد  دلاتا  ہے  کہ  “تیرے  آزار  کا  چارہ  نہیں  نشتر  کے  سوا”،  جس  کا  مطلب  ہے  کہ  معاشرے  کی  جڑوں  میں  پھیلی  ہوئی  برائی  کو  ختم  کرنے  کے  لیے  ایک  تکلیف  دہ،  انقلابی  جراحی  (نشتر)  کی  ضرورت  ہے۔  اس  کے  ساتھ  ہی،  دنیا  اب  بھی  ایک  ‘شیشوں  کے  مسیحا’  کو  پکار  رہی  ہے—ایک  ایسا  مسیحا  جو  بکھرے  ہوئے  شیشے  کے  ٹکڑوں  (ٹوٹی  ہوئی  زندگیوں)  کو  جوڑنے  کی  طاقت  رکھتا  ہو،  جو  فیض  کی  مشہور  نظم  “شیشوں  کا  مسیحا  کوئی  نہیں”  کا  حوالہ  ہے۔  شاعر  دکھ  کے  ساتھ  کہتا  ہے  کہ  جیسے  کل  دنیا  کو  اپنے  بکھرے  ہوئے  لوگوں  کے  زخموں  کو  سلنے  کے  لیے  سچائی  کے  نشتر  اور  جوڑنے  والے  مسیحا  دونوں  کی  ضرورت  تھی،  آج  بھی  وہ  فیض  کے  اس  انقلابی  جلال  اور  دردمندانہ  مرہم  پٹی  کو  اتنی  ہی  شِدّت  سے  پکار  رہی  ہے۔

۸

پاسِ  وعدہ  کر  ذرا  اے  شاعرِ  نور  و  سحر

پھر  قلم  کی  لرزشوں  سے  سونے  والوں  کو  جگا

 

اس  آخری  التجا  میں،  شاعر  روشنی  اور  صبح  کے  شاعر  (شاعرِ  نور  و  سحر  ۔  سحر  اِشتراکیت  کے  طلوع  ہونے  کی  علامت  ہے)  یعنی  فیض  سے  التماس  کرتا  ہے  کہ  وہ  لوگوں  کی  رہنمائی  کرنے  کے  اپنے  وعدے  کا  پاس  (پاسِ  وعدہ)  رکھیں۔  وہ  ان  سے  فریاد  کرتا  ہے  کہ  وہ  اپنے  انقلابی  قلم  کی  جنبشوں  اور  لرزش  سے  اس  سوئی  ہوئی،  بے  حِس  قوم  کو  ایک  بار  پھر  خوابِ  غفلت  سے  بیدار  کر  دیں۔

 

फ़ैज़ के साथ सरगोशियाँ – ज़्शांग शिश्वान – इन्तेख़ाब आलम

सब हैं अहल-ए गुल्शन-ए शे’र-ओ-सुख़न नग़्मा-सरा

आह चुप है तू मगर अए ता’एर-ए शीरीं-नवा

उड़ रहा है राह-ए मंज़िल पर ग़ुबार-ए पा, मगर

हैफ़ तुझ से आज है महरूम फ़न का क़ाफ़िला

गूंजती है जब सदा-ए शे’र बज़्म-ए गोश में

गूंज उठता है फ़ज़ा-ए दिल में तेरा ज़मज़मा

शाख़-ए आज़ादी पे खिलता है गुल-ए नौ जब कोई

इस से आती है तेरी मानूस ख़ुशबू-ए वफ़ा

मिस्र का बाज़ार पहले की तरह ही गर्म है

चल रहा है आज भी सौदागरों का सिलसिला

है ख़िज़ाँ एक गोशा-ए गुल्शन पे अब भी हुक्मराँ

तक रहे हैं अब भी गुल सू-ए गुज़रगाह-ए सबा

तालिब-ए नश्तर थी कल अपनी ये दुनिया जिस तरह

दे रही है अब भी शीशों के मसीहा को सदा

पास-ए वादा कर ज़रा अए शा’एर-ए नूर-ओ-सहर

फिर क़लम की लर्ज़िशों से सोने वालों को जगा

 

इन्तेख़ाब आलम—ज़्शांग शिश्वान (१९३३-२०२६), बेजिंग, चीन। ‘शिश्वान’ का उर्दू में मतलब होता है ” इन्तेख़ाब आलम”, इसीलिए उन्होंने ये तख़ल्लुस (उपनाम) चुना। वो एक चीनी नागरिक, क्लासिकल शा’एरी के शौक़ीन विद्वान और ख़ुद भी एक कवि थे। जब वो पत्रकारिता (journalism) के छात्र थे, तब उन्हें उर्दू के एक कड़े कोर्स में भेज दिया गया और पाक-चीन संबंधों को बेहतर बनाने का काम सौंपा गया। वो उर्दू में माहिर होते गए, उर्दू शा’एरी में उनकी दिलचस्पी बढ़ी और उन्होंने बहुत पढ़ना शुरू कर दिया। १९७० के दशक में, उन्होंने पाकिस्तान से आए कवि मंज़र हुसैन राज़ी से इल्म-ए-अरूज़ (शा’एरी के नियम और व्याकरण) सीखा। उन्हें Beijing Foreign Studies University की तरफ़ से पाकिस्तान में पढ़ाने के लिये आमंत्रित किया गया था। अपना assignment पूरा कर के वो १९८६ में बेजिंग लौट आए, जिस की वजह से कुछ समय के लिये उन का उर्दू शा’एरी और संस्कृति से संपर्क टूट गया। लेकिन बेजिंग में पाकिस्तानी दूतावास के मुशा’एरों में हिस्सा लेने से ये संपर्क फिर से ज़िंदा हो गया। उन का काम पाकिस्तान की पत्रिकाओं में छपता रहा। उन्होंने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की कविताओं के संग्रह का चीनी भाषा में अनुवाद भी किया। Pakistan Academy of Letters ने उन के काम को इकट्ठा किया और १९९५ में उनका एक दीवान (काव्य-संग्रह) प्रकाशित किया।

सब हैं अहल-ए गुल्शन-ए शे’र-ओ-सुख़न नग़्मा-सरा

आह चुप है तू मगर अए ता’एर-ए शीरीं-नवा

 

शा’एर कविता और साहित्य की दुनिया (गुल्शन-ए-शेर-ओ-सुख़न) को देखता है और कहता है के जहाँ बाक़ी सब अभी भी गीत गा रहे हैं और लिख रहे हैं, वहीं मीठी आवाज़ वाला पक्षी (ता’एर-ए-शीरीं-नवा) यानी फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ख़ामोश हो चुका है। ये फ़ैज़ के गुज़र जाने और उनकी असरदार आवाज़ के ख़ामोश होने पर एक शोक है।

उड़ रहा है राह-ए मंज़िल पर ग़ुबार-ए पा, मगर

हैफ़ तुझ से आज है महरूम फ़न का क़ाफ़िला

 

कला का क़ाफ़ेला अपनी मंज़िल के रास्ते पर मुसाफ़िरों के पैरों की धूल (ग़ुबार-ए पा) पीछे छोड़ते हुए लगातार आगे बढ़ रहा है। लेकिन ये बड़े दुख की बात (हैफ़) है के अब इस क़ाफ़ेले को फ़ैज़ के बिना ही आगे का सफ़र तय करना होगा, और वो उन की प्रतिभा, मार्गदर्शन और कलात्मक महानता से महरूम (वंचित) हो चुका है।

गूंजती है जब सदा-ए शे’र बज़्म-ए गोश में

गूंज उठता है फ़ज़ा-ए दिल में तेरा ज़मज़मा

 

जब भी सुनने वालों की किसी महफ़िल (बज़्म-ए गोश) में शे’र गूँजता है, तो तुम्हारा सुरीला गीत (ज़मज़मा) तुरंत दिल में गूँज पैदा करता है। शा’एर के लिये कोई भी ख़ूबसूरत शे’र तुरंत फ़ैज़ के अनोखे अंदाज़ की यादें ताज़ा कर देता है और उनके दिल के माहौल में गूँजने लगता है।

शाख़-ए आज़ादी पे खिलता है गुल-ए नौ जब कोई

इस से आती है तेरी मानूस ख़ुशबू-ए वफ़ा

 

फ़ैज़ मुख्य रूप से क्रांति, संघर्ष और आज़ादी के शा’एर माने जाते हैं। शा’एर कहता है के जब भी आज़ादी की शाख़ पर कोई नया फूल (गुल-ए नौ) खिलता है—यानी कोई नया शा’एर या कोई नया शे’र सामने आता है—तो उस में से फ़ैज़ की उस वफ़ादारी और प्रतिबद्धता (commitment) की जानी-पहचानी ख़ुशबू (मानूस ख़ुशबू-ए वफ़ा) आती है जो उन्हों ने जीवन भर इस मक़्सद के लिये बनाए रखी।

मिस्र का बाज़ार पहले की तरह ही गर्म है

चल रहा है आज भी सौदागरों का सिलसिला

 

इस शे’र में मिस्र के बाज़ार का क्लासिकल रूपक (metaphor) इस्तेमाल किया गया है जहाँ यूसुफ़ को ग़ुलाम बना कर बेचा गया था, जो शोषण (exploitation) और लालच का प्रतीक है। शा’एर अफ़्सोस का इज़्हार करता है के दुनिया बिल्कुल नहीं बदली; सामाजिक और राजनैतिक बाज़ार आज भी वैसा ही गर्म है, और लालची सौदागरों (शोषण करने वालों) का ये सिलसिला अब भी वैसे ही चल रहा है।

है ख़िज़ाँ एक गोशा-ए गुल्शन पे अब भी हुक्मराँ

तक रहे हैं अब भी गुल सू-ए गुज़रगाह-ए सबा

 

पतझड़ (ख़िज़ाँ), जो के वीरानी और उदासी का प्रतीक है, चमन के एक हिस्से पर अब भी राज कर रही है, जो लगातार हो रहे ज़ुल्म और राजनैतिक उदासी को दिखाती है। राहत और उम्मीद में फूल अब भी सुब्ह की हवा के गुज़रने के रास्ते (गुज़रगाह-ए सबा) की तरफ़ बड़ी हसरत से देख रहे हैं, ताके उन्हें उम्मीद और बदलाव की कोई आहट मिल सके। इस में फ़ैज़ के मशहूर कविता-संग्रह ‘दस्त-ए सबा’ की झलक भी साफ़ दिखाई देती है।

तालिब-ए नश्तर थी कल अपनी ये दुनिया जिस तरह

दे रही है अब भी शीशों के मसीहा को सदा

 

ये शे’र फ़ैज़ के अपने फ़लसफ़े और कल्पना की बेहद ख़ूबसूरत झलक पेश करता है। ‘तालिब-ए नश्तर’ (सर्जन के चाक़ू/नश्तर की चाह रखने वाला) का इशारा सीधे तौर पर फ़ैज़ के उस मशहूर मिसरे की याद दिलाता है के “तेरे आज़ार का चारा नहीं नश्तर के सिवा”, जिस का मतलब है के समाज की जड़ों में फैली हुई बुराई को ख़त्म करने के लिये एक तक्लीफ़दह, क्रांतिकारी सर्जरी (नश्तर) की ज़रूरत है। इस के साथ ही, दुनिया अब भी एक ‘शीशों के मसीहा’ को पुकार रही है—एक ऐसा मसीहा जो टूटे हुए शीशे के टुकड़ों (बिखरी हुई ज़िंदगी और टूटे हुए दिलों) को जोड़ने का हुनर रखता हो, जो फ़ैज़ की मशहूर नज़्म शीशों का मसीहा कोई नहीं” का हवाला है। शा’एर दुख के साथ कहता है के जैसे कल दुनिया को अपने टूटे-बिखरे लोगों के ज़ख़्मों को सिलने के लिये सच्चाई के नश्तर और जोड़ने वाले मसीहा दोनों की ज़रूरत थी, आज भी वो फ़ैज़ के उसी क्रांतिकारी जोश और मरहम लगाने वाले कोमल अंदाज़ को उतनी ही शिद्दत से पुकार रही है।

पास-ए वादा कर ज़रा अए शा’एर-ए नूर-ओ-सहर

फिर क़लम की लर्ज़िशों से सोने वालों को जगा

 

इस आख़िरी इल्तेजा (प्रार्थना) में, शा’एर रोशनी और सुब्ह के कवि (शा’एर-ए-नूर-ओ-सहर – सुब्ह/सहर समाजवाद की निशानी है) यानी फ़ैज़ से गुज़ारिश करता है के वो लोगों का मार्गदर्शन करने के अपने वादे का मान (पास-ए वादा) रखें। वो उन से फ़र्याद करता है के वो अपने क्रांतिकारी क़लम की हलचल और लर्ज़िश (कंपन) से इस सोई हुई, क़ौम को एक बार फिर ग़फ़्लत की नींद से जगा दें।

 

faiz ke saath sargoshiyaaN – Zhang Shixuaan – inteKhaab aalam
1
sab haiN ahl-e gulshan-e sh’er-o-suKhan naGhma-sara
aah chup hai tuu magar a’e taa’er-e shiiriiN-nava
2
uR raha hai raah-e manzil par Ghubaar-e paa, magar
haif tujh se aaj hai mahroom fun ka qaafila
3
goonjti hai jab sada-e sh’er bazm-e gosh m’eN
goonj uThta hai faza-e dil m’eN tera zamzama
4
shaaKh-e aazadi pe Khilta hai gul-e nau jab ko’i
iss se aati hai teri maanoos Khushbuu-e vafa
5
misr ka baazaar pahl’e ki tarah hi garm hai
chal raha hai aaj bhi saudaagaroN ka silsila
6
hai KhizaaN ek gosha-e gulshan pe ab bhi hukmraaN
tak rah’e haiN ab bhi gul suu-e guzargaah-e saba
7
taalib-e nashtar thi kal apni ye duniya jis tarah
d’e rahi hai ab bhi shiishoN ke masiiha ko sada
8
paas-e vaa’da kar zara a’e shaa’er-e noor-o-sahar
phir qalam ki larzishoN se son’e vaaloN ko jaga

inteKhaab aalam-Zhang Shixuan (1933-2026), Beijing, China.  Shixuan translated in urdu means inteKhaab aalam, hence the taKhallus.  He was a Chinese national, scholar interested in classical poetry, poet.  When he was still a student of journalism, he was reassigned to an intensive urdu study course and tasked with developing China-pakistan relationships.  He became proficient in urdu, interested in urdu shaa’eri and started reading a lot.  In the 1970s he learned arooz from visiting pakistani shaa’er manzar husain razi.  He was invited to teach at the Beijing Foreign Studies University in pakistan, finished his assignment and returned to beijing in 1986, causing him to loose contact with urdu shaa’eri and culture, which was revived by participation in mushaa’era in the pakistani embassy in beijing.  His work was published in magazines in pakistan.  He also translated faiz ahmed faiz’s collection into Chinese.  The Pakistan Academy of Letters collected his work and published a diivaan in 1995.
1
sab haiN ahl-e gulshan-e sh’er-o-suKhan naGhma-sara
aah chup hai tuu magar a’e taa’er-e shiiriiN-nava

The poet looks at the literary world (the garden of poetry – gulshan-e sh’er o suKhan) and notes that while everyone else is still singing and writing, the sweet-singing bird (taa’er-e shiiriiN-nava)—faiz ahmed faiz—has tragically fallen silent. It is a direct lament on the passing of faiz and the silence of his powerful voice.
2
uR raha hai raah-e manzil par Ghubaar-e paa, magar
haif tujh se aaj hai mahroom fun ka qaafila

The caravan of art continues to move forward, leaving behind the dust of travelers’ feet (Ghubaar-e paa) on the path to its destination (raah-e manzil). However, it is a matter of great sorrow (haif) that the caravan must now journey on without faiz, deprived of his genius, guidance, and artistry.
3
goonjti hai jab sada-e sh’er bazm-e gosh m’eN
goonj uThta hai faza-e dil m’eN tera zamzama

Whenever poetry is recited in any gathering of listeners (bazm-e gosh), your melodious song (zamzma) instantly echoes in the heart. For the poet, any beautiful verse immediately triggers the memory of faiz‘s unique style, resonating within the inner landscape of his heart.
4
shaaKh-e aazadi pe Khilta hai gul-e nau jab ko’i
iss se aati hai teri maanoos Khushbuu-e vafa

faiz was famously a poet of revolution, struggle, and freedom. The poet writes that whenever a new flower (gul-e nau) blooms on the branch of liberty – a new poet or a new sh’er emerges, it carries the familiar, intimate fragrance (Khushbuu-e vafa) of faiz‘s lifelong loyalty and commitment to the cause.
5
misr ka baazaar pahl’e ki tarah hi garm hai
chal raha hai aaj bhi saudaagaroN ka silsila

This couplet uses the classical metaphor of the “market of Egypt” (misr ka baazaar), where yuusuf (Joseph) was sold as a slave, to represent exploitation and greed. The poet laments that the world has not changed; the socio-political marketplace remains as corrupt as ever, and the chain of greedy exploiters (saudaagaroN) continues to thrive.
6
hai KhizaaN ek gosha-e gulshan pe ab bhi hukmraaN
tak rah’e haiN ab bhi gul suu-e guzargaah-e saba

Autumn (KhizaaN), a metaphor for desolation, still rules over a corner of the garden, representing ongoing oppression and political desolation. In hope of relief, the flowers (gul) are still gazing longingly toward the path of the morning breeze (guzargaah-e saba), waiting for a whisper of hope and change.  This has echoes of faiz‘s collection dast-e sabaa.
7
taalib-e nashtar thi kal apni ye duniya jis tarah
d’e rahi hai ab bhi shiishoN ke masiiha ko sada

This couplet beautifully recalls faiz‘s own poetic philosophy and imagery. The reference to taalib-e nashtar (seeking the scalpel) directly echoes faiz‘s famous diagnostic line, “ter’e aazaar ka chaara nahiN nashtar ke siva” (there is no cure for your illness except the scalpel), suggesting that society’s deep-seated rot requires a painful, revolutionary incision. At the same time, the world continues to call out for a shiishoN ka masiiha—a healer capable of putting shattered shards back together, referencing faiz’s famous poem “shiishoN ka masiiha ko’i nahiN”. The poet laments that just as yesterday the world needed both surgical truth and a healer for its broken, shattered people, today it still desperately calls out for faiz‘s unique blend of revolutionary force and tender repair.
8
paas-e vaa’da kar zara a’e shaa’er-e noor-o-sahar
phir qalam ki larzishoN se son’e vaaloN ko jaga

In this final plea, the poet begs faiz, the “poet of light and dawn” (shaa’er-e noor-o-sahar), to keep his promise (paas-e vaa’da) of guiding the masses. He calls upon him to awaken the slumbering, passive nation once more through the powerful, trembling vibrations of his revolutionary pen.

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