Recitation
خون سے آؤ وضو کریں ۔ شیداؔ چینی لیو ینگ ون
۱
کرتے ہیں گر وہ حوصلۂ گفتگو کریں
اِک شرط ہے کہ بات مگر رُو بہ رُو کریں
۲
آہ و فغانِ بُلبُل نالاں تو سن چکے
اب خاموشیِ گُل سے ذرا گفتُگُو کریں
۳
آنکھیں بچھائے اہلِ ستم ہیں کھڑے ہوئے
آؤ صلیبِ دار کو زیبِ گُلُو کریں
۴
غم پر نہ اختیار زمانہ نہ غم گُسار
ایسے میں وصلِ یار کی کیا آرزو کریں
۵
نذرِ بہار ہو چکا ہے ایک ایک تار
اب پیرہن کہاں کہ جسے ہم رفو کریں
۶
عنقا ہی ہو چکی ہے زمانے سے عافیت
کرنے کو یوں تلاش تو ہم کُو بہ کُو کریں
۷
تسخیرِ کائنات کا سودا بُرا نہیں
لیکن بقدرِ ظرف ہی یہ آرزو کریں
۸
راہِ وفا میں چاہیے سجدوں کا اِہتمام
شیداؔ خود اپنے خون سے آؤ وضو کریں
شیدا چینی ۔ لیو ینگ وین (۱۹۳۱۔۲۰۱۵)، کولکتہ میں پیدا ہوئے، لیکن ۱۹۳۴ میں اُن کا خاندان جمشید پور منتقل ہو گیا جہاں اُنہوں نے بطور ڈینٹسٹ (دانتوں کے ڈاکٹر) کام کیا۔ اُن کے گھر میں پہلی زبان چینی بولی جاتی تھی، لیکن وہ سب اُردو میں مہارت رکھتے تھے۔ شیدا کی اِبتدائی تعلیم اُردو میں ہوئی، پھر وہ اِنگلش اسکول گئے، لیکن ہائی اسکول میں دوبارہ اُردو کی طرف لوٹ آئے۔ اُنہیں اُردو سے عشق ہو گیا اور اُنہوں نے بے شمار اشعار یاد کر لیے۔انہوں نے ۱۹۵۱ میں اپنا پہلی غزل پڑھی اور اکثر مشاعروں میں غزل کے ساتھ ایک چینی ساز ‘مُون لیوٹ’ (Moon Lute) بھی بجایا کرتے تھے۔ وہ ترقی پسند مصنفین کی تحریک (PWA) سے وابستہ تھے مگر زیادہ فعال نہیں تھے۔ ڈیکن ہیرالڈ (Deccan Herald) کو دیے گئے ایک انٹرویو میں انہوں نے کہا تھا: “میں پیدائشی طور پر بدھ مت کا پیروکار ہوں اور دل سے کمیونسٹ، اور اُردو میری روح کی زبان ہے۔ یہ کسی ایک مذہب کی زبان نہیں، بلکہ تہذیب اور انسانیت کی زبان ہے۔ میرے بچے عیسائی ہیں، میری بیٹیاں شیو اور سائی بابا میں سکون پاتی ہیں۔ ہم ایک چھت کے نیچے ایک چھوٹا سا ہندوستان ہیں۔” انہوں نے خود کئی نعتیں بھی لکھیں۔ ۱۹۶۲ کی بھارت-چین جنگ اور ۱۹۶۴ کے مذہبی فسادات کے دوران اپنے ساتھ ہونے والے برے برتاؤ نے اُنہیں کافی مایوس اور دلبرداشتہ کیا۔ ان کی زندگی کے آخری ایّام میں، جب وہ بستر پر تھے، ان کے دوستوں اور خاندان نے ان کا کلام جمع کر کے شائع کروایا۔
۱
کرتے ہیں گر وہ حوصلۂ گفتگو کریں
اِک شرط ہے کہ بات مگر رُو بہ رُو کریں
یہاں اہم سوال یہ ہے کہ ‘وہ’ کون ہے؟ اس کا محبوب یوں ہو سکتا ہے کہ اُس نے بہت سے جھوٹے وعدے کئے ہیں اور اب شرمندگی کی وجہ سے عاشق سے بات کرنا چاہتا ہے۔ عاشق ناراز ہے اور اِلزام دھرنے اور للکارنے کو تیار ہے۔ گفتگو کے لئے راضی تو ہے مگر شرط ہے کہ آمنے سامنے ہو تاکہ شرمندگی دیکھ سکے۔ اِس بات کا بھی امکان ہے کہ یہاں ‘وہ’ سے مُراد مخالف یا طاقتور حکمران ہیں۔ یعنی اگر وہ بات کرنے کی ہِمّت پیدا کر سکیں تو میں تیّار ہوں، مگر ایک شرط ہے کہ بات آمنے سامنے ہونی چاہیے۔ یہ ایک طرح کا چیلنج ہے کہ جو کہنا ہے میرے منہ پر کہو۔
۲
آہ و فغانِ بُلبُل نالاں تو سن چکے
اب خاموشیِ گُل سے ذرا گفتُگُو کریں
یہاں شاعر روایتی طریقوں سے ہٹ کر ‘بُلبُلِ نالاں’ (رونے والی بلبل) کے ماتم سے آگے بڑھ گیا ہے۔ ‘گل کی خاموشی’ کی طرف توجہ دلا کر شاعر یہ کہنا چاہتا ہے کہ گہری سمجھ بوجھ ان باتوں میں چھپی ہوتی ہے جو کہی نہیں جاتیں ۔۔ یعنی قدرت کی ان کہی سچائیاں یا محبوب کا وہ وقار جو خاموشی میں ہے۔
۳
آنکھیں بِچھائے اہلِ ستم ہیں کھڑے ہوئے
آؤ صلیبِ دار کو زیبِ گُلُو کریں
‘
آنکھیں بچھانا’ کا مطلب ہے کسی کا بے صبری سے انتظار کرنا (عام طور پر یہ مثبت/positive معنوں میں استعمال ہوتا ہے)۔ یہاں ‘اہلِ ستم’ (ظالم لوگ) بے صبری سے یہ دیکھنے کے لیے کھڑے ہیں کہ اب کیا ہوگا یا آپ کیا کریں گے۔ خوف سے دبنے کے بجائے شاعر ہمیں دعوت دیتا ہے کہ ہم سولی کے پھندے کو اپنے گلے کا ہار بنا لیں۔ یہ ظلم کے سامنے اپنی دیانتداری اور قربانی کو خوبصورتی کے ساتھ قبول کرنے کا پیغام ہے۔
۴
غم پر نہ اختیار زمانہ نہ غم گُسار
ایسے میں وصلِ یار کی کیا آرزو کریں
شاعر اپنی مکمل بے بسی کا ذکر کر رہا ہے ۔۔ دنیا بے حس ہے اور کوئی غم بانٹنے والا (غم گسار) نہیں ہے۔ ایسی مایوسی کی حالت میں محبوب سے ملنے کی آرزو کرنا فضول معلوم ہوتا ہے۔
۵
نذرِ بہار ہو چکا ہے ایک ایک تار
اب پیرہن کہاں کہ جسے ہم رفو کریں
زندگی کا لباس تار تار ہو چکا ہے؛ اس کا ایک ایک دھاگہ بہار کے جنون یا دیوانگی کی نذر (قربان) ہو گیا ہے۔ اب کوئی ایسا کپڑا باقی نہیں بچا جسے ہم رفو کر سکیں۔ یہ استعارہ انسان کے مکمل برباد ہو جانے کی علامت ہے، جہاں ماضی کی مرمت کے لیے کچھ باقی نہیں بچا۔
۶
عنقا ہی ہو چکی ہے زمانے سے عافیت
کرنے کو یوں تلاش تو ہم کُو بہ کُو کریں
عافیت (سکون اور سلامتی) اب ‘عنقا’ کی طرح ایک فرضی پرندہ بن چکی ہے جو کہیں نہیں ملتا۔ اس تلاش میں، میں خوشی سے گلی گلی (کو بہ کو) گھومتا مگر جب عافیت کا وجود ہی نہیں ہے تو اسے کہاں تلاش کریں۔
۷
تسخیرِ کائنات کا سودا بُرا نہیں
لیکن بقدرِ ظرف ہی یہ آرزو کریں
کائنات کو فتح کرنے کا ارادہ برا نہیں ہے۔ لیکن شاعر ایک اہم بات کہتا ہے: انسان کی خواہشیں اس کے اپنے ‘ظرف’ یعنی اس کی صلاحیت کے مطابق ہونی چاہئیں۔ یہ بڑی امنگوں اور اپنی حقیقت کی پہچان کے درمیان ایک توازن کی بات ہے۔
۸
راہِ وفا میں چاہیے سجدوں کا اِہتمام
شیداؔ خود اپنے خون سے آؤ وضو کریں
وفاداری کے راستے میں مکمل وابستگی کی ضرورت ہے۔ شاعر ایک انقلابی قدم کی بات کرتا ہے: وضو پانی سے نہیں بلکہ اپنے خون سے کرنا۔ اس کا مطلب یہ ہے کہ اپنی بات اور عشق کو سچا ثابت کرنے کے لیے آخری قربانی ہی وہ واحد راستہ ہے جو انسان کو پاک کر دیتا ہے اور محبت کے وعدے کو پورا کرتا ہے۔
ख़ून से आओ वुज़ू करें – शैदा चीनी लियु यंग वेन
१
करते हैं गर वो हौसला-ए गुफ़्तुगू करें
एक शर्त है के बात मगर रू-ब-रू करें
२
आह-ओ-फ़ुग़ान-ए बुलबुल-ए नालां तो सुन चुके
अब ख़ामोशी-ए गुल से ज़रा गुफ़्तुगू करें
३
आंखें बिछाए अहल-ए सितम हैं खड़े हुए
आओ सलीब-ए दार को ज़ेब-ए गुलू करें
४
ग़म पर न एख़्तियार ज़माना न ग़म-गुसार
ऐसे में वस्ल-ए यार की क्या आर्ज़ू करें
५
नज़्र-ए बहार हो चुका है एक-एक तार
अब पैरहन कहाँ के जिसे हम रफ़ू करें
६
अन्क़ा ही हो चुकी है ज़माने से आफ़ियत
करने को यूँ तलाश तो हम कू-ब-कू करें
७
तस्ख़ीर-ए का’एनात का सौदा बुरा नहीं
लेकिन ब-क़द्र-ए ज़र्फ़ ही ये आर्ज़ू करें
८
राह-ए वफ़ा में चाहिए सज्दों का एहतेमाम
शैदा ख़ुद अपने ख़ून से आओ वुज़ू करें
शैदा चीनी – लिउ युंग वेन (१९३१-२०१५), कलकत्ता में पैदा हुए थे, लेकिन १९३४ में उनका परिवार जमशेदपुर चला गया जहाँ उन्होंने एक डेंटिस्ट के रूप में काम किया। उनके घर की पहली भाषा चीनी थी, लेकिन वो सभी उर्दू भी बोलते थे। उनकी प्रथम स्कूल शिक्षा उर्दू में हुई, फिर वो इंग्लिश स्कूल गए, लेकिन हाई स्कूल में वो दोबारा उर्दू की ओर लौट आए। उन्हें उर्दू से इतना लगाव हुआ के उन्होंने हज़ारों शे’र याद कर लिये। उन्होंने १९५१ में पहली ग़ज़ल पढ़ी और अक्सर मुशा’एरों में अपनी ग़ज़ल के साथ एक चीनी वाद्य यंत्र ‘मून ल्यूट’ (Moon Lute) भी बजाया करते थे। वे ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ (PWA) के सदस्य थे, हालांके उसमें बहुत सक्रिय नहीं रहे। ‘डक्कन हेरल्ड’ को दिये एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था: “मैं जन्म से बौद्ध हूँ और दिल से कम्युनिस्ट, और उर्दू मेरी आत्मा की भाषा है। ये किसी एक धर्म की भाषा नहीं है, बल्के संस्कृति और इंसानियत की भाषा है। मेरे बच्चे ईसाई हैं, मेरी बेटियाँ शिव और साई बाबा में शांति पाती हैं – हम एक ही छत के नीचे एक छोटा सा हिंदुस्तान हैं।”
उन्होंने ख़ुद कई ना’तें (इसलाम के बानी मोहम्मद की प्रशंसा में कविताएं) भी लिखीं। १९६२ के भारत-चीन युद्ध और १९६४ के दंगों के दौरान अपने साथ हुए दुर्व्यवहार से वो बहुत निराश हुए थे। उनके जीवन के अंतिम समय में, जब वे बिस्तर पर थे, तब उनके दोस्तों और परिवार ने उनका काम इकट्ठा करके प्रकाशित करवाया।
१
करते हैं गर वो हौसला-ए गुफ़्तुगू करें
एक शर्त है के बात मगर रू-ब-रू करें
यहाँ मुख्य सवाल ये है के ‘वो’ कौन है? महबूब यूं हो सकता है के उस ने बहुत से झूटे वा’दे किये हैं और अब शरम और पछतावे के कारण बात करना चाहता है। प्रेमी बात करने के लिये तय्यार है लैकिन सामने बैठ कर ताके पूरी शर्मिंदगी देख सके। ये भी संभावना है के ‘वो’ से मतलब विरोधी या ताक़तवर शासक हैं। यानी, अगर वो बातचीत करने की हिम्मत जुटा सकें तो मैं तय्यार हूँ, बस एक शर्त है के बातचीत आमने-सामने होनी चाहिए। ये एक तरह की चुनौती लगती है – के जो कहना है मेरे मुँह पर कहो।
२
आह-ओ-फ़ुग़ान-ए बुलबुल-ए नालां तो सुन चुके
अब ख़ामोशी-ए गुल से ज़रा गुफ़्तुगू करें
यहाँ कवि पारंपरिक तरीक़े से हटकर ‘बुलबुल-ए-नालां’ (रोती हुई बुलबुल) के मातम से आगे निकल गया है। ‘फूल की खांमोशी’ की ओर ध्यान दिलाकर कवि ये कहना चाहता है के गहरी समझ उन बातों में होती है जो अनकही रह जाती हैं – यानी महबूब की सहज गरिमा या क़ुदरत की अनकही सच्चाइयों में।
३
आंखें बिछाए अहल-ए सितम हैं खड़े हुए
आओ सलीब-ए दार को ज़ेब-ए गुलू करें
‘आंखें बिछाना’ का मतलब है किसी का बेसब्री से इंतेज़ार करना (आम तौर पर ये सकारात्मक स्वागत के लिए इस्तेमाल होता है)। यहाँ ‘अहल-ए-सितम’ (ज़ुल्म करने वाले लोग) बेसब्री से इंतेज़ार कर रहे हैं ये देखने के लिये के अब क्या होगा या आप क्या करेंगे। डर के मारे दुबकने के बजाय कवि हमें दावत देता है के हम फांसी के फंदे (सलीब-ए-दार) को अपने गले का हार (ज़ेब-ए-गुलू) बना लें। ये ज़ुल्म के सामने अपनी ईमानदारी और बलिदान को ख़ूबसूरती के साथ स्वीकार करने की दावत है।
४
ग़म पर न एख़्तियार ज़माना न ग़म-गुसार
ऐसे में वस्ल-ए यार की क्या आर्ज़ू करें
कवि अपनी पूरी बेबसी को दर्शा रहा है – दुनिया बेहिस (insensitive) है और कोई दुख बाँटने वाला (ग़म-गुसार) नहीं है। ऐसी अस्तित्वगत निराशा की स्थिति में महबूब से मिलन (वस्ल-ए-यार) की इच्छा करना व्यर्थ लगता है।
५
नज़्र-ए बहार हो चुका है एक-एक तार
अब पैरहन कहाँ के जिसे हम रफ़ू करें
जीवन का वस्त्र तार-तार हो चुका है; इसका एक-एक धागा वसंत के जुनून या दीवानगी की भेंट (नज़्र) चढ़ चुका है। अब वो कपड़ा ही नहीं बचा जिस को रफ़ू या मरम्मत की जा सके। ये रूपक इंसान के पूरी तरह बरबाद हो जाने को दर्शाता है, जहाँ अतीत को सुधारने के लिये कुछ भी बाक़ी नहीं बचा है।
६
अन्क़ा ही हो चुकी है ज़माने से आफ़ियत
करने को यूँ तलाश तो हम कू-ब-कू करें
आफ़ियत (शांति और सुरक्षा) अब ‘अन्क़ा’ की तरह एक काल्पनिक पक्षी बन चुकी है जो दुनिया में कहीं नहीं मिलता। इस खोज में, मैं ख़ुशी-ख़ुशी गली-गली (कू-ब-कू) भटकता, लेकिन जब शांति का कोई वजूद ही नहीं है तो उसे कहाँ ढूँढा जाए।
७
तस्ख़ीर-ए का’एनात का सौदा बुरा नहीं
लेकिन ब-क़द्र-ए ज़र्फ़ ही ये आर्ज़ू करें
ब्रह्मांड को जीतने (तसख़ीर-ए-काएनात) का इरादा बुरा नहीं है। लेकिन कवि एक ज़रूरी शर्त जोड़ता है: इंसान की इच्छाएँ उसकी अपनी क्षमता (ज़र्फ़) के अनुसार होनी चाहिए। ये बड़ी महत्वाकांक्षा और आत्म-जागरूकता के बीच संतुलन का विचार है।
८
राह-ए वफ़ा में चाहिए सज्दों का एहतेमाम
शैदा ख़ुद अपने ख़ून से आओ वुज़ू करें
वफ़ादारी के रास्ते में पूर्ण समर्पण की आवश्यकता होती है। कवि अंत में शुद्धिकरण के एक क्रांतिकारी क़दम की बात करता है: वुज़ू (धार्मिक स्नान) पानी से नहीं बल्के अपने ख़ून से करना। इसका मतलब ये है के अपनी निष्ठा और प्रेम को सिद्ध करने के लिये अंतिम बलिदान ही वो एकमात्र रास्ता है जो आध्यात्मिक पवित्रता लाता है और प्रेम के वादे को पूरा करता है।
Khoon se aa’o vuzuu kar’eN – shaida chiini-liy yuNg ven
1
kart’e haiN gar voh hausla-e guftugu kar’eN
ek shart hai keh baat magar ruu-ba-ruu kar’eN
2
aah-o-fuGhaan-e bulbul-e nalaaN to sun chuk’e
ab Khaamoshi-e gul se zara guftugu kar’eN
3
aaNkheN bichhaa’e ahl-e sitam haiN khaR’e hu’e
aao saleeb-e daar ko zeb-e gulu kar’eN
4
Gham par na eKhtiyaar, zamaana na Gham-gusaar
aise meN vasl-e yaar ki kya aarzu kar’eN
5
nazr-e bahaar ho chuka hai a’ek-a’ek taar
ab pairahan kahan keh jis’e hum rafu kar’eN
6
anqa hi ho chuki hai zamaane se aafiyat
karne ko yuN talaash to hum kuu-ba-kuu kar’eN
7
tasKhiir-e kaa’enaat ka sauda bura nahiN
lekin ba-qadr-e zarf hi ye aarzu kar’eN
8
raah-e vafa meN chaahiye sajdoN ka ehtemaam
shaida Khud apne Khoon se aa’o vuzuu kar’eN
shaida chiini-liu yuNg ven (1931-2015), born in kalkatta, but family moved to jamshedpur in 1934 where shaida lived and worked as a dentist. His family spoke Chinese as their first language, but were fluent in urdu. His early schooling was in urdu, switched to English and then back to urdu in high school. Fell in love with it and memorised ash’aar. He read his first Ghazal at a mushaa’era in 1951. He played a Chinese instrument known as the Moon Lute often along with his Ghazal reading at mushaa’era. He was a member of the Progressive Writers’ Association but not very active in it. In an interview to the Deccan Herald he said, “”I am a Buddhist by birth and a communist by heart, but Urdu is the language of my soul. It is not the language of any one religion; it is the language of culture and humanity. My children are Christians, my daughters find peace in Shiva and Sai Baba—we are a miniature India under one roof.” He himself has written several n’aat – odes to mohammed, the founder of islaam. He was deeply disappointed (perhaps disillusioned) because of his mistreatment after the India-China war of 1962 and later religious riots of 1964. His work was collected and published by family and friends towards the end of his life, while he was bedridden.
1
kart’e haiN gar voh hausla-e guftugu kar’eN
ek shart hai keh baat magar ruu-ba-ruu kar’eN
The key question is – who is voh. It can be the beloved in the following scenario. The beloved has made many false promises and now regretful and wants to talk things over. The lover is ready, but would like a face to face discussion so he can drive home her regret and shame. It is also likely that by voh he means the adversary or perhaps powerful rulers. Thus, if they can summon the courage for a conversation, I am ready, except that there is one condition – the conversation has to be face to face. This seems to be a challenge – say what you have to say to my face.
2
aah-o-fuGhaan-e bulbul-e nalaaN to sun chuk’e
ab Khaamoshi-e gul se zara guftugu kar’eN
Here, the poet moves beyond the conventional, laments of the “wailing nightingale.” By shifting attention to the “silence of the rose,” the poet suggests that deep understanding lies in what is left unsaid—in the quiet, inherent grace of the beloved or the unspoken truths of nature.
3
aaNkheN bichhaa’e ahl-e sitam haiN khaR’e hu’e
aao saleeb-e daar ko zeb-e gulu kar’eN
aaNkheN bichaana is saying the implies eagerly waiting for something or someone (usually it is used in a positive welcoming sense). Here “people of tyranny” (ahl-e sitam) are waiting eagerly to see what will happen/what you will do. Instead of cowering in fear, the poet invites us to embrace the “cross of the gallows” (saleeb-e daar) as an ornament for our throats (zeb-e gulu). It is a call to accept martyrdom or sacrifice as a mark of beauty and integrity in the face of oppression.
4
Gham par na eKhtiyaar, zamaana na Gham-gusaar
aise meN vasl-e yaar ki kya aarzu kar’eN
The poet reflects on total helplessness—the world is indifferent and there are no comforters (Gham-gusaar). In such a state of existential despair, the longing for union (vasl-e yaar) feels futile.
5
nazr-e bahaar ho chuka hai a’ek-a’ek taar
ab pairahan kahan keh jis’e hum rafu kar’eN
The garment of life is worn thin; every thread has been surrendered/sacrificed (nazr-e bahaar) to the passionate/madness of spring. There is no fabric left to mend (rafu kar’eN). This metaphor represents the total depletion of the self, nothing remains of the past to be repaired or salvaged.
6
anqa hi ho chuki hai zamaane se aafiyat
karne ko yuN talaash to hum kuu-ba-ku kar’eN
aafiyat (peace, security, safety) has become an anqa – a mythical, non-existent bird. It is nowhere to be found in this world. In this search, I would happily have gone from street to street (kuu-ba-kuu) but there is no aafiyat to be found.
7
tasKhiir-e kaa’enaat ka sauda bura nahiN
lekin ba-qadr-e zarf hi ye aarzu kar’eN
The ambition to conquer the universe (tasKhiir-e kaa’enaat) is noble in spirit. However, the poet adds a crucial caveat: one’s desires should be measured by the capacity of one’s vessel (ba-qadr-e zarf). It is a meditation on the balance between grand ambition and self-awareness.
8
raah-e vafa meN chaahiye sajdoN ka ehtemaam
shaida Khud apne Khoon se aa’o vuzuu kar’eN
In the path of fidelity (raah-e vafa), true devotion requires a total commitment. The poet concludes with a radical act of purification: performing vuzuu (ritual ablution) not with water, but with one’s own blood. It signifies that the ultimate sacrifice is the only way to attain spiritual cleanliness and fulfill the promise of love.