Khamoshi m’eN zabaaN hoti hai-baam dev sharma rishi paTialavi

خموشی  میں  زباں  ہوتی  ہے  ۔  بام  دیو  شرما  رشیؔ  پٹیالوی

۱

دل  کی  رُوداد  نگاہوں  سے  بیاں  ہوتی  ہے

درد  مندوں  کی  خموشی  میں  زباں  ہوتی  ہے

۲

خود  فراموش  نہ  جب  تک  ہو  کوئی  کیا  سمجھے

بے  نِشانی  بھی  محبت  میں  نِشاں  ہوتی  ہے

۳

نقشِ  امید  ہیں  بن  بن  کے  بگڑتے  کیا  کیا

زندگی  رقص  گہہِ  ریگِ  رواں  ہوتی  ہے

۴

جو  ترے  حُسنِ  نظر  گیر  سے  شاداب  نہیں

اُن  بہاروں  کے  مقدر  میں  خزاں  ہوتی  ہے

۵

وہ  بُرا  وقت  محبت  میں  نہ  دیکھے  کوئی

جب  محبت  بھی  طبیعت  پہ  گراں  ہوتی  ہے

۶

یوں  بھی  ہوتی  ہے  ترے  غم  کی  نوازِش  اکثر

لب  پہ  ہوتی  ہے  ہنسی  دل  میں  فغاں  ہوتی  ہے

۷

جاں  نثاری  سے  ہے  توقیرِ  محبت  لیکن

دیکھنا  یہ  ہے  کہ  تکمیل  کہاں  ہوتی  ہے

۸

ہم  وہاں  ہو  کے  بھی  موجود  کہاں  ہوتے  ہیں

ہم  نشینوں  میں  تری  بات  جہاں  ہوتی  ہے

۹

چونک  اٹھتا  ہے  غمِ  ہِجر  کا  احساس  رشیؔ

اُن  کے  آنے  پہ  بھی  تسکین  کہاں  ہوتی  ہے

 

بام دیو شرما رشیؔ پٹیالوی (۱۹۱۷۔۱۹۹۹) پنجاب کے ضلع ہوشیار پور میں پیدا ہوئے تھے۔ وہ نسیمؔ نور محلی کے شاگرد تھے، اور ان کا ادبی سلسلہ پنڈت لبھو رام جوشؔ ملسیانی سے ہوتا ہوا براہِ راست داغؔ دہلوی تک جاتا ہے۔ انہوں نے کئی سالوں تک اسٹیٹ بینک آف پٹیالہ میں ملازمت کی، جس کے بعد وہ چنڈی گڑھ چلے گئے اور وہاں مینجمنٹ کے اعلیٰ عہدوں پر کام کیا۔ انہوں نے بہت خوبصورت غزلیں اور کئی ترقی پسند نظمیں لکھی ہیں، جن میں خالص اردو کے ساتھ ساتھ سادہ ہندوستانی زبان بھی استعمال کی گئی ہے۔ وہ دوستوں کے ایک ایسے گروہ کا حصہ تھے جو ایک دوسرے کے مذہبی تہوار مل کر مناتے تھے اور مشاعرے کرواتے تھے، تاکہ تقسیم کے پہلے اور بعد کے مشکل حالات میں بھائی چارہ اور امن قائم رہے۔

۱

دل  کی  رُوداد  نگاہوں  سے  بیاں  ہوتی  ہے

درد  مندوں  کی  خموشی  میں  زباں  ہوتی  ہے

 

شاعر  کہتا  ہے  کہ  دل  کی  کہانی  سنانے  کے  لیے  لفظوں  کی  ضرورت  نہیں  ہوتی،  بلکہ  یہ  عاشق  کی  آنکھوں  سے  صاف  ظاہر  ہو  جاتی  ہے۔  وہ  لوگ  جو  عشق  کے  گہرے  دکھ  میں  ہوتے  ہیں،  اُن  کی  خاموشی  کا  مطلب  یہ  نہیں  کہ  وہ  کچھ  کہہ  نہیں  رہے۔  بلکہ  اُن  کی  خاموشی  خود  بولتی  ہے  اور  اُن  کے  درد  کو  اُن  لوگوں  تک  پہنچا  دیتی  ہے  جو  اِسے  سمجھنے  کی  صلاحیت  رکھتے  ہیں۔

۲

خود  فراموش  نہ  جب  تک  ہو  کوئی  کیا  سمجھے

بے  نِشانی  بھی  محبت  میں  نِشاں  ہوتی  ہے

 

اس  شعر  میں  محبت  کی  اس  حالت  کا  ذکر  ہے  جہاں  انسان  اپنی  ہستی  کو  بھول  جاتا  ہے۔  جب  تک  ایک  عاشق  اپنی  انا  اور  اپنی  پہچان  کو  محبوب  (یا  خالق)  کی  یاد  میں  مِٹا  نہ  دے،  وہ  محبت  کی  حقیقت  نہیں  سمجھ  سکتا۔  اس  حال  میں  اپنی  پہچان  کھو  دینا  (بے  نشانی)  ہی  ایک  سچے  عاشق  کی  سب  سے  بڑی  نشانی  بن  جاتی  ہے۔

۳

نقشِ  امید  ہیں  بن  بن  کے  بگڑتے  کیا  کیا

زندگی  رقص  گہہِ  ریگِ  رواں  ہوتی  ہے

 

رِشیؔ  نے  زندگی  کو  صحرا  کی  اُڑتی  ہوئی  ریت  سے  تشبیہ  دی  ہے۔  جس  طرح  ریت  کے  ٹیلوں  پر  ہوا  سے  نقش  بنتے  ہیں  اور  فوراً  مٹ  جاتے  ہیں،  ویسے  ہی  ہماری  امیدیں  اور  خواب  (نقشِ  امید)  ہر  پل  بنتے  اور  ٹوٹتے  رہتے  ہیں۔  یہ  شعر  دکھاتا  ہے  کہ  انسانی  خواہشات  کتنی  ناپائیدار  ہیں  اور  تقدیر  کتنی  طاقتور  ہے۔

۴

جو  ترے  حُسنِ  نظر  گیر  سے  شاداب  نہیں

اُن  بہاروں  کے  مقدر  میں  خزاں  ہوتی  ہے

 

شاعر  محبوب  کے  دلکش  حُسن  کی  تعریف  کرتے  ہوئے  کہتا  ہے  کہ  خوشی  کا  کوئی  بھی  لمحہ  یا  بہار  کا  کوئی  بھی  رنگ  اگر  محبوب  کی  توجہ  اور  سائے  سے  محروم  ہے،  تو  وہ  ادھورا  ہے۔  جس  بہار  کو  محبوب  کے  حُسن  سے  تازگی  نہ  ملے،  اس  کا  نصیب  صرف  مرجھا  جانا  اور  خزاں  بن  جانا  ہی  ہے۔

۵

وہ  بُرا  وقت  محبت  میں  نہ  دیکھے  کوئی

جب  محبت  بھی  طبیعت  پہ  گراں  ہوتی  ہے

 

یہ  شعر  جذبات  کے  تھک  جانے  کی  عکاسی  کرتا  ہے۔  شاعر  دعا  کرتا  ہے  کہ  کسی  پر  وہ  بُرا  وقت  نہ  آئے  جب  اُسے  اپنی  محبت  ہی  بوجھ  (گراں)  لگنے  لگے۔  یہ  اس  افسوسناک  صورتِ  حال  کا  ذکر  ہے  جہاں  وہ  جذبہ  جو  کبھی  جینے  کی  وجہ  تھا،  اب  طبیعت  کے  لیے  ایک  تھکا  دینے  والا  وزن  بن  گیا  ہو۔

۶

یوں  بھی  ہوتی  ہے  ترے  غم  کی  نوازِش  اکثر

لب  پہ  ہوتی  ہے  ہنسی  دل  میں  فغاں  ہوتی  ہے

 

محبوب  کے  دیے  ہوئے  دُکھ  کا  انداز  بڑا  عجیب  ہوتا  ہے،  جسے  شاعر  نے  طنز  سے  “نوازش”  (مہربانی)  کہا  ہے۔  یہ  غم  انسان  کو  دوہری  زندگی  گزارنے  پر  مجبور  کر  دیتا  ہے:  دنیا  کو  دکھانے  کے  لیے  ہونٹوں  پر  مسکراہٹ  ہوتی  ہے،  جبکہ  دل  کے  اندر  درد  اور  آہ  و  زاری  (فغاں)  کا  طوفان  چھپا  ہوتا  ہے۔

۷

جاں  نثاری  سے  ہے  توقیرِ  محبت  لیکن

دیکھنا  یہ  ہے  کہ  تکمیل  کہاں  ہوتی  ہے

 

اگرچہ  محبت  میں  جان  قربان  کر  دینے  سے  محبت  کی  عزت  بڑھتی  ہے،  لیکن  شاعر  کہتا  ہے  کہ  صرف  قربانی  ہی  سب  کچھ  نہیں  ہے۔  اصل  سوال  یہ  ہے  کہ  محبت  مکمل  (تکمیل)  کہاں  ہوتی  ہے؟  یہ  ایک  گہری  بات  ہے  کہ  کیا  محبت  موت  سے  پوری  ہوتی  ہے  یا  محبوب  (یا  خدا)  سے  مل  جانے  کے  کسی  بلند  درجے  پر۔

۸

ہم  وہاں  ہو  کے  بھی  موجود  کہاں  ہوتے  ہیں

ہم  نشینوں  میں  تری  بات  جہاں  ہوتی  ہے

 

جب  شاعر  اپنے  دوستوں  (ہم  نشینوں)  میں  بیٹھا  ہوتا  ہے  اور  وہاں  محبوب  کا  ذکر  چھڑ  جائے،  تو  وہ  اپنی  سوچ  میں  اتنا  کھو  جاتا  ہے  کہ  اسے  محفل  کی  خبر  نہیں  رہتی۔  جسمانی  طور  پر  وہ  وہاں  ہوتا  ہے،  لیکن  روحانی  طور  پر  وہ  محبوب  کی  دنیا  میں  پہنچ  چکا  ہوتا  ہے۔

۹

چونک  اٹھتا  ہے  غمِ  ہِجر  کا  احساس  رشیؔ

اُن  کے  آنے  پہ  بھی  تسکین  کہاں  ہوتی  ہے

 

آخری  شعر  میں  رشیؔ  جدائی  کے  گہرے  صدمے  کا  ذکر  کرتے  ہیں۔  علیحدگی  کا  دکھ  دل  میں  اتنا  گہرا  اتر  چکا  ہے  کہ  جب  محبوب  سامنے  آ  بھی  جائے،  تو  شاعر  سکون  محسوس  کرنے  کے  بجائے  چونک  اٹھتا  ہے  اور  گھبرا  جاتا  ہے  (شاید  اس  ڈر  سے  کہ  وہ  پھر  چلے  نہ  جائے)۔  دکھ  کی  عادت  اتنی  پکی  ہو  گئی  ہے  کہ  اب  وصل  کا  لمحہ  بھی  اسے  پوری  طرح  آرام  (تسکین)  نہیں  دے  پاتا۔

 

ख़मोशी में ज़बाँ होती है – बाम देव शर्मा ऋषि पटियालवी

दिल की रूदाद निगाहों से बयाँ होती है

दर्द-मंदों की ख़मोशी में ज़बाँ होती है

ख़ुद-फ़रामोश न जब तक हो कोई क्या समझे

बे-निशानी भी मोहब्बत में निशाँ होती है

नक़्श-ए उम्मीद हैं बन बन के बिगड़ते क्या क्या

ज़िंदगी रक़्स-गह-ए रेग-ए रवाँ होती है

जो तेरे हुस्न-ए नज़र-गीर से शादाब नहीं

उन बहारों के मुक़द्दर में ख़िज़ाँ होती है

वो बुरा वक़्त मोहब्बत में न देखे कोई

जब मोहब्बत भी तबी’अत पे गिराँ होती है

यूँ भी होती है तेरे ग़म की नवाज़िश अक्सर

लब पे होती है हँसी दिल में फ़ुग़ाँ होती है

जाँ-निसारी से है तौक़ीर-ए मोहब्बत लेकिन

देखना ये है के तक्मील कहाँ होती है

हम वहाँ हो के भी मौजूद कहाँ होते हैं

हम-नशीनों में तेरी बात जहाँ होती है

चौंक उठता है ग़म-ए हिज्र का एहसास ऋषि

उन के आने पे भी तस्कीन कहाँ होती है

 

बाम देव शर्मा ऋषि पटियालवी (१९१७-१९९९) पंजाब के होशियारपुर में पैदा हुए थे। वो नसीम नूर महली के शागिर्द (शिष्य) थे, और उनका साहित्यिक सिलसिला पंडित लभुराम जोश मलसियानी से होता हुआ सीधे दाग़ देहलवी तक जाता है। उन्होंने कई साल तक स्टेट बैंक ऑफ़ पटियाला में नौकरी की, जिसके बाद वो चंडीगढ़ चले गए और वहाँ मैनेजमेंट के ऊँचे पदों पर काम किया। उन्होंने बहुत ही सुंदर ग़ज़लें और कई प्रगतिशील नज़्में लिखी हैं, जिनमें शुद्ध उर्दू के साथ-साथ बोलचाल की हिंदुस्तानी भाषा का भी इस्तेमाल किया गया है। वे दोस्तों के एक ऐसे ग्रुप का हिस्सा थे जो एक-दूसरे के धार्मिक त्योहार मिलकर मनाते थे और मुशायरे करवाते थे, ताकि बँटवारे के पहले और बाद के मुश्किल वक़्त में आपसी भाईचारा और शांति बनी रहे।

दिल की रूदाद निगाहों से बयाँ होती है

दर्द-मंदों की ख़मोशी में ज़बाँ होती है

 

कवि कहते हैं के दिल का हाल सुनाने के लिये शब्दों की ज़रूरत नहीं होती, ये आशेक़ की आँखों से साफ़ पता चल जाता है। जो लोग इश्क़ के गहरे दुख में होते हैं, उन की ख़ामोशी का मतलब ये नहीं के वो कुछ कह नहीं रहे हैं। असल में उन की ख़ामोशी ही बोलती है और उन के दर्द को उन लोगों तक पहुँचा देती है जो उसे समझने का हुनर रखते हैं।

ख़ुद-फ़रामोश न जब तक हो कोई क्या समझे

बे-निशानी भी मोहब्बत में निशाँ होती है

 

इस शे’र में मोहब्बत की उस हालत का ज़िक्र है जहाँ आशेक़ ख़ुद को भूल जाता है। जब तक एक चाहने वाला अपनी पहचान और अपनी ‘मैं/अना/अहंकार’ को महबूब की याद में मिटा न दे, वो मोहब्बत की अस्लियत नहीं समझ सकता। ऐसी हालत में अपनी पहचान खो देना (बे-निशानी) ही एक सच्चे प्रेमी की सब से बड़ी पहचान बन जाती है।

नक़्श-ए उम्मीद हैं बन बन के बिगड़ते क्या क्या

ज़िंदगी रक़्स-गह-ए रेग-ए रवाँ होती है

 

ऋषि ने ज़िंदगी की तुलना रेगिस्तान की उड़ती/बहती/बदलती हुई रेत से की है। जैसे रेगिस्तान में हवा से रेत पर नक़्श/निशान बनते हैं और तुरंत मिट जाते हैं, वैसे ही हमारी उम्मीदें और सपने (नक़्श-ए उम्मीद) हर पल बनते और टूटते रहते हैं। ये दिखाता है के इंसान की इच्छाएँ कितनी कच्ची हैं और तक़्दीर कितनी ताक़तवर।

जो तेरे हुस्न-ए नज़र-गीर से शादाब नहीं

उन बहारों के मुक़द्दर में ख़िज़ाँ होती है

 

कवि महबूब की ख़ूबसूरती की तारीफ़ करते हुए कहते हैं के ख़ुशी का कोई भी पल या बहार का कोई भी रंग अगर महबूब की नज़र और उस की मौजूदगी से महरूम है, तो वो अधूरा है। जिस बहार को महबूब के हुस्न से ताज़गी न मिले, उस की क़िस्मत में सिर्फ़ मुरझाना और पतझड़ (ख़िज़ाँ) ही लिखा है।

वो बुरा वक़्त मोहब्बत में न देखे कोई

जब मोहब्बत भी तबी’यत पे गिराँ होती है

 

ये शे’र जज़्बात के थक जाने की बात करता है। कवि दुआ करते हैं के किसी पर वो बुरा वक़्त न आए जब उसे अपनी मोहब्बत ही बोझ (गिराँ) लगने लगे। ये उस दुखद घड़ी का ज़िक्र है जहाँ वो रिश्ता जो कभी जीने की वजह था, अब मन के लिये एक थका देने वाला भार बन गया हो।

यूँ भी होती है तेरे ग़म की नवाज़िश अक्सर

लब पे होती है हँसी दिल में फ़ुग़ाँ होती है

 

दुख का अंदाज़ बड़ा अजीब होता है। ये ग़म इंसान को दोहरी ज़िंदगी जीने पर मज्बूर कर देता है: दुनिया को दिखाने के लिये होंठों पर मुस्कुराहट होती है, जब के दिल के अंदर दर्द और रोने की आवाज़ (फ़ुग़ाँ) छुपी होती है।

जाँ-निसारी से है तौक़ीर-ए मोहब्बत लेकिन

देखना ये है के तक्मील कहाँ होती है

 

मोहब्बत में जान क़ुर्बान कर देने से प्यार की इज़्ज़त (तौक़ीर) ज़रूर बढ़ती है, लेकिन कवि कहते हैं के सिर्फ़ क़ुर्बानी ही आख़िरी मंज़िल नहीं है। असली सवाल ये है के मोहब्बत पूरी (तक्मील) कहाँ होती है? क्या ये मौत से पूरी होती है या किसी ऊँचे रूहानी मिलन से?

हम वहाँ हो के भी मौजूद कहाँ होते हैं

हम-नशीनों में तेरी बात जहाँ होती है

 

जब कवि अपने दोस्तों (हम-नशीनों) के बीच बैठा होता है और वहाँ महबूब का ज़िक्र छिड़ जाए, तो वो उस की सोच में इतना खो जाता है के उसे आसपास की ख़बर नहीं रहती। शरीर से वो वहाँ होता है, लेकिन मन से वो महबूब की दुनिया में पहुँच चुका होता है।

चौंक उठता है ग़म-ए हिज्र का एहसास ऋषि

उन के आने पे भी तस्कीन कहाँ होती है

 

आख़िरी शे’र में ऋषि जुदाई के गहरे सदमे की बात करते हैं। अलग रहने का दुख दिल में इतना गहरा बैठ गया है के जब महबूब सामने आ भी जाए, तो कवि/आशिक़ सुकून महसूस करने के बजाय घबरा जाता है (शा’एद इस डर से के वो फिर चला न जाए)। दुख की आदत इतनी पक्की हो गई है के अब मिलन का पल भी उसे पूरी तरह चैन (तस्कीन) नहीं दे पाता।

Khamoshi meN zabaaN hoti hai – baam dev sharma rishi paTialavi
1
dil ki ruudaad nigaahoN se bayaaN hoti hai
dard-mandoN ki Khamoshi meN zabaaN hoti hai
2
Khud-faraamosh na jab tak ho koi kya samjhe
be-nishaani bhi mohabbat meN nishaaN hoti hai
3
naqsh-e ummid haiN ban ban ke bigaRte kya kya
zindagi raqs-gah-e reg-e ravaaN hoti hai
4
jo ter’e husn-e nazar-giir se shaadaab nahiN
un bahaaroN ke muqaddar meN KhizaaN hoti hai
5
vo buraa vaqt mohabbat meN na dekh’e ko’ii
jab mohabbat bhi tabii’at pe giraaN hoti hai
6
yuN bhi hoti hai ter’e Gham ki navaazish aksar
lab pe hoti hai haNsi dil meN fuGhaaN hoti hai
7
jaaN-nisaari se hai tauqiir-e mohabbat lekin
dekhna ye hai keh takmiil kahaaN hoti hai
8
ham vahaaN ho ke bhi maujuud kahaaN hot’e haiN
ham-nashinoN meN teri baat jahaaN hoti hai
9
chauNk uThtaa hai Gham-e hijr ka ehsaas rishi
un ke aan’e pe bhi taskiin kahaaN hoti hai

baam dev sharma rishi paTialavi (1917-1999) originally from hoshiarpur in punjab.  He was a disciple of nasim noormahli, with the line going through panDit labhuram josh malsiani to daaGh dehlavi.  He worked for the State Bank of Patiala for a number of years before moving to other management positions in chandigaRh.  He has written exquisite Ghazal in chaste urdu and many progressive nazm in chaste urdu as well as in spoken hindi/urdu/hindustani.  He was part of a group of friends who organized joint celebration of one another’s religious festivities and mushaa’era to promote communal harmony during tense times pre and post partition.
1
dil ki ruudaad1 nigaahoN se bayaaN hoti hai
dard-mandoN ki Khamoshi meN zabaaN hoti hai

1.story

The poet suggests that the story of the heart doesn’t require spoken words; it is reflected clearly in one’s eyes. For those who carry deep emotional pain (dard-mandoN), silence is not an absence of communication. Instead, their silence is eloquent and speaks louder than any speech could, conveying the depth of their suffering to those who can truly “read” them.
2
Khud-faraamosh1 na jab tak ho koi kya samjhe
be-nishaani2 bhi mohabbat meN nishaaN hoti hai

1.forgetting self, conquering ego 2.erasure, self-effacement

This verse touches on the mystical side of love—the concept of self-oblivion (Khud-faraamoshi). Until a lover loses their ego and self-awareness, absorbed in the thoughts of the (divine) beloved, they cannot understand the true nature of love. In this state, “having no mark” – (be-nishaani), losing identity becomes the greatest sign or identity (nishaaN) of a true lover.
3
naqsh1-e ummid2 haiN ban ban ke bigaRte kya kya
zindagi raqs-gah3-e reg-e-ravaaN4 hoti hai

1.sketch, image 2.hope 3.place of dance, dance floor 4.flowing sand, shifting sand-dune

rishi compares life to a “dance floor of shifting sand-dunes” (raqs-gah-e reg-e ravaaN). Just as patterns in the desert sand are formed and then instantly erased by the wind, our hopes and dreams (naqsh-e ummid) are constantly being built up and broken down. It captures the inherent instability and fleeting nature of human hopes and desires, portraying fate as more powerful.
4
jo ter’e husn-e nazar-giir1 se shaadaab2 nahiN
un bahaaroN ke muqaddar meN KhizaaN3 hoti hai

1.eye capturing 2.satiated, fulfilled 3.autumn, wither

Here, the poet praises the “eye-catching beauty” (husn-e nazar-giir) of the beloved. He argues that any spring or moment of joy that isn’t nourished or blessed by the beloved’s presence is destined to wither. Without that specific spark of beauty, even the most vibrant spring is doomed to become autumn (KhizaaN).
5
vo buraa vaqt mohabbat meN na dekh’e ko’ii
jab mohabbat bhi tabii’at1 pe giraaN2 hoti hai

1.disposition, temperament 2.heavy, burden

This is a poignant observation of emotional burnout. The poet prays that no one must experience that low point in a relationship where love itself begins to feel like a burden (giraaN) on one’s temperament. It describes the tragic moment when the passion that once gave life becomes an exhausting weight.
6
yuN bhi hoti hai ter’e Gham ki navaazish1 aksar2
lab3 pe hoti hai haNsi dil meN fuGhaaN4 hoti hai

1.courtesy, favour 2.often 3.lips 4.wail, sob

The “kindness” or “favour” (navaazish) of the grief caused by the beloved is paradoxical. It forces the lover into a state of dual existence: maintaining a smile on the lips for the world to see, while the heart is filled with intense lamentation or cries of pain (fuGhaaN). It highlights the dignity and hidden suffering of a lover.
7
jaaN-nisaari1 se hai tauqiir2-e mohabbat lekin
dekhna ye hai keh takmiil3 kahaaN hoti hai

1.sacrificing life, self-sacrifice 2.respect, honour 3.completion, end

While sacrificing one’s life (jaaN-nisaari) certainly grants honour (tauqiir) to the concept of love, the poet suggests that sacrifice alone isn’t the end goal. The real question is: where does love actually reach its “completion” or “perfection” (takmiil)? It’s a philosophical inquiry into whether love is fulfilled by death or by some higher state of union (perhaps with the divine).
8
ham vahaaN ho ke bhi maujuud1 kahaaN hot’e haiN
ham-nashinoN2 meN teri baat jahaaN hoti hai

1.present 2.companions, friends

This couplet describes the total absorption of the lover. When sitting among companions (ham-nashinoN), if the beloved is mentioned, the poet becomes so lost in thoughts of them that he is no longer “present” in the room. Physically he is there, but mentally and spiritually, he has traveled to the realm of the beloved.
9
chauNk1 uThtaa hai Gham-e hijr2 ka ehsaas3 rishi4
un ke aan’e pe bhi taskiin5 kahaaN hoti hai

1.startled 2.separation 3.feeling 4.pen-name 5.comfort

In the concluding verse, rishi expresses the trauma of long-term separation. The pain of being apart (Gham-e hijr) has become so deeply rooted that even when the beloved finally arrives, the poet is startled and anxious (fearful that she will leave soon) rather than at peace. The habit of sorrow is so strong that even a moment of union fails to provide true comfort (taskiin).  He is already thinking about/fearful of her departure.

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