Recitation
داغِ جِگر کو میں ۔ فانیؔ بدایونی
۱
آور نہ جانتا ہوں فریبِ نظر کو میں
دیکھوں اُلٹ کے پردۂ داغِ جِگر کو میں
۲
ہر نقشِ پا کو دیکھ کے دُھنتا ہوں سر کو میں
پہچانتا نہیں ہوں تِری رہگزر کو میں
۳
عہدِ خِزاں میں رفتۂ آشوبِ ہوش ہوں
بھولا ہوا ہوں موسمِ دیوانہ گر کو میں
۴
گُم کردہ راہ ہوں قدمِ اوّلیں کے بعد
پھر راہبر مجھے نہ مِلا راہبر کو میں
۵
وہ پائے شوق دے کہ جہت آشنا نہ ہو
پوچھوں نہ خِضر سے بھی کہ جاؤں کدھر کو میں
۶
مایوسِ اِنتظار ہوں مجنونِ اِضطراب
ہنستا ہوں دیکھ دیکھ کے دیوار و در کو میں
۷
بہلا نہ دل، نہ تیرگیِ شامِ غم گئی
یہ جانتا تو آگ لگاتا نہ گھر کو میں
۹
دو تین ہچکیوں میں دمِ نزع کہہ گیا
شرحِ درازِ زندگیِ مختصر کو میں
۱۰
فانیؔ دعائے مرگ کی فرصت نہیں مجھے
یعنی ابھی تو ڈھونڈ رہا ہوں اثر کو میں
محمد شوکت علی خان فانیؔ بدایونی (۱۸۷۹-۱۹۴۱) نے ۱۹۰۱ میں بی اے اور ۱۹۰۸ میں قانون کی پڑھائی پوری کی۔ ان کی وکالت کچھ خاص نہیں چلی، پہلے بدایوں اور پھر آگرہ میں اُنہوں نے کوشش کی پر کام جم نہیں پایا۔ ۱۹۳۲ تک وہ ایک مانے ہوئے شاعر بن چکے تھے، اسی لیے مہاراجہ کشن پرشاد نے انہیں حیدرآباد بلایا اور ایک نامی گرامی اسکول میں پرنسپل کی نوکری دے دی۔ لیکن شراب کی عادت ان کے لیے ایک بڑی مصیبت بن گئی، جس کی وجہ سے ۱۹۳۹ میں انہیں نوکری سے نکال دیا گیا۔ ان کا آخری وقت بہت بے بسی اور غریبی میں گزرا اور اسی حال میں ان کا انتقال ہوا۔ ان کی شروعاتی شاعری کا ایک بڑا حصہ بھی ضائع ہو گیا۔
۱
آور نہ جانتا ہوں فریبِ نظر کو میں
دیکھوں اُلٹ کے پردۂ داغِ جِگر کو میں
شاعر کو اِس بات پر شک ہے، بلکہ شاید یہ یقین ہی نہیں ہے کہ اُس کے جِگر کا داغ اُس کی محبّت یا درد کی سچّی اور پوری شِدّت کو ظاہر کر پاتا ہے۔ اُسے لگتا ہے کہ یہ اُس کی اپنی (یا محبوب کی) نظر کا فریب ہو سکتا ہے۔ کیونکہ اُس کے نزدیک نظر کے پاس پورا سچ نہیں ہوتا (یعنی وہ نظر آور نہیں ہے)۔ وہ سوچتا ہے کہ کیا جِگر کے زخم سے پردہ ہٹانے پر اُس کی تکلیف کی اصل حقیقت سامنے آ سکے گی؟ اِشارہ اس طرف ہے کہ اس کا درد و غم اس ظاہری داغ سے کہیں زیادہ شدید ہے۔ شاید یہی وجہ ہے کہ محبوب کو اس کے خلوص اور وفاداری پر شک رہتا ہے۔
۲
ہر نقشِ پا کو دیکھ کے دُھنتا ہوں سر کو میں
پہچانتا نہیں ہوں تِری رہگزر کو میں
مایوسی اور اُلجھن کے عالم میں عاشق ہر نقشِ پا کو دیکھ کر شدید اضطراب سے اپنا سر دھنتا (پیٹتا) ہے۔ وہ غم اور نقصان کے احساس میں اس قدر ڈوبا ہوا ہے کہ اسے محبوب ۔ یا پھر صوفیانہ نقطۂ نظر سے کہیں تو خدا ۔ تک جانے والا سچا راستہ اب پہچان میں ہی نہیں آتا۔
۳
عہدِ خِزاں میں رفتۂ آشوبِ ہوش ہوں
بھولا ہوا ہوں موسمِ دیوانہ گر کو میں
یہاں “رفتۂ آشوبِ ہوش” سے مراد ہے ہوش و حواس اور عقل کی تکلیف سے یکسر آزاد ہو جانا۔ یعنی عاشق خِزان کے موسم میں بھی جنون، بیخودی یا غفلت کی حالت میں ہے۔ وہ بہار کو ۔ جو جنون اور دیوانگی اُبھارنے والا اصل موسم ہوتا ہے—پوری طرح بھول چکا ہے۔ اس کا مطلب یہ ہے کہ اس کا عشق اور جنون اس قدر شدید ہے کہ وہ سال کے بارہ مہینے، ہر موسم میں عقل و ہوش سے بیگانہ اور دیوانگی کی کیفیت میں رہتا ہے۔
۴
گُم کردہ راہ ہوں قدمِ اوّلیں کے بعد
پھر راہبر مجھے نہ مِلا راہبر کو میں
شاعر محبوب یا ذاتِ الٰہی کی تلاش کا سفر شروع کرتے ہی، پہلے ہی قدم پر اپنا راستہ بھٹک گیا تھا۔ اس کے بعد نہ تو اُسے کوئی رہنما (رہبر) مل سکا جو اُسے راستہ دکھاتا، اور نہ ہی کوئی رہبر اُسے ڈھونڈ پایا۔ دوسرے مصرع کی ساخت اور توازن بہت گہرا ہے: “پھر راہ بر مجھے نہ مِلا راہ بر کو میں”۔ اگر اس کا صوفیانہ اور عمیق مطلب لیا جائے، تو “قدمِ اولین” سے مراد روح کا اس مآدی دنیا میں پہلا قدم رکھنا ہو سکتا ہے، جہاں آتے ہی انسان اصل راستے سے بھٹک جاتا ہے۔
۵
وہ پائے شوق دے کہ جہت آشنا نہ ہو
پوچھوں نہ خِضر سے بھی کہ جاؤں کدھر کو میں
وہ خدا سے ایسے پائے شوق (محبت کو تلاش کرنے والے جنونی قدم) کی دعا کرتا ہے جو کسی سمت یا حد کی پہچان (جہت) سے بالکل بے نیاز ہوں۔ بے سمت اور خالص جنون کی اس حالت میں، اسے گمراہوں کو راستہ دکھانے والے خضر سے بھی راستہ پوچھنے کی ضرورت نہیں پڑے گی۔
۶
مایوسِ اِنتظار ہوں مجنونِ اِضطراب
ہنستا ہوں دیکھ دیکھ کے دیوار و در کو میں
بے سُود اور نااُمید انتظار نے عاشق کو دیوانہ بنا دیا ہے اور وہ مُسلسِل بے چینی اور مجسم اِضطراب (مجنوں) بن چکا ہے۔ مجنوں کی طرح، ستمگر زمانے نے اُسے بھی قید خانے میں ڈال دیا ہے۔ عاشق زمانے والوں کی اس نادانی پر ہنستا ہے کہ وہ سمجھتے ہیں قید کر دینے سے اس کی دیوانگی ختم ہو جائے گی؛ جبکہ وہ خود جانتا ہے کہ اس کی دیوانگی کا کوئی علاج ممکن ہی نہیں ہے۔
۷
بہلا نہ دل، نہ تیرگیِ شامِ غم گئی
یہ جانتا تو آگ لگاتا نہ گھر کو میں
شدید بے بسی اور اضطراب میں، شاعر نے اس امید پر اپنے ہی گھر کو آگ لگا دی کہ شاید اس سے غم کی شام کی تاریکی چھٹ جائے یا اس کے جلتے ہوئے دل کو کچھ تسلی ملے۔ لیکن جب اسے احساس ہوا کہ اس خود بربادی سے بھی نہ تو دل کو قرار ملا اور نہ ہی غم کی ساہی کم ہوئی، تو وہ اس بے سود اور الم ناک قدم پر افسوس کرتا ہے۔ یہاں گھر دل کی علامت ہے اور آگ لگانا عشق میں مُبتِلا ہونا ہے۔
۹
دو تین ہچکیوں میں دمِ نزع کہہ گیا
شرحِ درازِ زندگیِ مختصر کو میں
موت کے وقت (دمِ نزع)، زندگی کی آخری دو تین ہچکیوں میں ہی شاعر اپنی مختصر مگر درد سے بھری زندگی کی طویل اور پیچیدہ کہانی (شرحِ دراز) کو بیان کر گیا۔
۱۰
فانیؔ دعائے مرگ کی فرصت نہیں مجھے
یعنی ابھی تو ڈھونڈ رہا ہوں اثر کو میں
اس مقطع میں فانیؔ نے طنز اور المیہ انداز اپنایا ہے: وہ کہتے ہیں کہ ان کے پاس موت کی دعا مانگنے کی بھی فرصت یا وقت نہیں ہے، کیونکہ وہ تو ابھی تک اپنی پچھلی دعاؤں اور دل کے نالوں کے اثر کی تلاش میں لگے ہوئے ہیں۔
दाग़-ए जिगर को मैं – फ़ानी बदायूनी
१
आवर न जानता हूँ फ़रेब-ए नज़र को मैं
देखूँ उलट के पर्दा-ए दाग़-ए जिगर को मैं
२
हर नक़्श-ए पा को देख के धुनता हूँ सर को मैं
पहचानता नहीं हूँ तेरी रहगुज़र को मैं
३
अहद-ए ख़िज़ाँ में रफ़्ता-ए आशोब-ए होश हूँ
भूला हुआ हूँ मौसम-ए दीवाना-गर को मैं
४
गुम-करदा-राह हूँ क़दम-ए अव्वलीं के बाद
फिर राहबर मुझे न मिला राहबर को मैं
५
वो पा-ए शौक़ दे के जेहत-आश्ना न हो
पूछूँ न ख़िज़्र से भी के जाऊँ किधर को मैं
६
मायूस-ए इन्तेज़ार हूँ मज्नून-ए इज़्तेराब
हँसता हूँ देख देख के दीवार-ओ-दर को मैं
७
बहला न दिल, न तीरगी-ए शाम-ए ग़म गई
ये जानता तो आग लगाता न घर को मैं
९
दो तीन हिचकियों में दम-ए नज़’ कह गया
शरह-ए दराज़-ए ज़िंदगी-ए मुख़्तसर को मैं
१०
फ़ानी दुआ-ए मर्ग की फ़ुर्सत नहीं मुझे
यानी अभी तो ढूँढ रहा हूँ असर को मैं
मोहम्मद शौकत अली ख़ान फ़ानी बदायूनी (१८७९-१९४१) ने १९०१ में बी-ए और १९०८ में वकालत की पढ़ाई पूरी की। उन की वकालत कुछ ख़ास नहीं चली, पहले बदायूँ और फिर आगरा में उन्होंने कोशिश की पर काम जम नहीं पाया। १९३२ तक वो एक जाने-माने शा’एर बन चुके थे, इसीलिए महाराजा किशन प्रसाद ने उन्हें में हैदराबाद बुलाया और एक नामी स्कूल में प्रिंसिपल की नौकरी दे दी। लेकिन शराब की आदत उन के लिये एक बड़ी मुसीबत बन गई, जिस की वजह से १९३९ में उन्हें नौकरी से हटा दिया गया। उन का आख़िर वक़्त बहुत बेबसी और ग़रीबी में बीता और इसी हाल में उन का इंतक़ाल हुआ। उन की शुरुआती शा’एरी का एक बड़ा हिस्सा भी खो गया।
यहाँ फ़ानी बदायूँनी की इस ग़ज़ल के सभी अशआर और उनकी सीधी, सरल और सहज हिंदी में व्याख्या प्रस्तुत है:
१
आवर न जानता हूँ फ़रेब-ए नज़र को मैं
देखूँ उलट के पर्दा-ए दाग़-ए जिगर को मैं
शा’एर को इस बात पर शक है के उस के दिल का ज़ख़्म (दाग़-ए जिगर) उस की मोहब्बत और दर्द की पूरी शिद्दत को ज़ाहिर कर भी पाता है या नहीं। उसे लगता है के ये उस की अपनी (या महबूब की) नज़र का फ़रेब (फ़रेब-ए नज़र) हो सकता है, क्यूंके नज़र के पास पूरा सच नहीं होता। वो सोचता है के क्या दिल के ज़ख़्म से पर्दा हटाने पर उस की पीड़ा की असली हक़ीक़त सामने आ पाएगी? इशारा इस तरफ़ है के उस का दुख इस ज़ाहिरी दाग़ से कहीं ज़्यादा गहरा है। शा’एद इसी लिये महबूब को उस की वफ़ादारी और मोहब्बत की शिद्दत पर शक रहता है।
२
हर नक़्श-ए पा को देख के धुनता हूँ सर को मैं
पहचानता नहीं हूँ तेरी रहगुज़र को मैं
मायूसी और उलझन के आलम में आशिक़/सालिक रास्ते के हर क़दम के निशान (नक़्श-ए पा) को देख कर दुख और तड़प से अपना सर धुनता (पीटता) है। वो दर्द और भटकाव में इस क़दर डूब चुका है के उसे महबूब तक जाने वाला – या सूफ़ी अंदाज़ में कहें तो ईश्वर तक पहुँचने वाला – रास्ता (रहगुज़र) अब पहचान में ही नहीं आ रहा है।
३
अहद-ए ख़िज़ाँ में रफ़्ता-ए आशोब-ए होश हूँ
भूला हुआ हूँ मौसम-ए दीवाना-गर को मैं
यहाँ “रफ़्ता-ए आशोब-ए होश” का मतलब है होश और समझदारी की बेचैनी से पूरी तरह आज़ाद हो जाना। यानी आशिक़ पतझड़ (अहद-ए ख़िज़ाँ) के मौसम में भी दीवानगी और बेख़ुदी की हालत में है। वो बसंत को—जो दीवानगी और जुनून उभारने वाला असली मौसम (मौसम-ए दीवाना-गर) होता है—पूरी तरह भूल चुका है। इस का मतलब ये है के उस का जुनून इतना गहरा है के वो साल के बारह महीने, हर मौसम में होश-ओ-हवास से बेगाना और दीवानगी की स्थिति में रहता है।
४
गुम-करदा-राह हूँ क़दम-ए अव्वलीं के बाद
फिर राहबर मुझे न मिला राहबर को मैं
शा’एर महबूब या ईश्वर की तलाश का सफ़र शुरू करते ही, पहले ही क़दम (क़दम-ए अव्वलीं) पर अपना रास्ता भटक गया था। उस के बाद न तो उसे कोई मार्गदर्शक (राहबर) मिल सका जो उसे रास्ता दिखाता, और न ही कोई राहबर उसे ढूँढ पाया। दूसरी पंक्ति का संतुलन और बुनावट बहुत गहरी है—”फिर राहबर मुझे न मिला राहबर को मैं”। आध्यात्मिक (सूफ़ी) नज़रिए से देखें तो “क़दम-ए अव्वलीं” का मतलब आत्मा का इस भौतिक दुनिया में पहला क़दम रखना भी हो सकता है, जहाँ आते ही इंसान अपने असली रास्ते से भटक जाता है।
५
वो पा-ए शौक़ दे के जेहत-आश्ना न हो
पूछूँ न ख़िज़्र से भी के जाऊँ किधर को मैं
वो ईश्वर से ऐसे पा-ए शौक़ (जुनून और मोहब्बत में डूबे हुए क़दम) माँगता है जो किसी दिशा या सीमा के मोहताज न हों (जेहत-आश्ना न हों)। बे-दिशा और विशुद्ध जुनून की इस स्थिति में, उसे भटकने वालों को राह दिखाने वाले ख़िज़्र से भी रास्ता पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
६
मायूस-ए इन्तेज़ार हूँ मज्नून-ए इज़्तेराब
हँसता हूँ देख देख के दीवार-ओ-दर को मैं
नाकाम और बेसूद इन्तेज़ार ने आशिक़ को पागल बना दिया है और वो निरंतर बेचैनी (इज़्तेराब) का प्रतीक बन चुका है। मज्नूँ की तरह, ज़माने ने उसे भी क़ैदख़ाने में डाल दिया है। आशिक़ दुनिया वालों की इस नादानी पर हँसता है के वो सोचते हैं के चार दीवारों में बंद कर देने से उस की दीवानगी ख़त्म हो जाएगी; जबके वो जानता है के उस की इस दीवानगी का कोई इलाज मुमकिन ही नहीं है।
७
बहला न दिल, न तीरगी-ए शाम-ए ग़म गई
ये जानता तो आग लगाता न घर को मैं
बेहद निराशा और तड़प में, शा’एर ने इस उम्मीद में अपने ही घर को आग लगा दी के शा’एद इस से ग़म की शाम का अँधेरा (तीरगी) छट जाए या उस के जलते हुए दिल को थोड़ा सुकून मिले। लेकिन जब उसे एहसास हुआ के इस ख़ुद-कुशी जैसे क़दम से भी न तो दिल को क़रार मिला और न ही ग़म का अँधेरा कम हुआ, तो वो अपने इस बेसूद और दुखद क़दम पर अफ़्सोस जताता है। यहां घर दिल का प्रतीक है और आग लगाना मोहब्बत करना है।
९
दो तीन हिचकियों में दम-ए नज़’ कह गया
शरह-ए दराज़-ए ज़िंदगी-ए मुख़्तसर को मैं
मौत के वक़्त (दम-ए नज़’), ज़िंदगी की आख़िरी दो-तीन हिचकियों में ही शा’एर अपनी छोटी सी मगर दुखों से भरी ज़िंदगी की लंबी और पेचीदा कहानी (शरह-ए दराज़) बयान कर गया।
१०
फ़ानी दुआ-ए मर्ग की फ़ुर्सत नहीं मुझे
यानी अभी तो ढूँढ रहा हूँ असर को मैं
इस मक़्ते में फ़ानी ने एक गहरा और दर्दनाक तंज़ (व्यंग्य) इस्तेमाल किया है: वो कहते हैं के उन के पास मौत की दुआ (दुआ-ए मर्ग) माँगने की भी फ़ुर्सत या वक़्त नहीं है, क्यूंके वो तो अभी तक अपनी पिछली दुआओं और आहों के असर को ही ढूँढने में लगे हुए हैं।
daaGh-e jigar ko maiN – faanii badaayuni
1
aavar na jaantaa huuN fareb-e nazar ko maiN
dekhuuN ulaT ke parda-e daaGh-e jigar ko maiN
2
har naqsh-e paa ko dekh ke dhuntaa huuN sar ko maiN
pehchaantaa nahiiN huuN terii rahguzar ko maiN
3
‘ahd-e KhizaaN meN rafta-e aashob-e hosh huuN
bhuulaa hu’aa huuN mausam-e diivaana-gar ko maiN
4
gum-kardah raah huuN qadam-e avvaliiN ke baa’d
phir raahbar mujh’e na milaa raahbar ko maiN
5
vo paa-e shauq de, keh jehat-aashnaa na ho
puuchhuN na Khizr se bhii keh jaa’uuN kidhar ko maiN
6
maayuus-e intezaar huuN majnuun-e izteraab
haNstaa huuN dekh dekh ke diivaar-o-dar ko maiN
7
ba’hlaa na dil, na tiiragi-e shaam-e Gham ga’ii
yeh jaantaa t’o aag lagaataa na ghar ko maiN
9
do tiin hichkiyoN meN dam-e naz’a kah gayaa
shar’h-e daraaz-e zindagii-e muKhtasar ko maiN
10
faanii du’aa-e marg kii fursat nahiiN mujhe
ya’nii abhii toh DhuuNDh rahaa huuN asar ko maiN
mohammed shaukat ali KhaaN faani badayuni (1879-1941), BA 1901, law 1908. He had a stumbling law practice, first in badayun and then in agra. By 1932 he must have been a well recognized poet because he was invited to hyderabad by maharaja kishan parshaad, and offered a job as the principal of a reputed school. Alcohol proved to be a big problem and his employment was terminated in 1939. He died forlorn and destitute. Much of his earlier work was lost.
1
aavar1 na jaantaa huuN fareb2-e nazar ko maiN
dekhuuN ulaT ke parda-e daaGh3-e jigar4 ko maiN
1.bearing, possessing 2.deception 3.wound, scar 4.liver, heart
The poet is uncertain, perhaps not confident that the daaGh-e jigar reflects the true intensity of his love/pain. He suspects that this may be a deception of his (or the beloved’s) perception fareb-e nazar; he does not think that nazar is in possesion aavar of the whole truth (as in nazar-aavar nahiN hai). He contemplates whether uncovering the scar/wound of his heart (daaGh-e jigar) would reveal the true reality of his suffering. The implication is that his suffering is far more intense than that shown by the scar of his heart. Perhaps that is why the beloved is suspicious of his sincerity.
2
har naqsh-e-paa1 ko dekh ke dhuntaa2 huuN sar ko maiN
pehchaantaa nahiiN huuN terii rahguzar3 ko maiN
1.footprints 2.beating the head in despair 3.path
Driven to despair and confusion, the lover beats his head in agony (dhuntaa huuN sar ko) at every footprint naqsh-e paa he encounters. He is so consumed by grief and loss that he can no longer distinguish the true path rahguzar leading to the beloved or to the divine, suggesting a sufiyaana interpretation.
3
‘ahd1-e KhizaaN2 meN rafta3-e aashob-e-hosh4 huuN
bhuulaa hu’aa huuN mausam5-e diivaana-gar5 ko maiN
1.time, duration 2.autumn, dry season 3.bereft, losing something 4.agony of awareness 5.season 6.madness/passion inducing
I read rafta-e aashob-e hosh to mean bereft of the agony of awareness/sanity i.e., the lover is insane or in a stupor even in ‘ahd-e KhizaaN – autumn. He has forgotten spring—the madness-inducing season (mausam-e diivaana-gar) that usually fuels the intensity of love and sorrow. That implies that his passion is so intense that he is in a stupor, has lost his sanity all year round.
4
gum-kardah1 raah2 huuN qadam3-e avvaliiN4 ke baa’d
phir raahbar5 mujh’e na milaa raahbar ko maiN
1.lost 2.path 3.step 4.first 5.guide
The poet lost his way immediately after taking the very first step qadam-e avvaliiN of his journey seeking the beloved or the divine. From that point on, he could neither find a guide (raahbar) to direct him, nor could the guide find him. The syntactic symmetry of second misra – “phir raahbar mujh’e na milaa raahbar ko maiN” – is very interesting. In a heavily sufiyaana interpretation, qadam-e avvaliiN could mean the first descent into the material world.
5
vo paa1-e shauq2 de, keh jehat3-aashnaa4 na ho
puuchhuN na Khizr5 se bhii keh jaa’uuN kidhar ko maiN
1.feet, steps 2.desire 3.direction 4.familiar 5.legendary guide of lost travelers
He prays for feet driven purely by unbridled passion (paa’e-e shauq) that are completely blind to direction or boundaries (jehat-aashnaa na ho). In such state of pure, aimless passion, he wouldn’t even need guidance from Khizr (the legendary guide of lost travelers).
6
maayuus1-e intezaar2 huuN majnuun3-e izteraab4
haNstaa huuN dekh dekh ke diivaar-o-dar5 ko maiN
1.disappointed, hopeless 2.waiting 3.legendary mad/passionate lover 4.restlessnes 5.doors and walls
The lover has been pushed to madness by hopeless waiting maayuus-e intezaar and has become the embodiment of majnuuN in constant restlessness (izteraab). In the same classic treatment received by majnuuN, he has been put in a prison cell and laughs at the naivette of the zamaana who has put him there, thinking that it will cure him of his madness. He knows that his madness is incurable.
7
ba’hlaa1 na dil, na tiiragi2-e shaam-e Gham ga’ii
yeh jaantaa t’o aag lagaataa na ghar ko maiN
1.comforted, consoled 2.darkenss
In extreme desperation, the poet set his own house on fire hoping it might dispell the darkness tiiragi-e shaam or give solace bahlaana to his aching heart. Realizing that even self-destruction neither comforted his soul nor dispelled the gloom of his suffering, he regrets the futile, tragic act.
9
do tiin hichkiyoN1 meN dam-e-naz’a2 kah gayaa
shar’h3-e daraaz4-e zindagii-e muKhtasar5 ko maiN
1.hiccups 2.time (last moment) of death 3.explanation 4.long 5.short
At the moment of death (dam-e naz’a), within just two or three final gasps, the poet managed to summarize the long, complex story (sharah-e daraaz) of his brief and painful existence.
10
faanii1 du’aa-e marg2 kii fursat3 nahiiN mujhe
ya’nii4 abhii toh DhuuNDh rahaa huuN asar5 ko maiN
1.pen-name 2.death 3.time, opportunity 4.meaning that 5.effect
In this maqta (closing verse), faani uses dark, tragic irony: he says he doesn’t even have the time or leisure to pray for death (du’aa-e marg), because he is still waiting to see the results or effects (asar) of his previous prayers and heartbreaks.