parvardigaar-e do-jahaaN kab tak-gopi nath amn

پروردگارِ  دو  جہاں  کب  تک  ۔  گوپی  ناتھ  امنؔ

۱

عمل  کا  حسنِ  اِستقلال  سے  ہے  این  و  آں  کب  تک

غمِ  انجام  اور  اندیشۂ  سود  و  زیاں  کب  تک

۲

زباں  آخر  نہ  ہو  گی  حالِ  دل  کی  ترجماں  کب  تک

لگی  ہو  آگ  جب  دل  میں،  نہ  نکلے  گا  دھواں  کب  تک

۳

یہ  شیخ  و  برہمن  میں  روز  بحثِ  این  و  آں  کب  تک

بہم  آویزشِ  آوازِ  ناقوس  و  اذاں  کب  تک

۴

حقیقت  کُھل  ہی  جائے  گی  اگر  کچھ  بھی  حقیقت  ہے

رہے  گا  رازِ  ہستی  سات  پردوں  میں  نہاں  کب  تک

۵

مرے  خالق  تری  مخلوق  بھوکی  مرتی  جاتی  ہے

کہے  جاؤں  تجھے  پروردگارِ  دو  جہاں  کب  تک

۶

کچھ  اپنا  مرتبہ  جانو  کچھ  اپنی  قدر  پہچانو

زمیں  پر  بسنے  والے  شکوۂ  ہفت  آسماں  کب  تک

۷

ہوا  کے  رُخ  پہ  اُڑتی  خاک  منزل  کیا  بتائے  گی

کرے  گا  رہنمائی  یہ  غبار  کارواں  کب  تک

۸

نشیمن  پر  ابھی  ہے  خانۂ  صیّاد  کا  سایہ

یہ  محکومی  یہ  مجبوری  نصیبِ  دشمناں  کب  تک

۹

مجھے  کیا  فائدہ  اس  سے  کہ  صیّادوں  کی  بدلی  ہو

مرا  ہندوستاں  ہوگا  مرا  ہندوستاں  کب  تک

۱۰

اگر  بچ  بھی  رہا  صیّاد  سے،  صرصر  سے،  بجلی  سے

رہے  گا  کھوکھلی  ٹہنی  پہ  قائم  آشیاں  کب  تک

۱۱

یقین  ہے  گھر  کرے  گی  دل  میں  دشمن  کے  وفا  میری

کوئی  اے  امنؔ  مجھ  سے  رہ  سکے  گا  بدگماں  کب  تک

 

گوپی ناتھ امن (١٨٩٨۔ ١٩٨٣)، لکھنؤ۔ ان کے بھائی، والد، دادا اور ان کے بیٹے، یہ سبھی اردو کے مایہ ناز اور جانے مانے شاعر تھے۔ ان سب نے (دوسرے کلام کے ساتھ ساتھ) اسلامی ہستیوں کی شان میں قصیدے اور مرثیے لکھے۔ گوپی ناتھ اور ان کے بھائی کو ان کی تعلیم کے ایک بڑے حصے کے لیے مدرسے بھیجا گیا تھا۔ وہ ایک مجاہدِ آزادی (فریڈم فائٹر) اور کٹر گاندھی وادی تھے، جو فرقہ وارانہ ہم آہنگی (مذہبی یکجہتی) کے زبردست حامی بھی تھے اور خود بھی اس پر عمل کرتے تھے۔ انہوں نے حکومتِ ہند کے رسالے ‘آج کل’ میں جوش ملیح آبادی اور بال مکند عرش ملسیانی کے ساتھ بطور اسسٹنٹ ایڈیٹر کام کیا۔ وہ لکھنؤ اور کانپور کے کئی میگزینوں کے ایڈیٹر بھی رہے۔ اُنہیں ١٩٧٧ میں پدم بھوشن سے نوازا گیا۔ انہوں نے تمام مذاہب کو جوڑنے والا بہت سا کلام لکھا، جس میں مرثیے اور سلام شامل ہیں، جن میں سے کئی اب گم ہو چکے ہیں۔ اُنہوں نے اپنے ہندو مذہبی ہستیوں کی شان میں بھجن/قصیدے اور ساتھ ہی ساتھ حبِ الوطنی پر مبنی نظمیں بھی لکھیں۔

۱

عمل  کا  حسنِ  اِستقلال  سے  ہے  این  و  آں  کب  تک

غمِ  انجام  اور  اندیشۂ  سود  و  زیاں  کب  تک

 

مستقل  مزاجی  سے  کام  کرنے  کی  خوبصورتی  (عمل  کا  حسنِ  استقلال)  آخر  کب  تک  ایسی  فضول،  بیوروکریٹک،  سیاسی  یا  فرقہ  وارانہ  بحثوں  (این  و  آں)  کی  وجہ  سے  رکی  رہے  گی؟  آزادی  کے  فوراً  بعد  لکھے  گئے  اس  شعر  میں  ملک  کی  تعمیرِ  نو  کے  لیے  فوری  اور  پکے  فیصلے  لینے  کی  بات  کی  گئی  ہے۔  شاعر  لوگوں  کو  سمجھا  رہا  ہے  کہ  وہ  اپنے  ذاتی  نفع  نقصان  (سود  و  زیاں)  کی  فکر  چھوڑیں  اور  نئے  ملک  کے  لیے  بڑے  اور  ہِمّت  والے  قدم  اٹھانے  سے  نہ  ڈریں۔

۲

زباں  آخر  نہ  ہو  گی  حالِ  دل  کی  ترجماں  کب  تک

لگی  ہو  آگ  جب  دل  میں،  نہ  نکلے  گا  دھواں  کب  تک

 

شاعر  خبردار  کر  رہا  ہے  کہ  عوام  کے  دُکھ  اور  درد  کو  ہمیشہ  کے  لیے  خاموش  نہیں  رکھا  جا  سکتا۔  جب  لوگوں  کی  بے  چینی  اور  تکلیفیں  حد  سے  بڑھ  جائیں  گی،  تو  سچائی  لازمی  طور  پر  ایک  عوامی  احتجاج  اور  غصے  (دھواں)  کی  شکل  میں  سامنے  آ  جائے  گی۔  اس  عوامی  بے  چینی  کی  وجہ  چیزوں  کی  کمی،  ناانصافی،  یا  فرقہ  واریت  کی  آگ  بھڑکانا  ۔  کچھ  بھی  ہو  سکتا  ہے۔

۳

یہ  شیخ  و  برہمن  میں  روز  بحثِ  این  و  آں  کب  تک

بہم  آویزشِ  آوازِ  ناقوس  و  اذاں  کب  تک

 

یہاں  ہندوؤں  (برہمن)  اور  مسلمانوں  (شیخ)  کے  بیچ  ہونے  والے  بھیانک  فرقہ  وارانہ  دنگوں،  سیاسی  کھینچ  تان  اور  ان  کی  روز  روز  کی  فضول  (این  و  آں)  بحثوں  پر  سیدھی  چوٹ  کی  گئی  ہے۔  شاعر  مندر  کے  گھنٹوں  (ناقوس)  اور  مسجد  کی  اذان  کی  آوازوں  کے  آپسی  ٹکراؤ  (آویزش)  پر  افسوس  ظاہر  کر  رہا  ہے،  اور  پوچھ  رہا  ہے  کہ  یہ  مذہبی  لڑائی  جھگڑے  آخر  کب  ختم  ہوں  گے  اور  کب  ملک  میں  امن  قائم  ہوگا؟

۴

حقیقت  کُھل  ہی  جائے  گی  اگر  کچھ  بھی  حقیقت  ہے

رہے  گا  رازِ  ہستی  سات  پردوں  میں  نہاں  کب  تک

 

یہ  نئی  بننے  والی  حکومت  کے  لیڈروں  کے  لیے  ایک  وارننگ  ہے۔  شاعر  کہہ  رہا  ہے  کہ  ملک  کے  اصل  اور  زمینی  حالات  کو  سیاسی  تقریروں  یا  پروپیگنڈے  کے  سات  پردوں  میں  چھپا  کر  نہیں  رکھا  جا  سکتا۔  عوام  کی  بدحالی  کا  یہ  سچ  اور  ان  کی  زندگی  کی  مشکلات  کا  اصل  راز  (رازِ  ہستی)  بہت  جلد  سب  کے  سامنے  کھل  کر  آ  جائے  گا۔

۵

مرے  خالق  تری  مخلوق  بھوکی  مرتی  جاتی  ہے

کہے  جاؤں  تجھے  پروردگارِ  دو  جہاں  کب  تک

 

یہ  آزادی  کے  فوراً  بعد  کے  معاشی  بحران،  قحط  اور  غریبی  پر  ایک  دل  ہلا  دینے  والی  بات  ہے۔  شاعر  کُھل  کر  خدا  سے  (اور  استعارے  کے  طور  پر  ملک  کے  حاکموں  سے)  سوال  کر  رہا  ہے  کہ  جب  عام  عوام  (مخلوق)  بھوک  سے  مر  رہی  ہو،  تو  کوئی  تمہیں  سب  کا  پیٹ  بھرنے  والا  (پروردگارِ  دو  جہاں)  کہہ  کر  کب  تک  پکارتا  رہے؟

۶

کچھ  اپنا  مرتبہ  جانو  کچھ  اپنی  قدر  پہچانو

زمیں  پر  بسنے  والے  شکوۂ  ہفت  آسماں  کب  تک

 

یہ  عوام  کو  اپنے  پیروں  پر  کھڑے  ہونے  اور  اپنی  جمہوری  طاقت  کو  پہچاننے  کی  ایک  پکار  ہے۔  شاعر  آزاد  ملک  کے  شہریوں  سے  کہہ  رہا  ہے  کہ  وہ  اپنی  قسمت  یا  کسی  دور  بیٹھی  حکومت  کو  کوسنا  (شکوۂ  ہفت  آسماں)  بند  کریں۔  وہ  سمجھا  رہا  ہے  کہ  ایک  آزاد  جمہوریت  میں  حالات  کو  بدلنے  کی  طاقت  خود  ان  کے  اپنے  ہاتھوں  میں  ہے۔  وہ  کہتا  ہے  کہ  اپنا  مقام  (مرتبہ)  سمجھو  اور  اپنی  صلاحیت  (قدر)  کو  پہچانو۔

۷

ہوا  کے  رُخ  پہ  اُڑتی  خاک  منزل  کیا  بتائے  گی

کرے  گا  رہنمائی  یہ  غبار  کارواں  کب  تک

 

یہاں  پرانی  لکیر  کے  فقیر  بنے  رہنے  اور  نوآبادیاتی  نظام  (neo-colonialism)  کو  ہی  چلاتے  رہنے  کے  خلاف  ایک  سخت  انتباہ  ہے۔  شاعر  کا  کہنا  ہے  کہ  جانے  والے  انگریز  حاکم  تو  ایک  ایسا  کارواں  ہیں  جو  جا  چکا  ہے  اور  اب  صرف  ان  کے  پیچھے  اُڑنے  والا  دھول  کا  بادل  (غبارِ  کارواں)  باقی  رہ  گیا  ہے۔  وہ  انگریزوں  کے  بنائے  ہوئے  اداروں،  معاشی  پالیسیوں  اور  قانونی  نظام  سے  پوری  طرح  ناطہ  توڑنے  کا  مطالبہ  کر  رہا  ہے۔  وہ  پوچھتا  ہے  کہ  یہ  آزاد  ملک  آخر  کب  تک  ایک  گزرے  ہوئے  کارواں  کی  دھول  کے  بھروسے  اپنے  مستقبل  کا  راستہ  ڈھونڈتا  رہے  گا؟  بالکل  یہی  احساس  پنڈت  آنند  نرائن  ملا  نے  بھی  اپنے  اس  شعر  میں  ظاہر  کیا  تھا:

پیروں  کی  کٹی  بیڑی  جس  دم،  قیدی  سمجھا  آزاد  ہوا

یہ  بھول  گیا  گردن  میں  ابھی،  زنجیرِ  طلائی  باقی  ہے

۸

نشیمن  پر  ابھی  ہے  خانۂ  صیّاد  کا  سایہ

یہ  محکومی  یہ  مجبوری  نصیبِ  دشمناں  کب  تک

 

شاعر  دیکھ  رہا  ہے  کہ  دکھاوے  کی  آزادی  کے  باوجود،  پرانے  شِکاری  (انگریزوں)  کے  نظام،  ان  پر  معاشی  انحصار  اور  تقسیم  کے  زخموں  کا  سایہ  اب  بھی  ہمارے  ملک  (نشیمن)  پر  گہرا  ہے۔  وہ  سوال  کرتا  ہے  کہ  یہ  غلامی  (محکومی)  اور  بے  بسی  (مجبوری)  آخر  کب  تک  رہے  گی؟  (اور  دعا  کرتا  ہے  کہ  ایسی  بے  بسی  صرف  ہمارے  بدترین  دشمنوں  کے  حصے  میں  ہی  آئے)۔

۹

مجھے  کیا  فائدہ  اس  سے  کہ  صیّادوں  کی  بدلی  ہو

مرا  ہندوستاں  ہوگا  مرا  ہندوستاں  کب  تک

 

یہ  اس  پوری  غزل  کا  سب  سے  اہم  سیاسی  نکتہ  ہے۔  شاعر  کڑواہٹ  کے  ساتھ  کہتا  ہے  کہ  انگریز  حاکموں  کی  جگہ  ہندوستانی  اشرافیہ  کا  آ  جانا  تو  صرف  “شکاریوں  کی  تبدیلی”  (صیّادوں  کی  بدلی)  ہے۔  وہ  سوال  کرتا  ہے  کہ  ہندوستان  صرف  اپنے  نئے  سیاسی  آقاوں  کا  بن  کر  رہنے  کے  بجائے،  یہاں  کے  عام  اور  غریب  شہریوں  کا  اپنا  ہندوستان  کب  بنے  گا؟

۱۰

اگر  بچ  بھی  رہا  صیّاد  سے،  صرصر  سے،  بجلی  سے

رہے  گا  کھوکھلی  ٹہنی  پہ  قائم  آشیاں  کب  تک

 

یہ  نئے  ملک  کی  کمزور  حالت  پر  گہری  تشویش  کا  اظہار  ہے۔  اگر  ہندوستان  باہر  کے  یا  اندر  کے  شکاریوں  (صیّاد)  سے،  فرقہ  وارانہ  فسادات  کی  تیز  آندھی  (صرصر)  سے،  اور  ناگہانی  آفتوں  کی  بجلی  سے  بچ  بھی  جائے،  تو  بھی  ہمارا  یہ  گھر  (آشیاں)  کب  تک  سلامت  (قائم)  رہ  سکتا  ہے  اگر  اس  کی  اندرونی  سماجی  اور  معاشی  بنیادیں  ہی  اندر  سے  بالکل  کھوکھلی  (کھوکھلی  ٹہنی)  ہوں؟

۱۱

یقین  ہے  گھر  کرے  گی  دل  میں  دشمن  کے  وفا  میری

کوئی  اے  امنؔ  مجھ  سے  رہ  سکے  گا  بدگماں  کب  تک

 

یہ  غزل  کا  آخری  شعر  ہے  جو  گاندھی  کے  عدم  تشدُّد  کے  فلسفے  پر  مبنی  امید،  صلح  اور  امن  کا  پیغام  دیتا  ہے۔  تقسیم  کے  بعد  جہاں  ہر  طرف  دوری  اور  نفرت  کا  ماحول  تھا،  وہاں  امنؔ  پورے  یقین  کے  ساتھ  کہتے  ہیں  کہ  سچّی  ہمدردی،  انسانیت  اور  محبت  (وفا)  ایک  دن  اندرونی  اور  بیرونی  دشمنوں  کے  دل  جیت  لے  گی  اور  ان  کے  دلوں  میں  پھیلی  گہری  سیاسی  غلط  فہمیوں  اور  شک  (بدگماں)  کو  ہمیشہ  کے  لیے  ختم  کر  دے  گی۔

 

परवरदिगार-ए दो जहाँ कब तक – गोपी नाथ अमन

अमल का हुस्न-ए इस्तेक़्लाल से है ईन-ओ-आँ कब तक

ग़म-ए अंजाम और अंदेशा-ए सूद-ओ-ज़ियाँ कब तक

ज़बाँ आख़िर न होगी हाल-ए दिल की तर्जुमाँ कब तक

लगी हो आग जब दिल में, न निकलेगा धुआँ कब तक

ये शैख़-ओ-बरहमन में रोज़ बहस-ए ईन-ओ-आँ कब तक

बहम आवेज़िश-ए आवाज़-ए नाक़ूस-ओ-अज़ाँ कब तक

हक़ीक़त खुल ही जाएगी अगर कुछ भी हक़ीक़त है

रहेगा राज़-ए हस्ती सात पर्दों में नेहाँ कब तक

मेरे ख़ालिक़ तेरी मख़्लूक़ भूकी मरती जाती है

कहे जाऊँ तुझे परवरदिगार-ए दो जहाँ कब तक

कुछ अपना मरतबा जानो कुछ अपनी क़द्र पहचानो

ज़मीं पर बसने वाले शिक्वा-ए हफ़्त आसमाँ कब तक

हवा के रुख़ पे उड़ती ख़ाक मँज़िल क्या बताएगी

करेगा रहनुमाई ये ग़ुबार-ए कारवाँ कब तक

नशेमन पर अभी है ख़ाना-ए सय्याद का साया

ये महकूमी ये मज्बूरी नसीब-ए दुश्मनाँ कब तक

मुझे क्या फ़ा’एदा इस से के सय्यादों की बदली हो

मेरा हिन्दोस्ताँ होगा मेरा हिन्दोस्ताँ कब तक

१०

अगर बच भी रहा सय्याद से, सरसर से, बिजली से

रहेगा खोखली टहनी पे क़ा’एम आशियाँ कब तक

११

यक़ीं है घर करेगी दिल में दुश्मन के वफ़ा मेरी

कोई अए अमन मुझ से रह सकेगा बदगुमाँ कब तक

 

गोपी नाथ अमन (१८९८-१९८३), लखनऊ। उन के भाई, पिता, दादा और उन के बेटे, ये सभी उर्दू के जाने-माने और प्रतिष्ठित (reputed) कवि थे। इन सब ने (अन्य रचनाओं के साथ-साथ) इस्लामी हस्तियों की शान में क़सीदे और मर्सिये लिखे। गोपी नाथ और उन के भाई को उन की शिक्षा के एक बड़े हिस्से के लिये मद्रसे भेजा गया था। वो एक स्वतंत्रता सेनानी और पक्के गांधीवादी थे, जो सांप्रदायिक सौहार्द (मज़हबी एकता) के ज़बरदस्त समर्थक भी थे और ख़ुद भी उस पर अमल करते थे। उन्हों ने भारत सरकार की पत्रिका ‘आज कल’ में जोश मलीहाबादी और बाल मुकुंद अर्श मल्सियानी के साथ सहायक संपादक (associate editor) के रूप में काम किया। वो लखनऊ और कानपुर की कई पत्रिकाओं के संपादक भी रहे। उन्हें १९७७ में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। उन्हों ने सभी धर्मों को जोड़ने वाली बहुत सी रचनाएँ कीं, जिन में मर्सिया और सलाम शामिल हैं, जिन में से कई अब खो चुकी हैं। उन्हों अपने हिंदू धार्मिक हस्तियों की स्तुति में भजन और साथ ही साथ देशभक्ति की कविताएँ भी लिखीं।

अमल का हुस्न-ए इस्तेक़्लाल से है ईन-ओ-आँ कब तक

ग़म-ए अंजाम और अंदेशा-ए सूद-ओ-ज़ियाँ कब तक

 

दृढ मेहनत और पक्के इरादे से काम करने की ख़ूबसूरती (अमल का हुस्न-ए इस्तेक़्लाल) आख़िर कब तक ऐसी फ़ुज़ूल, ब्यूरोक्रेटिक या सियासी बहसबाज़ी (ईन-ओ-आँ) की वजह से रुकी रहेगी? आज़ादी के ठीक बाद के माहौल में लिखे गए इस शे’र में देश को बनाने के लिये फ़ौरन और कड़े फ़ैसले लेने की वकालत की गई है। कवि लोगों से कह रहा है कि वे अपने निजी नफ़े-नुक़सान (सूद-ओ-ज़ियाँ) की फ़िक्र छोड़ें और नए देश के लिये बड़े ख़तरे उठाने से न डरें।

ज़बाँ आख़िर न होगी हाल-ए दिल की तर्जुमाँ कब तक

लगी हो आग जब दिल में, न निकलेगा धुआँ कब तक

 

कवि चेतावनी दे रहा है के जनता के दुख-दर्द और तक्लीफ़ों को हमेशा के लिये चुप नहीं रखा जा सकता। जब लोगों की बेचैनी और पीड़ा हद से बढ़ जाएगी, तो वह सच्चाई लाज़िमी तौर पर एक जन-आक्रोश या बग़ावत (धुआँ) की शक्ल में बाहर आ जाएगी। इस जन-आक्रोश की वजह चीज़ों की कमी, ग़लत बटवारा, या नफ़्रत की आग भड़काना – कुछ भी हो सकता है।

ये शैख़-ओ-बरहमन में रोज़ बहस-ए ईन-ओ-आँ कब तक

बहम आवेज़िश-ए आवाज़-ए नाक़ूस-ओ-अज़ाँ कब तक

 

यहाँ हिंदुओं (बरहमन) और मुसलमानों (शैख़) के बीच होने वाले भयानक दंगों, आपसी नफ़्रत और उन की रोज़-रोज़ की फ़ुज़ूल की बहसबाज़ी (बहस-ए ईन-ओ-आँ) पर सीधी चोट की गई है। कवि मंदिर के शंख की आवाज़ (नाक़ूस) और मस्जिद की अज़ान के आपसी टकराव (आवेज़िश) पर अफ़्सोस ज़ाहिर कर रहा है, और पूछ रहा है के ये विनाशकारी धार्मिक टक्राउ आख़िर कब ख़त्म होगा और कब देश में धर्मनिरपेक्ष शांति क़ा’एम होगी?

हक़ीक़त खुल ही जाएगी अगर कुछ भी हक़ीक़त है

रहेगा राज़-ए हस्ती सात पर्दों में नेहाँ कब तक

 

ये नए-नए बने देश के सियासी नेताओं के लिये एक चेतावनी है। कवि साफ़ कह रहा है के देश की असली और ज़मीनी हालत को राजनीतिक भाषणों या प्रोपेगैंडा के सात पर्दों में छुपा कर नहीं रखा जा सकता। जनता की बदहाली का ये सच और उन की ज़िंदगी की मुश्किलौं का असली राज़ (राज़-ए हस्ती) बहुत जल्द सब के सामने खुल कर आ जाएगा।

मेरे ख़ालिक़ तेरी मख़्लूक़ भूकी मरती जाती है

कहे जाऊँ तुझे परवरदिगार-ए दो जहाँ कब तक

 

ये आज़ादी के फ़ौरन बाद के आर्थिक संकट, अकाल और ग़रीबी पर एक झकझोर देने वाली टिप्पणी है। कवि खुल कर ईश्वर से (और प्रतीकात्मक रूप से देश के शासकों से) सवाल कर रहा है के जब आम जनता (मख़्लूक़) भूख से मर रही हो, तो कोई तुम्हें सब का पेट भरने वाला (परवरदिगार-ए दो जहाँ) कह कर कब तक पुकारता रहे?

कुछ अपना मरतबा जानो कुछ अपनी क़द्र पहचानो

ज़मीं पर बसने वाले शिक्वा-ए हफ़्त आसमाँ कब तक

 

ये जनता को अपने पैरों पर खड़े होने और अपनी लोकतांत्रिक ताक़त को पहचानने की एक पुकार है। कवि आज़ाद देश के नागरिकों से कह रहा है के वो अपनी क़िस्मत या किसी दूर बैठी सरकार को कोसना (शिक्वा-ए हफ़्त आसमाँ) बंद करें। वो समझा रहा है के एक आज़ाद लोकतंत्र में अपने हालात को बदलने की ताक़त ख़ुद उन के अपने हाथों में है। वो कहता है के अपना पद (मरतबा) समझो और अपनी क़ाबिलियत (क़द्र) को पहचानो।

हवा के रुख़ पे उड़ती ख़ाक मँज़िल क्या बताएगी

करेगा रहनुमाई ये ग़ुबार-ए कारवाँ कब तक

 

यहाँ पुरानी लकीर के फ़क़ीर बने रहने और औपनिवेशिक व्यवस्था (neo-colonialism) को ही ढोते रहने के ख़िलाफ़ एक कड़ा संदेश है। कवि का तर्क है के जाने वाले ब्रिटिश शासक तो एक ऐसा कारवाँ है जो जा चुका है और अब सिर्फ़ उन के पीछे उड़ने वाला धूल का बादल (ग़ुबार-ए कारवाँ) ही बाक़ी रह गया है। वो अंग्रेज़ों के बनाए ढांचों, आर्थिक नीतियों और क़ानूनी व्यवस्था से पूरी तरह नाता तोड़ने की माँग कर रहा है। वो पूछता है के ये आज़ाद देश आख़िर कब तक एक गुज़रे हुए कारवाँ की धूल के भरोसे अपने भविष्य का रास्ता ढूँढता रहेगा? बिल्कुल यही एहसास पंडित आनंद नरायण मुल्ला ने भी अपने इस शे’र में ज़ाहिर किया था:

पैरों की कटी बेड़ी जिस दम, क़ैदी समझा आज़ाद हुआ

ये भूल गया गर्दन में अभी, ज़ंजीर-ए तिलाई बाक़ी है

नशेमन पर अभी है ख़ाना-ए सय्याद का साया

ये महकूमी ये मज्बूरी नसीब-ए दुश्मनाँ कब तक

 

कवि देख रहा है के दिखावे की आज़ादी के बावजूद, पुराने शिकारी (अंग्रेज़ों) के बनाए सिस्टम, उन पर आर्थिक निर्भरता और बटवारे के ज़ख़्मों का साया अब भी हमारे देश (नशेमन) पर गहरा है। वो सवाल करता है के ये ग़ुलामी (महकूमी) और लाचारी (मज्बूरी) आख़िर कब तक चलेगी? (और कामना करता है के ऐसी बेबसी सिर्फ़ हमारे बदतरीन दुश्मनों के हिस्से में ही आए)।

मुझे क्या फ़ा’एदा इस से के सय्यादों की बदली हो

मेरा हिन्दोस्ताँ होगा मेरा हिन्दोस्ताँ कब तक

 

ये इस पूरी ग़ज़ल का सब से मुख्य और केंद्रीय राजनीतिक विचार है। कवि कड़वाहट के साथ कहता है के गोरे अंग्रेज़ शासकों की जगह देसी रईसों और नेताओं का आ जाना तो सिर्फ़ “शिकारियों/शोषकों का बदलना” (सय्यादों की बदली) है। वो सवाल करता है के हिंदुस्तान सिर्फ़ अपने नए राजनीतिक आक़ाओं का बन कर रहने के बजाय, यहाँ के आम और ग़रीब नागरिकों का अपना हिंदुस्तान कब बनेगा?

१०

अगर बच भी रहा सय्याद से, सरसर से, बिजली से

रहेगा खोखली टहनी पे क़ा’एम आशियाँ कब तक

 

ये नए देश की कमज़ोर हालत पर गहरी चिंता का इज़्हार है। अगर हिंदुस्तान बाहर के या अंदर के शोषकों (सय्याद) से, सांप्रदायिक दंगों की तेज़ आँधी (सरसर) से, और अचानक आने वाली आफ़तों की बिजली से बच भी जाए, तो भी हमारा ये घर (आशियाँ) कब तक सलामत (क़ा’एम) रह सकता है अगर इस की अंदरूनी सामाजिक और आर्थिक बुनियादें ही अंदर से बिल्कुल खोखली (खोखली टहनी) हों?

११

यक़ीं है घर करेगी दिल में दुश्मन के वफ़ा मेरी

कोई अए अमन मुझ से रह सकेगा बदगुमाँ कब तक

 

ये ग़ज़ल का आख़िरी शे’र है जो गांधी जी के अहिंसा और प्रेम के रास्ते पर आधारित उम्मीद, मेल-मिलाप और शांति का संदेश देता है। बटवारे के बाद जहाँ हर तरफ़ गहरा अविश्वास और नफ़्रत का माहौल था, वहाँ अमन पूरे यक़ीन के साथ कहते हैं के सच्ची सहानुभूति, इंसानियत और भलाई (वफ़ा) एक दिन दुश्मनों के दिलों को भी जीत लेगी और उन के दिलों में फैली गहरी राजनीतिक ग़लतफ़हमियों और शंकाओं (बदगुमाँ) को हमेशा के लिये ख़त्म कर देगी।

 

parvardigaar-e do jahaaN kab tak – gopi nath amn
1
amal ka husn-e isteqlaal se hai iin-o-aaN kab tak
Gham-e anjaam aur andesha-e sood-o-ziyaaN kab tak
2
zabaaN aaKhir na hogi haal-e dil ki tarjumaaN kab tak
lagi ho aag jab dil mein, na niklega dhuaaN kab tak
3
yeh shaiKh-o-barhaman me’N roz bahs-e iin-o-aaN kab tak
baham aavezish-e aavaaz-e naaqoos-o-azaaN kab tak
4
haqiiqat khul hi jaa’egi agar kuchh bhi haqiiqat hai
rahega raaz-e hasti saat pardon me’N nehaaN kab tak
5
mer’e Khaaliq teri maKhlooq bhooki marti jaati hai
kah’e jaa’uN tujh’e parvardigaar-e do jahaaN kab tak
6
kuchh apna martaba jaano kuchh apni qadr pehchaano
zamiiN par basn’e vaale shikva-e haft-aasmaaN kab tak
7
havaa ke ruKh pe uRti Khaak manzil kya bataa’egi
karega rahnumaa’ii yeh Ghubaar-e kaarvaaN kab tak
8
nasheman par abhi hai Khaana-e sayyaad ka saaya
yeh mahkoomi yeh majboori nasiib-e dushmanaaN kab tak
9
mujhe kya faa’eda iss se keh sayyaadoN ki badli ho
mera hindostaaN hoga mera hindostaaN kab tak
10
agar bach bhi raha sayyaad se, sarsar se, bijli se
rahega khokhli Tahni pe qaa’em aashiyaaN kab tak
11
yaqiiN hai ghar karegi dil me’N dushman ke vafa meri
koi aye amn mujh se rah sakega badgumaaN kab tak

gopi nath amn (1898-1983), lakhnau.  His brother, father, grandfather and his son were all urdu poets of note.  They all wrote (among other compositions) odes and elegies to islamic figures.  gopi nath and his brother were sent to a madrasa for a good part of their education.  He was a freedom fighter and a stout gandhian, a  strong advocate and practitioner of communal harmony.  He worked with josh malihabadi and balmukund arsh malsiani as associate editor of the govt of India periodical, ‘aaj kal’.  Editor of several magazines in lakhnau and kanpur.  He was awarded padma bhushan in 1977.  He composed many cross religious compositions including marsia and salaam, many of which are lost.  He simultaneously composed hymns/odes to hindu religious figures as well as nationalistic poems.
1
amal ka husn-e isteqlaal se hai iin-o-aaN kab tak
Gham-e anjaam aur andesha-e sood-o-ziyaaN kab tak

How long will the beauty/excellence of steadfast action (amal ka husn-e isteqlaal) be paralyzed by endless (iin-o-aaN – this and that i.e. trivial) bureaucratic/political or sectarian debates. Written in the backdrop of independence this calls for immediate, decisive nation-building, urging people to stop obsessing over personal profit and loss (sood-o-ziyaaN) or fearing the consequences of taking bold risks for the new country.
2
zabaaN aaKhir na hogi haal-e dil ki tarjumaaN kab tak
lagi ho aag jab dil me’N, na niklega dhuaaN kab tak

The poet warns that the citizens’ pain cannot be silenced forever; when popular discontent and suffering reach a boiling point, the truth will inevitably manifest as a public outcry (dhuaaN).  The discontent and suffering could have bases in scarcity, unjust distribution, fanning of sectarian flames – all of these and more.
3
yeh shaiKh-o-barhaman me’N roz bahs-e iin-o-aaN kab tak
baham aavezish-e aavaaz-e naaqoos-o-azaaN kab tak

A direct critique of the horrific communal riots and political polarization between hindus (barhaman) and muslims (shaiKh) with their endless and trivial bickering argument – bahs. The poet laments the constant clashing aavezish between baham temple bells (naaqoos) and the muslim call to prayer (azaaN), asking when this destructive religious friction will finally give way to secular peace.
4
haqiiqat khul hi jaa’egi agar kuchh bhi haqiiqat hai
rahega raaz-e hasti saat pardon me’N nehaaN kab tak

A warning to the political leadership of the newly formed state. The poet states that the ground realities of the nation’s true state cannot be hidden behind seven veils – (saat pardon me’N) of political rhetoric or propaganda; the truth – haqiiqat – of the people’s hidden condition-raaz-e hastii-will soon expose itself.
5
mer’e Khaaliq teri maKhlooq bhooki marti jaati hai
kah’e jaa’uN tujh’e parvardigaar-e do jahaaN kab tak

A devastating commentary on the severe post-independence economic crisis, famine, and poverty. The poet boldly addresses god (and metaphorically, the sovereign rulers), asking how one can praise a provider parvardigaar while the common people maKhlooq are starving to death.
6
kuchh apna martaba jaano kuchh apni qadr pehchaano
zamiiN par basn’e vaale shikva-e haft-aasmaaN kab tak

An urgent call for democratic self-reliance and civic agency. The poet tells the citizens of the newly free nation to stop blaming destiny or a distant government (shikva-e haft-aasmaaN) and to recognize that, in a free democracy, the power to change their material reality lies in their own hands.  Realize your status martaba and know your ability qadr, he says.
7
havaa ke ruKh pe uRti Khaak manzil kya bataa’egi
karega rahnumaa’ii yeh Ghubaar-e kaarvaaN kab tak

A sharp warning against path-dependency and neo-colonialism. The poet argues that the departing British administration is a caravan that has already left, leaving only a lingering cloud of dust (Ghubaar-e-kaarvaaN) in its wake. He demands a clean break from the institutional structures, economic policies, and legal systems left behind by the colonizer, asking how long the newly free nation can expect a dead trail of dust to guide them toward a genuinely sovereign future.  The same feeling expressed by panDit anand narain mulla …
pairoN ki kaTii beRii jis dam, qaidii samjha aazaad hua
ye bhuul gaya gardan meN abhi, zanjir-e tilaa’ii baaqi hai
8
nasheman par abhi hai Khaana-e sayyaad ka saaya
yeh mahkoomi yeh majboori nasiib-e dushmanaaN kab tak

The poet notes that despite formal independence, the shadow of the colonial hunter (sayyaad) – through institutional systems, economic dependencies, or the trauma of partition – still hangs heavily over the nation’s home (nasheman). He asks how long this dependence/subjugation mahkoomi and helplessness majboori (may it befall only one one’s worst enemies nasiib-e dushmanaaN) will continue.
9
mujhe kya faa’eda iss se keh sayyaadoN ki badli ho
mera hindostaaN hoga mera hindostaaN kab tak

The core political thesis of the Ghazal. The poet bitterly remarks that simply replacing British rulers with native Indian elites is just a “change of hunters/exploiters” (sayyaadoN ki badli). He asks when India will truly belong to its actual, ordinary citizens rather than just its new political masters.
10
agar bach bhi raha sayyaad se, sarsar se, bijli se
rahega khokhli Tahni pe qaa’em aashiyaan kab tak

Even if India survives external/internal hunters/exploiters (sayyaad), stormy winds sarsar of communal violence, and lightning strikes (bijli) of disasters, how long can the home aashiyaaN survive qaa’em if its internal socio-economic foundations remain completely hollowed out (khokhli Tahni)?
11
yaqiiN hai ghar karegi dil me’N dushman ke vafa meri
koi aye amn mujh se rah sakega badgumaan kab tak

A concluding message of hope, reconciliation, and peace based on the gandhian spirit of non-violence. In an atmosphere filled with deep mistrust and hatred between communities post-Partition, amn asserts that absolute sincerity, humanism, and goodwill (vafa) will eventually disarm the external enemy or internal conflict and dissolve deep-seated political suspicions (badgumaaN).