filistiini mujahidiin ke naam-inteKhaab aalam-Zhang Shixuan

فلسطینی  مجاہدین  کے  نام  ۔  ژانگ  شی  شوان  انتخاب  عالمؔ

۱

آؤ  تھوڑی  دیر  بیٹھے  رُو  برو  ہم  اور  تم

پھر  پئیں  خونِ  جِگر  کے  کچھ  سبُو  ہم  اور  تم

۲

اِک  طرف  بہری  ہے  دنیا،  اِک  طرف  گونگے  ہیں  ہم

دل  ہی  میں  رکھتے  ہیں  دل  کی  آرزو  ہم  اور  تم

۳

بولنے  کا  حق  گیا،  رونے  کا  باقی  ہے  مگر

آج  اشکوں  سے  کریں  گے  گفتگو  ہم  اور  تم

۴

ظلمتِ  شب  میں  سِتارے  گر  کے  غائب  ہو  گئے

آؤ  مِل  کر  دیں  صدائیں  کُو  بہ  کُو  ہم  اور  تم

۵

دہر  ڈوبا  ہے  اندھیرے  میں  بجھے  ہیں  سب  چراغ

اب  چراغِ  دِل  جلا  دیں  سُو  بہ  سُو  ہم  اور  تم

۶

آدمی  پر  آسماں  کے  سارے  رستے  بند  ہیں

پھر  بھی  حق  کی  کر  رہے  ہیں  جستُجُو  ہم  اور  تم

۷

پتھروں  کو  چیر  کر  دریا  بناتے  ہیں  ڈگر

پیروی  اُن  کی  کریں  گے  ہو  بہو  ہم  اور  تم

۸

دیکھ  لی  ویرانیِ  باغِِ  خِزاں  دل  تھام  کر

فصلِ  گُل  میں  دیکھ  لیں  گے  رنگ  و  بُو  ہم  اور  تم

۹

ذِلّتوں  ہی  سے  جنم  لیتی  ہیں  عالمؔ  عزّتیں

وقت  آئے  گا  تو  ہوں  گے  سرخرُو  ہم  اور  تم

 

انتخابِ عالمؔ—ژانگ شی شوان (۱۹۳۳۔۲۰۲۶)، بیجنگ، چین۔ شی شوان کا اُردو میں ترجمہ “انتخابِ عالم” ہوتا ہے، اسی لیے انہوں نے یہ تخلُّص چُنا۔ وہ ایک چینی شہری، کلاسک شاعری کے دلدادہ عالِم اور خود بھی ایک شاعر تھے۔ جب وہ صحافت (journalism)  کے طالب علم تھے، تب انہیں اُردو کے ایک سخت کورس میں بھیج دیا گیا اور پاک-چین تعلقات کو بہتر بنانے کی ذمّہ داری دی گئی۔ وہ اُردو میں مہارت حاصل کرتے گئے، اُردو شاعری میں ان کی دلچسپی بڑھی اور انہوں نے بہت مطالعہ کرنا شروع کیا۔ ۱۹۷۰ کی دہائی میں، انہوں نے پاکستان سے آئے ہوئے شاعر منظر حسین رازی سے علمِ عروض (شاعری کے اوزان) سیکھا۔ اُنہیں پاکستان کی بیجنگ فارن اسٹڈیز یونیورسٹی میں پڑھانے کی دعوت دی گئی، جہاں اپنا کام مکمل کر کے وہ ۱۹۸۶ میں بیجنگ واپس آ گئے۔ اس کے بعد کچھ عرصے کے لیے ان کا اُردو شاعری اور تہذیب سے رابطہ ٹوٹ گیا، لیکن بیجنگ میں پاکستانی سفارت خانے کے مشاعروں میں شرکت کی وجہ سے یہ رابطہ دوبارہ بحال ہو گیا۔ ان کا کلام پاکستان کے ادبی رسالوں میں چھپتا رہا۔ اُنہوں نے فیض احمد فیضؔ کے مجموعہ کلام کا چینی زبان میں ترجمہ بھی کیا۔ پاکستان اکیڈمی آف لیٹرز نے ان کا سارا کلام جمع کر کے ۱۹۹۵ میں ان کا ایک دیوان شائع کیا۔

۱

آؤ  تھوڑی  دیر  بیٹھیں  رُو  برو  ہم  اور  تم

پھر  پئیں  خونِ  جِگر  کے  کچھ  سبُو  ہم  اور  تم

 

شاعر  فلسطینی  مجاہدینِ  آزادی  کو  دعوت  دیتا  ہے  کہ  وہ  مشترکہ  غم  کے  ساتھ  ایک  دوسرے  کے  آمنے  سامنے  (روبرو)  بیٹھیں۔  وہ  کہتا  ہے  کہ  وہ  مل  کر  اپنے  ہی  خونِ  جگر  کے  پیالے  (سُبُو)  پیئیں—یہ  ایک  گہرا  اور  جاندار  استعارہ  ہے  جو  اس  اندرونی  تکلیف  اور  قربانی  کو  ظاہر  کرتا  ہے  جو  وہ  دونوں  آپس  میں  بانٹتے  ہیں  اور  برداشت  کرتے  ہیں۔

۲

اِک  طرف  بہری  ہے  دنیا،  اِک  طرف  گونگے  ہیں  ہم

دل  ہی  میں  رکھتے  ہیں  دل  کی  آرزو  ہم  اور  تم

 

یہ  شعر  ایک  تکلیف  دہ  تنہائی  اور  بیگانگی  کو  اPجاگر  کرتا  ہے۔  ایک  طرف  یہ  دنیا  مظلوموں  کے  دکھ  درد  سے  بالکل  بہری  ہو  چکی  ہے،  اور  دوسری  طرف  متاثرین  کو  خاموش  (گونگا)  کر  دیا  گیا  ہے  جس  کی  وجہ  سے  وہ  اپنی  آواز  نہیں  اُٹھا  سکتے۔  نتیجہ  یہ  ہے  کہ  شاعر  اور  مجاہدین  دونوں  ہی  اپنی  گہری  اُمّیدوں  اور  تمنّاؤں  (آرزو)  کو  اپنے  دلوں  کے  اندر  ہی  خاموشی  سے  مُقفّل  رکھنے  پر  مجبور  ہیں۔

۳

بولنے  کا  حق  گیا,  رونے  کا  باقی  ہے  مگر

آج  اشکوں  سے  کریں  گے  گفتگو  ہم  اور  تم

 

جب  بولنے  یا  احتِجاج  کرنے  کا  بنیادی  حق  بھی  چھین  لیا  جائے،  تو  پھر  صرف  رونے  کا  حق  ہی  باقی  رہ  جاتا  ہے۔  شاعر  کہتا  ہے  کہ  چونکہ  اب  لفظوں  پر  پابندی  ہے  یا  وہ  بے  اثر  ہو  چکے  ہیں،  اس  لیے  آج  وہ  اپنی  باہمی  تکلیف،  ہِمّت  اور  داستانوں  کو  آنسوؤں  (اشکوں)  کی  اس  خاموش  اور  آفاقی  زبان  کے  ذریعے  ایک  دوسرے  تک  پہنچائیں  گے۔

۴

ظلمتِ  شب  میں  سِتارے  گر  کے  غائب  ہو  گئے

آؤ  مِل  کر  دیں  صدائیں  کُو  بہ  کُو  ہم  اور  تم

 

ظلم  و  ستم  کے  اس  گُھپ  اندھیرے  (ظلمتِ  شب)  میں  ستارے  بھی—جو  کہ  امید،  رہنماؤں  یا  شہیدوں  کی  علامت  ہیں—ٹوٹ  کر  غائب  ہو  چکے  ہیں۔  اس  تاریک  خلا  کے  جواب  میں،  شاعر  مجاہدین  پر  زور  دیتا  ہے  کہ  وہ  متحد  ہو  جائیں  اور  ہر  گلی  کوچے  (کو  بہ  کو)  میں  مل  کر  آواز  اُٹھائیں  تاکہ  اس  سنّاٹے  اور  خاموشی  کو  توڑا  جا  سکے۔

۵

دہر  ڈوبا  ہے  اندھیرے  میں  بجھے  ہیں  سب  چراغ

اب  چراغِ  دِل  جلا  دیں  سُو  بہ  سُو  ہم  اور  تم

 

ایسا  لگتا  ہے  کہ  پوری  دنیا  (دہر)  اخلاقی  اور  سیاسی  اندھیرے  میں  ڈوب  چکی  ہے،  اور  اُمّید  کے  تمام  بیرونی  چراغ  بجھ  چکے  ہیں۔  شاعر  اس  کا  ایک  اندرونی  علاج  تجویز  کرتا  ہے:  وہ  کہتا  ہے  کہ  ہمیں  ہر  سِمت  (سُو  بہ  سُو)  روشنی  پھیلانے  اور  مزاحمت  کے  جذبے  کو  زندہ  رکھنے  کے  لیے  اپنے  ہی  دلوں  کے  چراغ  (چراغِ  دل)  جلانے  ہوں  گے۔

۶

آدمی  پر  آسماں  کے  سارے  رستے  بند  ہیں

پھر  بھی  حق  کی  کر  رہے  ہیں  جستُجُو  ہم  اور  تم

 

اگرچہ  اِنسان  کے  لیے  آسمانی  مدد،  سیاسی  راستے  اور  بقا  کی  تمام  راہیں  مکمّل  طور  پر  بند  نظر  آتی  ہیں،  لیکن  ان  کا  حوصلہ  پھر  بھی  نہیں  ٹوٹا۔  حالات  کی  اس  انتہائی  نااُمیدی  کے  باوجود،  وہ  حق  اور  انصاف  کی  تلاش  (جُستُجو)  میں  مُسلسِل  اور  ہٹ  دھرمی  سے  ڈٹے  ہوئے  ہیں۔

۷

پتھروں  کو  چیر  کر  دریا  بناتے  ہیں  ڈگر

پیروی  اُن  کی  کریں  گے  ہو  بہو  ہم  اور  تم

 

شاعر  قدرت  سے  سبق  لیتا  ہے  اور  دیکھتا  ہے  کہ  کس  طرح  دریا  سخت  چٹانوں  کو  چیر  کر  (پتھروں  کو  چیر  کر)  اپنا  راستہ  (ڈگر)  خود  بناتے  ہیں۔  وہ  اعلان  کرتا  ہے  کہ  وہ  اور  مجاہدین  بھی  بالکل  اِسی  انتھک  اور  ناقابلِ  تسخیر  قوت  کی  ہو  بہو  پیروی  کریں  گے،  اور  آزادی  کا  راستہ  بنانے  کے  لیے  سخت  ترین  رکاوٹوں  کو  بھی  توڑ  دیں  گے۔

۸

دیکھ  لی  ویرانیِ  باغِِ  خِزاں  دل  تھام  کر

فصلِ  گُل  میں  دیکھ  لیں  گے  رنگ  و  بُو  ہم  اور  تم

 

خزاں  کے  اُجڑے  اور  ویران  چمن  (باغِ  خزاں)  کے  تباہ  کُن  مناظر  کو  دل  تھام  کر  جھیلنے  کے  بعد،  اُنہوں  نے  بربادی  کا  بدترین  روپ  دیکھ  لیا  ہے۔  اس  کے  باوجود،  شاعر  انقلابی  امید  کے  ساتھ  مستقبل  کی  طرف  دیکھتا  ہے،  اور  وعدہ  کرتا  ہے  کہ  وہ  آزادی  کی  آنے  والی  بہار  (فصلِ  گل)  کے  دلکش  رنگوں  اور  خوشبوؤں  (رنگ  و  بو)  کا  نظارہ  کرنے  کے  لیے  ضرور  زندہ  رہیں  گے۔

۹

ذِلّتوں  ہی  سے  جنم  لیتی  ہیں  عالمؔ  عزّتیں

وقت  آئے  گا  تو  ہوں  گے  سرخرُو  ہم  اور  تم

 

اس  آخری  شعر  (مقطع)  میں،  شاعر  (عالمؔ)  تاریخ  کا  ایک  گہرا  اور  سچا  اُصول  بیان  کرتا  ہے:  سچی  عزّتیں  اکثر  بدترین  تذلیل،  مصائب  اور  تکالیف  (ذلتوں)  کو  صبر  سے  جھیلنے  کے  بعد  ہی  جنم  لیتی  ہیں۔  وہ  مجاہدینِ  آزادی  کو  دلاسا  اور  یقین  دلاتا  ہے  کہ  ایک  دن  ضرور  ایسا  آئے  گا  جب  اُن  کی  بے  پناہ  قربانیاں  رنگ  لائیں  گی،  اور  ہم  اور  تم  دونوں  کامیابی  اور  فخر  کے  ساتھ  سرخرو  (دمکتے  چہرے)  ہوں  گے۔

 

फ़िलिस्तीनी मुजाहेदीन के नाम – ज़्शांग शीश्वान इन्तेख़ाब आलम

आओ थोड़ी देर बैठें रू-ब-रू हम और तुम

फिर पिएँ ख़ून-ए जिगर के कुछ सुबू हम और तुम

एक तरफ़ बहरी है दुनिया, एक तरफ़ गूँगे हैं हम

दिल ही में रखते हैं दिल की आर्ज़ू हम और तुम

बोलने का हक़ गया, रोने का बाक़ी है मगर

आज अश्कों से करेंगे गुफ़्तुगू हम और तुम

ज़ुल्मत-ए शब में सितारे गिर के ग़ा’एब हो गए

आओ मिल कर दें सदाएँ कू-ब-कू हम और तुम

दहर डूबा है अँधेरे में बुझे हैं सब चराग़

अब चराग़-ए दिल जला दें सू-ब-सू हम और तुम

आदमी पर आसमाँ के सारे रस्ते बंद हैं

फिर भी हक़ की कर रहे हैं जुस्तुजू हम और तुम

पत्थरों को चीर कर दरिया बनाते हैं डगर

पैरवी उन की करेंगे हू-ब-हू हम और तुम

देख ली वीरानी-ए बाग़-ए ख़िज़ाँ दिल थाम कर

फ़स्ल-ए गुल में देख लेंगे रंग-ओ-बू हम और तुम

ज़िल्लतों ही से जनम लेती हैं आलम इज़्ज़तें

वक़्त आएगा तो होंगे सुर्ख़-रू हम और तुम

 

इन्तेख़ाब आलम—ज़्शांग शिश्वान (१९३३-२०२६), बेजिंग, चीन। ‘शिश्वान’ का उर्दू में मतलब होता है ” इन्तेख़ाब आलम”, इसीलिए उन्होंने ये तख़ल्लुस (उपनाम) चुना। वो एक चीनी नागरिक, क्लासिकल शा’एरी के शौक़ीन विद्वान और ख़ुद भी एक कवि थे। जब वो पत्रकारिता (journalism) के छात्र थे, तब उन्हें उर्दू के एक कड़े कोर्स में भेज दिया गया और पाक-चीन संबंधों को बेहतर बनाने का काम सौंपा गया। वो उर्दू में माहिर होते गए, उर्दू शा’एरी में उनकी दिलचस्पी बढ़ी और उन्होंने बहुत पढ़ना शुरू कर दिया। १९७० के दशक में, उन्होंने पाकिस्तान से आए कवि मंज़र हुसैन राज़ी से इल्म-ए-अरूज़ (शा’एरी के नियम और व्याकरण) सीखा। उन्हें Beijing Foreign Studies University की तरफ़ से पाकिस्तान में पढ़ाने के लिये आमंत्रित किया गया था। अपना assignment पूरा कर के वो १९८६ में बेजिंग लौट आए, जिस की वजह से कुछ समय के लिये उन का उर्दू शा’एरी और संस्कृति से संपर्क टूट गया। लेकिन बेजिंग में पाकिस्तानी दूतावास के मुशा’एरों में हिस्सा लेने से ये संपर्क फिर से ज़िंदा हो गया। उन का काम पाकिस्तान की पत्रिकाओं में छपता रहा। उन्होंने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की कविताओं के संग्रह का चीनी भाषा में अनुवाद भी किया। Pakistan Academy of Letters ने उन के काम को इकट्ठा किया और १९९५ में उनका एक दीवान (काव्य-संग्रह) प्रकाशित किया।

आओ थोड़ी देर बैठें रू-ब-रू हम और तुम

फिर पिएँ ख़ून-ए जिगर के कुछ सुबू हम और तुम

 

शा’एर फ़िलिस्तीनी आज़ादी के मुजाहेदीन (योद्धाओं) को अपने दुख-दर्द को साझा करने के लिये आमने-सामने (रू-ब-रू) बैठने का न्योता देता है। वो सुझाव देता है के वो मिल कर अपने ही दिल के ख़ून के प्याले (ख़ून-ए जिगर के सुबू) पिएँ—यह एक बेहद असरदार रूपक (metaphor) है जो उस गहरे दर्द और क़ुर्बानी को दिखाता है जिसे वो दोनों मिल कर सह रहे हैं और महसूस कर रहे हैं।

एक तरफ़ बहरी है दुनिया, एक तरफ़ गूँगे हैं हम

दिल ही में रखते हैं दिल की आर्ज़ू हम और तुम

 

ये शे’र एक तक्लीफ़दह अकेलेपन को दिखाता है। एक तरफ़ जहाँ दुनिया मज़्लूमों के दुख से पूरी तरह बहरी हो चुकी है, वहीं दूसरी तरफ़ पीड़ितों को ख़ामोश (गूँगे) कर दिया गया है, जिस से वो अपनी आवाज़ दुनिया तक नहीं पहुँचा पा रहे हैं। नतीजा ये है के शा’एर और मुजाहेदीन दोनों ही अपनी गहरी उम्मीदों और चाहतों (आर्ज़ू) को अपने दिलों के भीतर ही चुपचाप दबा कर रखने के लिये मज्बूर हैं।

बोलने का हक़ गया, रोने का बाक़ी है मगर

आज अश्कों से करेंगे गुफ़्तुगू हम और तुम

 

जब बोलने या विरोध करने का बुनियादी अधिकार भी छीन लिया जाए, तो सिर्फ़ रोने का ही रास्ता बचता है। शा’एर कहता है के चूँके अब शब्दों पर पाबंदी लग चुकी है या वो बेअसर हो चुके हैं, इस लिये आज वो अपनी साझा तक्लीफ़, हिम्मत और दास्तान को आँसुओं (अश्कों) की इस ख़ामोश और आफ़ाक़ी (universal) ज़बान से बयां करेंगे।

ज़ुल्मत-ए शब में सितारे गिर के ग़ा’एब हो गए

आओ मिल कर दें सदाएँ कू-ब-कू हम और तुम

 

ज़ुल्म और दमन के इस घने अँधेरे (ज़ुल्मत-ए शब) में सितारे भी—जो उम्मीद, रहनुमाओं या शहीदों के प्रतीक हैं—टूट कर ग़ा’एब हो चुके हैं। इस अँधेरे सन्नाटे का मुक़ाबला करने के लिये शा’एर मुजाहेदीन से एकजुट होने और हर गली-कूचे (कू-ब-कू) में मिल कर आवाज़ बलंद करने की अपील करता है ताके इस सन्नाटे को तोड़ा जा सके।

दहर डूबा है अँधेरे में बुझे हैं सब चराग़

अब चराग़-ए दिल जला दें सू-ब-सू हम और तुम

 

ऐसा लगता है के पूरी दुनिया (दहर) नैतिक और राजनैतिक अँधेरे में डूब चुकी है और उम्मीद के सभी बाहरी चराग़ बुझ चुके हैं। शा’एर इस का एक अंदरूनी इलाज बताता है: वो कहता है के हर तरफ़ (सू-ब-सू) रोशनी फैलाने और विरोध की लौ को ज़िंदा रखने के लिये हमें अपने ही दिलों के चराग़ (चराग़-ए दिल) जलाने होंगे।

आदमी पर आसमाँ के सारे रस्ते बंद हैं

फिर भी हक़ की कर रहे हैं जुस्तुजू हम और तुम

 

भले ही इंसानों के लिये मदद के सभी आसमानी रास्ते, राजनैतिक निकास और ज़िंदा बचने की राहें पूरी तरह बंद (सारे रस्ते बंद हैं) दिखती हों, फिर भी उन का हौसला अटूट है। हालात की इस चरम निराशा के बावजूद, वो सच्चाई और इंसाफ़ (हक़) की अपनी खोज (जुस्तुजू) में पूरी ज़िद के साथ डटे हुए हैं।

पत्थरों को चीर कर दरिया बनाते हैं डगर

पैरवी उन की करेंगे हू-ब-हू हम और तुम

 

शा’एर यहाँ क़ुद्रत से प्रेरणा लेता है। वो देखता है के नदियाँ लगातार बहते हुए ठोस चट्टानों को काटकर (पत्थरों को चीर कर) अपना रास्ता (डगर) ख़ुद बनाती हैं। वो एलान करता है के वो भी ठीक उसी तरह (हू-ब-हू) इस अटूट ताक़त की पैरवी (अनुसरण) करेंगे और अपनी आज़ादी की राह बनाने के लिये बड़ी से बड़ी बाधाओं को चीर देंगे।

देख ली वीरानी-ए बाग़-ए ख़िज़ाँ दिल थाम कर

फ़स्ल-ए गुल में देख लेंगे रंग-ओ-बू हम और तुम

 

पतझड़ के उस उजाड़ और वीरान बाग़ (बाग़-ए ख़िज़ाँ) की तबाही को भारी मन से सहने के बाद, उन्होंने बर्बादी का सब से बुरा रूप देख लिया है। फिर भी, शा’एर एक क्रांतिकारी उम्मीद के साथ आगे देखता है और वादा करता है के वो आज़ादी की आने वाली बहार (फ़स्ल-ए गुल) के ख़ूबसूरत रंगों और ख़ुशबू (रंग-ओ-बू) को देखने के लिये ज़रूर ज़िंदा रहेंगे।

ज़िल्लतों ही से जनम लेती हैं आलम इज़्ज़तें

वक़्त आएगा तो होंगे सुर्ख़-रू हम और तुम

 

इस आख़िरी शे’र (मक़्ते) में, शा’एर (आलम) इतिहास की एक गहरी सच्चाई सामने रखता है: सच्ची इज़्ज़त अक्सर बदतरीन अपमान, ज़िल्लत और तक्लीफ़ों को सहने के बाद ही जनम लेती है। वो स्वतंत्रता सेनानियों को भरोसा दिलाता है के एक दिन ज़रूर आएगा जब उनकी क़ुर्बानियाँ रंग लाएँगी और वो जीत और गर्व से दमकते हुए चेहरे (सुर्ख़-रू) के साथ उभरेंगे।

 

filistiini mujahidiin ke naam — Zhang Shixuan inteKhaab aalam
1
aao thoRi der baiTheiN ruu-ba-ruu hum aur tum
phir piy’eN Khuun-e jigar ke kuchh subuu hum aur tum
2
ek taraf bahri hai duniya, ek taraf guuNg’e haiN hum
dil hi m’eN raKhte haiN dil ki aarzuu hum aur tum
3
boln’e ka haq gaya, ron’e ka baaqi hai magar
aaj ashkoN se kareNge guftaguu hum aur tum
4
zulmat-e shab m’eN sitaar’e gir ke Ghaa’eb ho ga’e
aao mil kar d’eN sada’eN kuu-ba-kuu hum aur tum
5
dahar Duuba hai andher’e m’eN bujh’e haiN sab charaaGh
ab charaaGh-e dil jala d’eN suu-ba-suu hum aur tum
6
aadmi par aasmaaN ke saar’e rast’e band haiN
phir bhi haq ki kar rah’e haiN justajuu hum aur tum
7
pattharoN ko chiir kar dariya banaat’e haiN Dagar
pairavi unn ki kareNge huu-ba-huu hum aur tum
8
deKh li viiraani-e baaGh-e KhizaaN dil thaam kar
fasl-e gul m’eN deKh leNge raNg-o-buu hum aur tum
9
zillatoN hi se janam leti haiN aalam izzat’eN
vaqt aa’ega to hoNg’e surKh-ruu hum aur tum

inteKhaab aalam-Zhang Shixuan (1933-2026), Beijing, China.  Shixuan translated in urdu means inteKhaab aalam, hence the taKhallus.  He was a Chinese national, scholar interested in classical poetry, poet.  When he was still a student of journalism, he was reassigned to an intensive urdu study course and tasked with developing China-pakistan relationships.  He became proficient in urdu, interested in urdu shaa’eri and started reading a lot.  In the 1970s he learned arooz from visiting pakistani shaa’er manzar husain razi.  He was invited to teach at the Beijing Foreign Studies University in pakistan, finished his assignment and returned to beijing in 1986, causing him to loose contact with urdu shaa’eri and culture, which was revived by participation in mushaa’era in the pakistani embassy in beijing.  His work was published in magazines in pakistan.  He also translated faiz ahmed faiz’s collection into Chinese.  The Pakistan Academy of Letters collected his work and published a diivaan in 1995.
1
aao thoRi der baiTh’eN ruu-ba-ruu hum aur tum
phir piy’eN Khuun-e jigar ke kuchh subuu hum aur tum

The poet invites the palestinian freedom fighters to sit face-to-face (ruu-ba-ruu) in shared grief. He suggests that they drink goblets (subuu) of their own heart’s blood (Khuun-e jigar) together—a powerful metaphor representing the deep, internalized pain and sacrifice they both share and endure.
2
ek taraf bahri hai duniya, ek taraf guuNg’e haiN hum
dil hi m’eN raKhte haiN dil ki aarzuu hum aur tum

This verse highlights a painful isolation. On one hand, the world is deaf (bahri) to the plight of the oppressed, and on the other, the victims have been silenced (guuNg’e), unable to make their voices heard. Consequently, both the poet and the fighters are forced to keep their deepest hopes and desires (aarzuu) locked silently inside their hearts.
3
boln’e ka haq gaya, ron’e ka baaqi hai magar
aaj ashkoN se kareNge guftaguu hum aur tum

When the basic right to speak or protest has been stripped away, only the right to weep remains. The poet suggests that since words are forbidden or useless, they will communicate their shared agony, resilience, and stories today through the silent, universal language of tears (ashkoN).
4
zulmat-e shab m’eN sitaar’e gir ke Ghaa’eb ho ga’e
aao mil kar d’eN sada’eN kuu-ba-kuu hum aur tum

In the pitch-black darkness of oppression (zulmat-e shab), even the stars—representing hope, leaders, or martyrs—have fallen and vanished. In response to this dark vacuum, the poet urges the fighters to unite and raise their voices together in every street and corner (kuu-ba-kuu) to shatter the silence.
5
dahar Duuba hai andher’e m’eN bujh’e haiN sab charaaGh
ab charaaGh-e dil jala d’eN suu-ba-suu hum aur tum

The entire world (dahar) seems engulfed in moral and political darkness, and all external lights of hope have been extinguished. The poet proposes a internal remedy: they must ignite the lamps of their own hearts (charaaGh-e dil) to spread light in every direction (suu-ba-suu) and keep the spirit of resistance alive.
6
aadmi par aasmaaN ke saar’e rast’e band haiN
phir bhi haq ki kar rah’e haiN justajuu hum aur tum

Even though all heavenly aid, political escape routes, and paths of survival seem completely blocked (saar’e rast’e band haiN) for humankind, their spirit remains unbroken. Despite the absolute hopelessness of the situation, they stubbornly persist in their search (justajuu) for truth and justice (haq).
7
pattharoN ko chiir kar dariya banaat’e haiN Dagar
pairavi unn ki kareNge huu-ba-huu hum aur tum

The poet draws inspiration from nature, noting how rivers carve their own paths (Dagar) by relentlessly cutting through solid rock (pattharoN ko chiir kar). He declares that they will emulate (pairavi) this relentless, unstoppable force exactly (huu-ba-huu), breaking through the hardest obstacles to forge their path to freedom.
8
deKh li viiraani-e baaGh-e KhizaaN dil thaam kar
fasl-e gul m’eN deKh leNge raNg-o-buu hum aur tum

Having endured the devastating, barren landscape of autumn (baaGh-e KhizaaN) with heavy hearts, they have witnessed the worst of the destruction. Yet, the poet looks forward with revolutionary optimism, promising that they will survive to witness the vibrant colors and fragrances (raNg-o-buu) of the coming spring (fasl-e gul) of liberation.
9
zillatoN hi se janam leti haiN aalam izzat’eN
vaqt aa’ega to hoNg’e surKh-ruu hum aur tum

In this concluding verse (maqta), the poet (aalam) shares a profound historical truth: true honor (izzat’eN) is often born out of enduring deep humiliation and suffering (zillatoN). He reassures the freedom fighters that a day will surely come when their sacrifices will be vindicated, and they will emerge with faces glowing (surKh-ruu) with pride and victory.

One comment:

  1. Great work by the poet indeed. Clarity of language and delth of thought is remarkable . Sukhan ki kohna Maqshi ayyan hai.

    Thanks are also due to you for your invaluable efforts with Shahkaar and dissemination of Urdu Poetry

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