ali asGhar nikalt’e haiN-gopi nath amn

علی  اصغر  نکلتے  ہیں  ۔  گوپی  ناتھ  امنؔ

۱

غم  شبّیر  میں  آنکھوں  سے  اشک  اکثر  نکلتے  ہیں

رہے  تا  حشر  جِن  کی  قدر  وہ  گوہر  نکلتے  ہیں

۲

خدا  کی  شان،  حیدر  کی  ادا،  صورت  محمد  کی

بہ  ایں  انداز  میداں  میں  علی  اکبر  نکلتے  ہیں

۳

علمبردارِ  دیں  ہونے  کے  دعویدار  کچھ  کافر

سرِ  آلِ  نبی  نیزوں  پہ  لے  لے  کر  نکلتے  ہیں

۴

اب  اور  انداز  سے  ہوگی  حفاظت  دین  کی  محکم

فدا  ہونے  کو  اُمّت  پر  علی  اصغر  نکلتے  ہیں

۵

مورّخ  جائزہ  لیتے  ہیں  جب  تاریخِ  عالم  کا

صفِ  دیں  میں  منافق  بدتر  از  کافر  نکلتے  ہیں

۶

شکستِ  کُفر  کی  تمہید  ہے  خود  کُفر  کی  شِدّت

کہ  مرتے  وقت  اکثر  چیونٹیوں  کے  پر  نکلتے  ہیں

۷

ذرا  اے  امنؔ  دیکھیں  کارگر  ہوتا  ہے  کون  اِن  میں

کہیں  آہیں  نکلتی  ہیں  کہیں  خنجر  نکلتے  ہیں

 

گوپی ناتھ امن (١٨٩٨۔ ١٩٨٣)، لکھنؤ۔ ان کے بھائی، والد، دادا اور ان کے بیٹے، یہ سبھی اردو کے مایہ ناز اور جانے مانے شاعر تھے۔ ان سب نے (دوسرے کلام کے ساتھ ساتھ) اسلامی ہستیوں کی شان میں قصیدے اور مرثیے لکھے۔ گوپی ناتھ اور ان کے بھائی کو ان کی تعلیم کے ایک بڑے حصے کے لیے مدرسے بھیجا گیا تھا۔ وہ ایک مجاہدِ آزادی (فریڈم فائٹر) اور کٹر گاندھی وادی تھے، جو فرقہ وارانہ ہم آہنگی (مذہبی یکجہتی) کے زبردست حامی بھی تھے اور خود بھی اس پر عمل کرتے تھے۔ انہوں نے حکومتِ ہند کے رسالے ‘آج کل’ میں جوش ملیح آبادی اور بال مکند عرش ملسیانی کے ساتھ بطور اسسٹنٹ ایڈیٹر کام کیا۔ وہ لکھنؤ اور کانپور کے کئی میگزینوں کے ایڈیٹر بھی رہے۔ اُنہیں ١٩٧٧ میں پدم بھوشن سے نوازا گیا۔ انہوں نے تمام مذاہب کو جوڑنے والا بہت سا کلام لکھا، جس میں مرثیے اور سلام شامل ہیں، جن میں سے کئی اب گم ہو چکے ہیں۔ اُنہوں نے اپنے ہندو مذہبی ہستیوں کی شان میں بھجن/قصیدے اور ساتھ ہی ساتھ حبِ الوطنی پر مبنی نظمیں بھی لکھیں۔

۱

غم  شبّیر  میں  آنکھوں  سے  اشک  اکثر  نکلتے  ہیں

رہے  تا  حشر  جِن  کی  قدر  وہ  گوہر  نکلتے  ہیں

 

شبیر  (حسین)  کے  غم  میں  آنکھوں  سے  اکثر  آنسو  بہتے  ہیں۔  وہ  ایسے  موتی  ہیں  جن  کی  قدر  قیامت  تک  قائم  رہے  گی  (یعنی  یہ  ماتمی  آنسو  اتنے  قیمتی  ہیں)۔  شیعہ  عقیدے  میں،  حسین  کے  غم  میں  بہائے  جانے  والے  آنسوؤں  کو  بہت  قیمتی  مانا  جاتا  ہے  اور  یہ  گناہوں  کی  معافی  کا  ذریعہ  بنتے  ہیں۔

۲

خدا  کی  شان،  حیدر  کی  ادا،  صورت  محمد  کی

بہ  ایں  انداز  میداں  میں  علی  اکبر  نکلتے  ہیں

 

خدا  کی  شان،  حیدر  (علی)  کی  ادا،  اور  محمد  کی  صورت  لیے  ہوئے؛  علی  اکبر  اس  انداز  سے  میدانِ  جنگ  میں  آتے  ہیں۔  علی  اکبر  حسین  کے  جوان  بیٹے  تھے،  جن  کے  بارے  میں  کہا  جاتا  ہے  کہ  وہ  بالکل  اپنے  نانا  محمد  کی  شکل  کے  تھے  اور  ان  کا  جنگی  انداز  اپنے  دادا،  علی  ابن  ابی  طالب  جیسا  تھا۔

۳

علمبردارِ  دیں  ہونے  کے  دعویدار  کچھ  کافر

سرِ  آلِ  نبی  نیزوں  پہ  لے  لے  کر  نکلتے  ہیں

 

وہ  دین  کا  علم  اٹھانے  (دیندار  ہونے)  کے  دعویدار  تو  ہیں،  لیکن  اصل  میں  وہ  کافر  ہیں  کیونکہ  وہ  نبی  کی  آل  (اولاد)  کے  سروں  کو  نیزوں  پر  لے  کر  نکلتے  ہیں۔  کربلا  کی  جنگ  میں،  یزید  کی  فوج  مسلمان  ہونے  اور  دین  کا  پرچم  بلند  کرنے  کا  دعویٰ  کر  رہی  تھی،  لیکن  اس  کے  باوجود  اُنہوں  نے  محمد    کے  خاندان  کو  شہید  کیا،  ان  کے  سر  قلم  کیے  اور  انہیں  نیزوں  کی  نوک  پر  اٹھایا۔

۴

اب  اور  انداز  سے  ہوگی  حفاظت  دین  کی  محکم

فدا  ہونے  کو  اُمّت  پر  علی  اصغر  نکلتے  ہیں

 

اب  دین  کی  حفاظت  ایک  بالکل  الگ  اور  مضبوط  انداز  سے  ہوگی۔  اُمّت  پر  قربان  ہونے  کے  لیے  علی  اصغر  میدان  میں  آتے  ہیں۔  علی  اصغر  حسین  کے  شیر  خوار  (ننھے)  بیٹے  تھے۔  اُن  کے  خاندان  اور  ساتھیوں  کا  پانی  بند  کر  دیا  گیا  تھا۔  کہا  جاتا  ہے  کہ  امام  حسین  اپنے  ننھے  بیٹے  کو  اپنے  ہاتھوں  پر  اُٹھا  کر  باہر  لائے  اور  مخالف  فوج  سے  کہا  کہ  کم  از  کم  اس  معصوم  بچے  کو  تو  پینے  کے  لیے  پانی  دے  دو۔  انہوں  نے  بچے  کے  گلے  پر  تیر  مار  کر  اسے  شہید  کر  دیا۔  گوپی  ناتھ  امن  کہتے  ہیں  کہ  یہ  علی  اصغر  کا  جنگ  لڑنے  اور  دین  کو  بچانے  کا  اپنا  ایک  انداز  تھا۔

۵

مورّخ  جائزہ  لیتے  ہیں  جب  تاریخِ  عالم  کا

صفِ  دیں  میں  منافق  بدتر  از  کافر  نکلتے  ہیں

 

جب  مؤرخ  (تاریخ  لکھنے  والا)  دنیا  کی  تاریخ  کا  جائزہ  لیتا  ہے،  تو  اسے  پتہ  چلتا  ہے  کہ  ایمان  والوں  کی  صفوں  میں  موجود  منافق،  کافروں  سے  بھی  زیادہ  بدتر  ثابت  ہوئے۔  اس  کا  اشارہ  یہ  ہے  کہ  یزید  اور  اس  کے  پیروکار  خود  کو  ایمان  والوں  میں  شمار  کرتے  تھے،  لیکن  وہ  منافق  تھے  جو  صرف  دین  کا  ڈرامہ  کر  رہے  تھے  اور  کافروں  سے  بھی  زیادہ  بُرے  ثابت  ہوئے۔

۶

شکستِ  کُفر  کی  تمہید  ہے  خود  کُفر  کی  شِدّت

کہ  مرتے  وقت  اکثر  چیونٹیوں  کے  پر  نکلتے  ہیں

 

ظلم  و  کفر  کی  شِدّت  ہی  خود  اُس  کی  ہار  کی  شروعات  ہوتی  ہے؛  بالکل  اسی  طرح  جیسے  کچھ  چیونٹیوں  کے  مرنے  سے  پہلے  پر  (پنکھ)  نکل  آتے  ہیں۔  چیونٹیوں  کی  ایک  ایسی  قسم  ہوتی  ہے  جس  کے  پر  نکلتے  ہیں  اور  وہ  اپنے  گھونسلے  سے  اُڑ  جاتی  ہیں،  لیکن  جلد  ہی  ان  کے  پر  گر  جاتے  ہیں  اور  وہ  مر  جاتی  ہیں۔  یہ  محاورہ  اکثر  ‘اپنی  اوقات  سے  باہر  نکلنے’  یا  بہت  زیادہ  غرور  دکھانے  اور  اس  کے  نتیجے  میں  تباہ  ہونے  کے  لیے  استعمال  ہوتا  ہے۔  یہاں  یہ  اشارہ  ہے  کہ  یزید  نے  بھی  (اپنی  طاقت  پر)  بہت  زیادہ  غرور  دکھایا،  اور  یہی  اس  کی  (روحانی)  ہار  کا  آغاز  بن  گیا۔

۷

ذرا  اے  امنؔ  دیکھیں  کارگر  ہوتا  ہے  کون  اِن  میں

کہیں  آہیں  نکلتی  ہیں  کہیں  خنجر  نکلتے  ہیں

 

اے  امن،  ذرا  دیکھتے  ہیں  کہ  ان  میں  سے  کون  سی  چیز  اثر  دکھاتی  ہے۔  ایک  طرف  دُکھ  بھری  آہیں  ہیں،  تو  دوسری  طرف  خنجر  تانے  جا  رہے  ہیں۔  یہاں  با  حق  اور  بے  بس  لوگوں  پر  خنجر  چلانے  کے  ظلم  و  ستم  کا  ذکر  ہے،  اور  یہ  کہا  گیا  ہے  کہ  یہ  ظلم  کبھی  کامیاب  یا  اثر  دار  نہیں  ہونے  والا۔

 

अली अस्ग़र निकलते हैं – गोपी नाथ अमन

ग़म-ए शब्बीर में आँखों से अश्क अक्सर निकलते हैं

रहे ता-हश्र जिन की क़द्र वो गौहर निकलते हैं

ख़ुदा की शान, हैदर की अदा, सूरत मोहम्मद की

ब-ईं अंदाज़ मैदाँ में अली अक्बर निकलते हैं

अलमबरदार-ए दीं होने के दावेदार कुछ काफ़िर

सर-ए आल-ए नबी नेज़ों पे ले ले कर निकलते हैं

अब और अंदाज़ से होगी हिफ़ाज़त दीन की मोहकम

फ़िदा होने को उम्मत पर अली अस्ग़र निकलते हैं

मु’अर्रिख़ जा’एज़ा लेते हैं जब तारीख़-ए आलम का

सफ़-ए दीं में मुनाफ़िक़ बदतर-अज़-काफ़िर निकलते हैं

शिकस्त-ए कुफ़्र की तम्हीद है ख़ुद कुफ़्र की शिद्दत

के मरते वक़्त अक्सर चींटियों के पर निकलते हैं

ज़रा अए अमन देखें कारगर होता है कौन इन में

कहीं आहें निकलती हैं कहीं ख़ंजर निकलते हैं

 

गोपी नाथ अमन (१८९८-१९८३), लखनऊ। उन के भाई, पिता, दादा और उन के बेटे, ये सभी उर्दू के जाने-माने और प्रतिष्ठित (reputed) कवि थे। इन सब ने (अन्य रचनाओं के साथ-साथ) इस्लामी हस्तियों की शान में क़सीदे और मर्सिये लिखे। गोपी नाथ और उन के भाई को उन की शिक्षा के एक बड़े हिस्से के लिये मद्रसे भेजा गया था। वो एक स्वतंत्रता सेनानी और पक्के गांधीवादी थे, जो सांप्रदायिक सौहार्द (मज़हबी एकता) के ज़बरदस्त समर्थक भी थे और ख़ुद भी उस पर अमल करते थे। उन्हों ने भारत सरकार की पत्रिका ‘आज कल’ में जोश मलीहाबादी और बाल मुकुंद अर्श मल्सियानी के साथ सहायक संपादक (associate editor) के रूप में काम किया। वो लखनऊ और कानपुर की कई पत्रिकाओं के संपादक भी रहे। उन्हें १९७७ में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। उन्हों ने सभी धर्मों को जोड़ने वाली बहुत सी रचनाएँ कीं, जिन में मर्सिया और सलाम शामिल हैं, जिन में से कई अब खो चुकी हैं। उन्हों अपने हिंदू धार्मिक हस्तियों की स्तुति में भजन और साथ ही साथ देशभक्ति की कविताएँ भी लिखीं।

ग़म-ए शब्बीर में आँखों से अश्क अक्सर निकलते हैं

रहे ता-हश्र जिन की क़द्र वो गौहर निकलते हैं

 

शब्बीर (हुसैन) के शोक में आँखों से अक्सर आँसू बहते हैं। ये वो मोती हैं जिन की क़द्र क़यामत तक बनी रहेगी (यानी ये शोक के आँसू बहुत क़ीमती हैं)। शिया अक़ीदे (विश्वास) में, हुसैन के ग़म में बहाए जाने वाले आँसू बहुत मूल्यवान माने जाते हैं और पापों की माफ़ी का ज़रिया बनते हैं।

ख़ुदा की शान, हैदर की अदा, सूरत मोहम्मद की

ब-ईं अंदाज़ मैदाँ में अली अक्बर निकलते हैं

 

ख़ुदा की शान, हैदर (अली) की अदा, और मोहम्मद का रूप लिये हुए; अली अक्बर इसी अंदाज़ में युद्ध के मैदान में आते हैं। अली अक्बर हुसैन के युवा पुत्र थे, जिन के बारे में कहा जाता है के वो बिल्कुल मोहम्मद जैसे दिखते थे और उन के युद्ध करने का अंदाज़ अपने दादा, अली इब्न-ए अबी तालिब जैसा था।

अलमबरदार-ए दीं होने के दावेदार कुछ काफ़िर

सर-ए आल-ए नबी नेज़ों पे ले ले कर निकलते हैं

 

वो धर्म का परचम उठाने (दींदार होने) के दावेदार तो हैं, लेकिन वो असल में काफ़िर (अविश्वासी) हैं क्यूंके वो नबी की आल (संतान) के सिरों को नेज़ों (भालों) पर ले कर निकलते हैं। करबला के युद्ध में, यज़ीद की सेना मुस्लिम होने और धर्म का झंडा बुलंद करने का दावा कर रही थी, लेकिन फिर भी उन्होंने मोहम्मद के परिवार को शहीद किया, उन के सर काटे और उन्हें भालों की नोक पर उठाया।

अब और अंदाज़ से होगी हिफ़ाज़त दीन की मोहकम

फ़िदा होने को उम्मत पर अली अस्ग़र निकलते हैं

 

अब धर्म की रक्षा एक बिल्कुल अलग और मज़्बूत/चिरस्थायी अंदाज़ में होगी। उम्मत (अनुयायियों) पर क़ुर्बान होने के लिये अली अस्ग़र मैदान में आते हैं। अली अस्ग़र हुसैन के दुधमुंहे (नन्हें) बेटे थे। उन के परिवार और साथियों का पानी बंद कर दिया गया था। कहा जाता है के हुसैन अपने नन्हें बेटे को अपने हाथों पर उठा कर बाहर लाए और विरोधी सेना से कहा के कम से कम इस मासूम बच्चे को तो पानी पिला दो। उन्होंने बच्चे के गले पर तीर मारकर उसे शहीद कर दिया। गोपी नाथ अमन कहते हैं के ये अली अस्ग़र का युद्ध लड़ने और धर्म को बचाने का अपना एक अंदाज़ था।

मु’अर्रिख़ जा’एज़ा लेते हैं जब तारीख़-ए आलम का

सफ़-ए दीं में मुनाफ़िक़ बदतर-अज़-काफ़िर निकलते हैं

 

जब इतिहासकार (मु’अर्रिख़) दुनिया के इतिहास का जा’एज़ा लेता है, तो उसे पता चलता है के ईमान वालों की सफ़ों (क़तारों) में मौजूद मुनाफ़िक़ (पाखंडी), काफ़िरों से भी ज़्यादा बदतर साबित हुए। इस का तात्पर्य ये है के यज़ीद और उस के अनुयायी (followers) ख़ुद को ईमान वालों में गिनते थे, लेकिन वो पाखंडी थे जो सिर्फ़ धर्म का नाटक कर रहे थे और अधर्मियों से भी बुरे साबित हुए।

शिकस्त-ए कुफ़्र की तम्हीद है ख़ुद कुफ़्र की शिद्दत

के मरते वक़्त अक्सर चींटियों के पर निकलते हैं

 

अधर्म और अन्याय की अति ही उस की हार की शुरु’आत (प्रस्तावना) होती है; बिल्कुल वैसे ही जैसे कुछ चींटियों के मरने से पहले पंख निकल आते हैं। चींटियों की एक ऐसी प्रजाति होती है जिस के पंख निकल आते हैं और वो उड़ जाती हैं, लेकिन जल्द ही वो अपने पंख खो देती हैं और मर जाती हैं। ये मुहावरा अक्सर ‘औक़ात से बाहर निकलने’, अत्यधिक अहंकार दिखाने और उस के कारण तबाह होने के लिये इस्तेमाल होता है। यहाँ इशारा ये है के यज़ीद ने भी (अपनी सत्ता पर) बहुत घमंड दिखाया, और यही उस की (आध्यात्मिक) पराजय की शुरु’आत बनी।

ज़रा अए अमन देखें कारगर होता है कौन इन में

कहीं आहें निकलती हैं कहीं ख़ंजर निकलते हैं

 

अए अमन, ज़रा देखते हैं के इन दोनों में से कौन सी चीज़ असरदार साबित होती है। एक तरफ़ दुःख भरी आहें हैं, तो दूसरी तरफ़ ख़ंजर ताने जा रहे हैं। यहाँ सच्चे और बेबस लोगों पर ख़ंजर चलाने के क्रूर अन्याय का ज़िक्र है, और ये कहा गया है के ये ज़ुल्म कभी कामयाब या असरदार नहीं होने वाला।

 

ali asGhar nikalt’e haiN – gopi nath amn
1
Gham-e shabbir meN aaNkhoN se ashk aksar nikalt’e haiN
rahe ta-hashr jin ki qadr vo gauhar nikalt’e haiN
2
Khuda ki shaan, haidar ki ada, suurat muhammad ki
ba-iiN andaaz maidaaN meN ali akbar nikalt’e haiN
3
alambardar-e diiN hon’e ke daave-daar kuchh kaafir
sar-e aal-e nabi naizoN pe le le kar nikalt’e haiN
4
ab aur andaaz se hogi hifaazat diin ki mohkam
fida hon’e ko ummat par ali asGhar nikalt’e haiN
5
mu’arriKh jaa’eza let’e haiN jab taariiKh-e aalam ka
saf-e diiN meN munaafiq badtar-az-kaafir nikalt’e haiN
6
shikast-e kufr ki tamhiid hai Khud kufr ki shiddat
keh mart’e vaqt aksar cheeNTiyoN ke par nikalt’e haiN
7
zara aye amn dekheN kaargar hota hai kaun in meN
kahiiN aaheN nikalti haiN kahiiN Khanjar nikalt’e haiN

gopi nath amn (1898-1983), lakhnau.  His brother, father, grandfather and his son were all urdu poets of note.  They all wrote (among other compositions) odes and elegies to islamic figures.  gopi nath and his brother were sent to a madrasa for a good part of their education.  He was a freedom fighter and a stout gandhian, a  strong advocate and practitioner of communal harmony.  He worked with josh malihabadi and balmukund arsh malsiani as associate editor of the govt of India periodical, ‘aaj kal’.  Editor of several magazines in lakhnau and kanpur.  He was awarded padma bhushan in 1977.  He composed many cross religious compositions including marsia and salaam, many of which are lost.  He simultaneously composed hymns/odes to hindu religious figures as well as nationalistic poems.
1
Gham-e shabbiir meN aaNkhoN se ashk aksar nikalt’e haiN
rahe ta-hashr jin ki qadr vo gauhar nikalt’e haiN

In mourning for shabbiir/husain eyes often aksar shed tears ashk.  Whose (high) value qadr is preserved until after doomsday hashr those are the pearls that are shed (such are these tears of mourning).  In the shia faith, tears shed in mourning of husain are considered very valuable and instrumental in the forgiveness of sins.
2
Khuda ki shaan, haidar ki adaa, suurat mohammad ki
ba-iiN andaaz maidaaN meN ali akbar nikalt’e haiN

Reflecting the glory shaan of god, the style adaa of haidar/ali, the looks of mohammed; such is the manner in which ali akbar comes into the field of battle.  ali akbar was the youthful son of husain; reputed to look like mohammed and to have the battle style of his grandfather, ali ibn-e abii-taalib.
3
alambardar-e diiN hon’e ke daave-daar kuchh kaafir
sar-e aal-e nabi naizoN pe le le kar nikalt’e haiN

They are claimants daave-daar of carrying the banner of faith alambardaar-e diiN but they are really kaafir non-believers for the carry the heads of aal-e nabi the progeny of the prophet on lances.  In the battle of karbala, yaziid‘s army claimed to be muslims, claimed to carry the banner of faith and yet, they killed and cut off the heads of the family of mohammed and carried them on the points of lances.
4
ab aur andaaz se hogi hifaazat diin ki mohkam
fida hon’e ko ummat par ali asGhar nikalt’e haiN

Now the protection hifaazat of the faith diin firm/fortified/lasting in a different andaaz manner.  To sacrifice himself for the faithful ali asGhar comes into the field of battle.  ali asGhar was the infant son of husain.  Access to water was cut off for his family and followers.  It is said that husain brought out his infant son lifted him up on his hands and asked the opposing army to at least give this innocent child water to drink.  They shot an arrow through his throat and killed him.  gopi nath amn declares that this is the manner in which ali asGhar fought the battle and saved the faith.
5
mu’arriKh jaa’eza let’e haiN jab taariiKh-e aalam ka
saf-e diiN meN munaafiq badtar-az-kaafir nikalt’e haiN

When the mu’arriKh historian/writer examines jaa’eza the history of the world taariiKh-e aalam he will find that in the ranks of the faithful saf-e diiN worse than non-believers badtar-az-kaafir turned out to be the hypocrites munaafiq.  The implication is that yaziid and his followers claimed to be among the ranks of the faithful but they were hypocrites who only pretended to follow the faith and proved to be worse than non-believers.
6
shikast-e kufr ki tamhiid hai Khud kufr ki shiddat
keh mart’e vaqt aksar cheeNTiyoN ke par nikalt’e haiN

Excesses of injustice kufr ki shiddat is the preamble to the defeat of injustice shikast-e kufr; just like some ants grow wings before dying.  There is a species of ant that grows wings and flies away from the colony but it soon sheds its wings and dies.  This is often used as a metaphor for ‘getting too big for their boots’ – showing excessive pride and failing/falling as a result.  The implication is that yaziid too showed excess pride (in his power).  This was the preamble to his (spiritual) defeat.
7
zara aye amn dekheN kaargar hota hai kaun in meN
kahiiN aaheN nikalti haiN kahiiN Khanjar nikalt’e haiN

O amn let us see which among these is effective kaargar.  There are sighs of sorrow on one side, while the other pulls out daggers.  The injustice/cruelty of pulling out daggers on the rightous and helpless is implied and it is said that this is not going to be effective.