andaaz-e Ghazal-Khwaani mujhe-mirza vaajid husain yaas yagaana chaNgezi

اندازِ  غزل  خوانی  مجھے  ۔  مرزا  واجد  حسین  یاسؔ  یگانہؔ  چنگیزی

بر  غزلِ  غالبؔ

۱

یار  کی  تصویر  ہی  دکھلا  دے  اے  مانی  مجھے

کچھ  تو  ہو  اس  نزع  کی  مشکل  میں  آسانی  مجھے

۲

اُف  بھی  کر  سکتا  نہیں  اب  کروٹیں  لینا  کجا

زخمِ  پہلو  سے  ہے  وہ  تکلیفِ  روحانی  مجھے

۳

زاہدِ  مغرور  رونے  پر  میرے  ہنستا  ہے  کیا

بخشوائے  گا  یہی  اشکِ  پشیمانی  مجھے

۴

دل  کو  اُس  پردہ  نشیں  سے  غائبانہ  لاگ  ہے

کھینچ  لے  گا  اِک  نہ  اِک  دِن  جذبِ  روحانی  مجھے

۵

یارب،  آغازِ  محبّت  کا  بخیر  انجام  ہو

دل  لگا  کر  ہو  رہی  ہے  کیا  پشیمانی  مجھے

۶

لو  لگی  ہے  یار  سے،  اپنی  طرف  کھینچے  گا  کیا

جلوۂ  نقش  و  نگارِ  عالمِ  فانی  مجھے

۷

وحشیوں  کے  واسطے  قیدِ  لباس  اچھی  نہیں

زیب  دیتا  ہے  یہی  تشریفِ  عریانی  مجھے

۸

جوشِ  وحشت  میں  زمیں  پر  پاؤں  پڑنے  کا  نہیں

لے  اُڑے  گی  نکہتِ  گُل  کی  پریشانی  مجھے

۹

خاک  ہو  جانے  پہ  بھی  ممکن  نہ  ہوگا  دسترس

ہاتھ  ملوائے  گی  تیری  پاک  دامانی  مجھے

۱۰

درد  کا  ساغر  بھی  ساقی  میری  قسمت  میں  نہ  تھا

شوق  میں  کرنا  پڑا  آخر  لہو  پانی  مجھے

۱۱

مردِ  جاہل  ہوں  کجا  میں  اور  کجا  اہلِ  کمال

یاسؔ  کیا  معلوم  اندازِ  غزل  خوانی  مجھے

 

مرزا  واجد  حسین  یاسؔ  یگانہؔ  چنگیزی  (۱۸۸۴۔۱۹۵۶)  عظیم  آباد/پٹنا  میں  پیدا  ہوئے۔  شروع  میں  اپنا  تخلص  یاسؔ  کیا  کرتے  تھے  اور  بعد  میں  یگاناؔ  کے  تخلص  سے  شعر  کہتے  تھے۔  ان  کو  خود  پسند،  ضِدّی،  ہٹ  دھرم  اور  بد  مزاج  سمجھا  جاتا  تھا۔  دوسرے  شعراء  سے  مانوسیت  نہ  تھی۔  اُنہوں  نے  اپنے  آپ  کو  غالب  کے  نقّاد  کی  حیثیت  میں  ڈھال  لیا  اور  ایک  کتابچہ  غالب  کی  تنقید  میں  لکھا۔  کچھ  دن  اُمرا  کے  بچوں  کو  تعلیم  دے  کر  زندگی  گزاری،  کچھ  دن  کلکتّہ  میں  بھی  یہی  کام  کیا،  لیکن  جلد  ہی  لکھنؤ  آ  گئے  اور  کچھ  مدرسوں  میں،  رسالوں  کے  لئے  اور  سرکاری  نوکرییاں  کیں۔  لاہور  میں  بھی  کوشش  کی  اور  کچھ  رِسالے  بھی  جاری  کئے  جو  زیادہ  نہ  چل  سکے۔    پھر  حیدرآباد  میں  سرکاری  وسطی  دفتری  نوکری  کرتے  رہے  (۱۹۲۸۔۱۹۴۲)۔  وہاں  سے  وظیفہ  (۱۵  روپئے  ماہانہ)  لے  کر  لکھنو  میں  قیام  کیا۔    مالی  تنگی  برداشت  کرتے  رہے۔  ۱۹۴۸  میں  جوش  ملیح  آبادی  کی  سفارش  پر  ہکومتِ  ہند  سے  ۱۰۰  روپئے  ماہانہ  اِجرا  کئے  گئے  جو  آخر  تک  ملتے  رہے۔  کسی  دوست  کو  چٹھی  میں  مذہبی  حُجّتی،  مُباحَثہ  طَلَب  باتیں  لکھیں۔  اُن  کے  دوست  نے  فاش  کر  دیا  اور  ان  کی  چِٹھی  شائع  کر  دی۔  اُن  کے  گھر  کے  باہر  ایک  مجمع  جمع  ہو  گیا  اور  اُن  کو  پکڑ  کر  گدھے  پہ  بٹھا  کر  منہ  کالا  کر  کے  شہر  کی  گلیوں  میں  پھرایا  گیا۔  انہوں  نے  اپنی  صاف  گوئی  ہمیشہ  برقرار  رکھی۔

۱

یار  کی  تصویر  ہی  دکھلا  دے  اے  مانی۱  مجھے

کچھ  تو  ہو  اس  نزع۲  کی  مشکل  میں  آسانی  مجھے

 

۱۔فارس  کے  قدیم  مصوّر  کا  نام  ۲۔آخری  سانس

 

اپنے  آخری  وقت  میں،  موت  کے  بستر  پر،  شاعر  مصوّر  (مانی)  سے  کہہ  رہا  ہے  کہ  اسے  محبوب  کی  تصویر  ہی  دکھا  دے۔  رواج  تو  یہ  ہے  کہ  محبوب  آخری  وقت  میں  عاشق  سے  ملنے  آتا  ہے،  مگر  اس  شاعر  کو  ایسی  کوئی  اُمّید  نہیں  ہے۔  اس  لیے  وہ  چاہتا  ہے  کہ  محبوب  کا  چہرہ  ۔  چاہے  وہ  صرف  ایک  تصویر  ہی  کیوں  نہ  ہو  ۔  دیکھ  کر  اس  کی  نکلتی  ہوئی  جان  کو  تھوڑی  سہولت  اور  آسانی  مل  جائے۔

۲

اُف  بھی  کر  سکتا  نہیں  اب  کروٹیں  لینا  کجا

زخمِ  پہلو۱  سے  ہے  وہ  تکلیفِ  روحانی  مجھے

 

۱۔بازو،  سینہ،  دل

 

شاعر  کی  تکلیف  جسمانی  حد  سے  آگے  نکل  گئی  ہے۔  وہ  اتنا  کمزور  ہو  گیا  ہے  کہ  “اُف”  تک  نہیں  کر  سکتا،  کروٹ  لینا  تو  بہت  دور  کی  بات  ہے۔  اس  کے  پہلو  کا  زخم  اب  صرف  جسم  کی  چوٹ  نہیں  رہا  بلکہ  ایک  روحانی  عذاب  بن  گیا  ہے۔  یہ  درد  اتنا  زیادہ  ہے  کہ  کروٹ  بدلنے  سے  بھی  کم  نہیں  ہوگا،  اور  ویسے  بھی  وہ  اتنے  درد  میں  ہے  کہ  نہ  ہل  سکتا  ہے  نہ  آہ  بھر  سکتا  ہے۔

۳

زاہدِ  مغرور  رونے  پر  میرے  ہنستا  ہے  کیا

بخشوائے  گا  یہی  اشکِ  پشیمانی۱  مجھے

 

۱۔ندامت،  پچھتاوا،  توبہ

 

یگانہ  اس  مغرور  زاہد  کا  مذاق  اُڑا  رہے  ہیں  جو  اُن  کے  رونے  پر  ہنستا  ہے۔  زاہد  کو  اپنے  خشک  رواجوں  اور  غرور  پر  بھروسہ  ہے،  مگر  شاعر  کو  یقین  ہے  کہ  اس  کی  نجات  اس  کے  ٹوٹے  ہوئے  دل  میں  ہے۔  یہ  شرمندگی  کے  آنسو  (اشکِ  پشیمانی)  ہی  آخر  میں  اسے  خدا  سے  معافی  دلوائیں  گے۔  جیسے  اقبال  نے  کہا  تھا  ۔۔۔

موتی  سمجھ  کے  شانِ  کریمی  نے  چُن  لئے

قطرے  جو  تھے  مرے  عرقِ  اِنفعال  کے

۴

دل  کو  اُس  پردہ  نشیں  سے  غائبانہ  لاگ  ہے

کھینچ  لے  گا  اِک  نہ  اِک  دِن  جذبِ۱  روحانی  مجھے

 

۱۔جزبہ،  جوش،  شوق

 

شاعر  اُس  پردہ  نشین  (خدا  یا  کوئی  پوشیدہ  محبوب)  سے  ایک  گہرے  اندیکھے  رشتے  کا  ذکر  کر  رہا  ہے۔  اُسے  اپنی  روحانی  کشش  (جذب)  پر  پورا  بھروسہ  ہے؛  اس  کا  ماننا  ہے  کہ  اس  کی  اندرونی  تڑپ  اتنی  طاقتور  ہے  کہ  ایک  نہ  ایک  دن  وہ  اسے  کسی  مقناطیس  کی  طرح  اس  دنیا  سے  کھینچ  کر  اس  چھپی  ہوئی  حقیقت  تک  لے  جائے  گی۔

۵

یارب،  آغازِ۱  محبّت  کا  بخیر  انجام۲  ہو

دل  لگا  کر  ہو  رہی  ہے  کیا  پشیمانی۳  مجھے

 

۱۔شروع  ۲۔آخر  ۳۔پچھتاوا

 

یہاں  انسانی  کمزوری  کا  ایک  لمحہ  ہے:  وہ  دعا  کر  رہا  ہے  کہ  اس  کی  محبت  کا  سفر  خیریت  سے  مکمل  ہو  جائے۔  وہ  قبول  کرتا  ہے  کہ  اس  کے  اندر  اب  ایک  پچھتاوا  اور  فکر  پیدا  ہو  رہی  ہے،  اور  وہ  سوچ  رہا  ہے  کہ  اتنی  تکلیف  دیکھنے  کے  بعد  کیا  دل  لگا  کر  اس  نے  کوئی  غلطی  تو  نہیں  کر  دی۔

۶

لو  لگی۱  ہے  یار  سے،  اپنی  طرف  کھینچے  گا  کیا

جلوۂ۲  نقش  و  نگارِ۳  عالمِ  فانی۴  مجھے

 

۱۔دل  لگانا،  رِشتہ  جوڑنا  ۲۔روشنی،  خوبصورتی  ۳۔رنگ  روپ،  گلکاری،  سجاوٹ  ۴۔چند  روزہ،  بے  ثبات

 

لو  لگنا”  کا  مطلب  ہے  گہرا  رشتہ  جُڑ  جانا۔  شاعر  اعلان  کرتا  ہے  کہ  اب  اس  کی  محبت  محبوب  سے  پکی  ہو  چکی  ہے۔  وہ  اس  خطرے  کو  رد  کرتا  ہے  کہ  اس  فانی  دنیا  کی  چمک  دمک  اسے  بھٹکا  سکتی  ہے  یا  اپنی  طرف  کھینچ  سکتی  ہے۔  اس  کا  مطلب  یہ  ہے  کہ  محبوب  روحانی  ہے  اور  دنیا  کی  چیزوں  سے  بہت  اوپر  ہے۔

۷

وحشیوں۱  کے  واسطے  قیدِ  لباس  اچھی  نہیں

زیب۲  دیتا  ہے  یہی  تشریفِ۳  عریانی۴  مجھے

 

۱۔پاگل،  جنونی  ۲۔موزوں،  سجاوٹ  ۳۔لباس  ۴۔ننگاپن

 

محبت  میں  پاگل/جنونی  لوگوں  (وحشیوں)  کے  لیے  سماج  کے  بنائے  ہوئے  کپڑے  ایک  قید  کی  طرح  ہیں۔  وہ  کہتا  ہے  کہ  یہ  “عریانی”  (ننگا  پن)  ۔  جو  کہ  دنیاوی  رتبے،  انا  اور  سماج  کے  طور  طریقوں  کو  چھوڑنے  کی  نشانی  ہے  ۔  ہی  وہ  لباس  ہے  جو  اس  کی  حالت  پر  جچتا  ہے۔  یہ  بالکل  مجنوں  یا  قیس  کی  تصویر  جیسا  ہے  جس  کا  ذکر  غالب  نے  کیا  تھا  ۔۔۔

شوق  ہر  رنگ  رقیبِ  سر  و  ساماں  نکلا
قیس  تصویر  کے  پردے  میں  بھی  عریاں  نکلا

۸

جوشِ۱  وحشت۲  میں  زمیں  پر  پاؤں  پڑنے  کا  نہیں

لے  اُڑے  گی  نکہتِ۳  گُل  کی  پریشانی۴  مجھے

 

۱۔اُمنگ  ۲۔پاگلپن،  شوق  کی  شِدّت  ۳۔خوشبو  ۴۔پھیلنا

 

اس  کا  جنون  اتنا  زیادہ  ہے  اور  کیفیت  ایسی  ہو  گئی  ہے  کہ  اس  کے  پاؤں  زمین  پر  نہیں  ٹکتے۔  وہ  اتنا  ہلکا  اور  روحانی  ہو  گیا  ہے  کہ  پھول  کی  بکھری  ہوئی  خوشبو  میں  بھی  اتنی  طاقت  ہے  کہ  وہ  اسے  ہوا  میں  اڑا  لے  جائے۔

۹

خاک  ہو  جانے  پہ  بھی  ممکن  نہ  ہوگا  دسترس۱

ہاتھ  مَلوائے۲  گی  تیری  پاک  دامانی۳  مجھے

 

۱۔ہاتھ  پہنچنا،  پکڑ  میں  آنا  ۲۔ہاتھ  مَلتے  رہ  جانا،  مایوس  ہونا  ۳۔دامن  بچا  کر  چلنا

 

موت  کے  بعد  جب  شاعر  مٹی  بن  جائے  گا،  تب  بھی  محبوب  اس  کی  پہنچ  سے  دور  رہے  گا۔  رواج  تو  یہ  ہے  کہ  جب  محبوب  چلتا  ہے  تو  عاشق  کی  خاک/مٹی  اس  کے  دامن  سے  لگ  جاتی  ہے۔  مگر  محبوب  کی  “پاک  دامانی”  (اپنے  دامن  کو  مٹی  سے  صاف  رکھنے  کی  عادت)  ایک  رکاوٹ  بن  جائے  گی  اور  عاشق  ہمیشہ  کی  طرح  ہاتھ  ملتا  رہ  جائے  گا۔

۱۰

درد  کا  ساغر  بھی  ساقی  میری  قسمت  میں  نہ  تھا

شوق  میں  کرنا  پڑا  آخر  لہو  پانی  مجھے

 

شاعر  اپنی  قسمت  پر  افسوس  کر  رہا  ہے  کہ  ساقی  نے  اسے  “درد  کا  پیالہ”  تک  نہیں  دیا،  شراب  یا  خوشی  تو  دور  کی  بات  ہے۔  اس  کے  بجائے  اسے  اپنی  ہی  زندگی  کی  طاقت  خرچ  کرنی  پڑی  ۔  اپنے  خون  کو  پانی  کرنا  پڑا  (شاید  خون  کے  آنسو  رونے  پڑے)  ۔  تاکہ  وہ  اپنے  جنون  کی  شدت  کو  محسوس  کر  سکے۔

۱۱

مردِ  جاہل۱  ہوں  کجا۲  میں  اور  کجا  اہلِ  کمال۳

یاسؔ۴  کیا  معلوم  اندازِ  غزل  خوانی  مجھے

 

۱۔اناڑی،  بیوقوف  ۲۔کہاں،  کِدھر  ۳۔اُستادی،  مہارت  ۴۔تخلّص

 

آخری  شعر  (مقطع)  میں  یگانہ  نے  اپنے  پرانے  تخلص  “یاسؔ”  کا  استعمال  کیا  ہے  اور  بڑی  طنز  بھری  اِنکساری  دکھائی  ہے۔  وہ  پوچھتا  ہے  کہ  مجھ  جیسے  “جاہل  مرد”  کا  بھلا  کمال  والے  لوگوں  سے  کیا  مقابلہ؟  وہ  کہتا  ہے  کہ  اسے  غزل  کہنے  کا  طریقہ  ہی  نہیں  معلوم،  حالانکہ  اوپر  کے  تمام  اشعار  یہ  ثابت  کرتے  ہیں  کہ  حقیقت  اس  کے  بالکل  الٹ  ہے۔  یہ  غزل  غالبؔ  کی  ایک  غزل  کی  زمین  میں  لکھی  گئی  ہے،  جو  ۱۹۰۹  کی  ہے،  اور  اِسے  عنوان  دیا  گیا  ہے  “بر  غزلِ  غالبؔ”  ۔  یگانہ  کے  “غالب  شکن”  ۱۹۳۴  بننے  سے  بہت  پہلے۔

 

अंदाज़-ए ग़ज़ल-ख़्वानी मुझे – मिर्ज़ा वाजेद हुसैन यास यागना चंगेज़ी

यार की तस्वीर ही दिखला दे अए मानी मुझे

कुछ तो हो इस नज़’अ की मुश्किल में आसानी मुझे

उफ़ भी कर सकता नहीं अब करवटें लेना कुजा

ज़ख़्म-ए पहलू से है वो तक्लीफ़-ए रूहानी मुझे

ज़ाहिद-ए मग़्रूर रोने पर मेरे हँसता है क्या

बख़्शवाएगा यही अश्क-ए पशेमानी मुझे

दिल को उस पर्दा-नशीं से ग़ा’एबाना लाग है

खींच लेगा एक न एक दिन जज़्ब-ए रूहानी मुझे

यारब, आग़ाज़-ए मोहब्बत का बख़ैर अंजाम हो

दिल लगा कर हो रही है क्या पशेमानी मुझे

लौ लगी है यार से, अपनी तरफ़ खींचेगा क्या

जल्वा-ए नक़्श ओ निगार-ए आलम-ए फ़ानी मुझे

वहशियों के वास्ते क़ैद-ए लिबास अच्छी नहीं

ज़ेब देता है यही तश्रीफ़-ए उर्यानी मुझे

जोश-ए वहशत में ज़मीं पर पाँव पड़ने का नहीं

ले उड़ेगी निक’हत-ए गुल की परेशानी मुझे

ख़ाक हो जाने पे भी मुमकिन न होगा दस्तरस

हाथ मलवाएगी तेरी पाक-दामानी मुझे

१०

दर्द का साग़र भी साक़ी मेरी क़िस्मत में न था

शौक़ में करना पड़ा आख़िर लहू पानी मुझे

११

मर्द-ए जाहिल हूँ कुजा मैं और कुजा अहल-ए कमाल

यास क्या मालूम अंदाज़-ए ग़ज़ल-ख़्वानी मुझे

 

 

मिर्ज़ा वाजेद हुसैन यास यागना चंगेज़ी (१८८४-१९५६) अज़ीमआबाद/पटना में पैदा हुए। शुरू में अपना तख़ल्लुस यास किया करते थे और बाद में यगाना के तख़ल्लुस से शे’र कहते थे। इन को ख़ुद पसंद, ज़िद्दी, हट धर्मी और बद-मिज़ाज समझा जाता था। दूसरे शो’अरा से दोस्ती ज़्यादा नहीं थी। इन्होंने अपने आप को ग़ालिब के आलोचक/critic की हैसियत में ढाल लिया और एक छोटी किताब ग़ालिब की आलोचना लिखी।  कुछ दिन अमीर लोगों के बच्चों को पढ़ा कर ज़िंदगी गुज़ारी, यही काम कल्कत्ते में किया लैकिन जल्द ही लखनऊ आ गये। स्कूल में, रिसाले की औत सरकारी नौकरिया करते रहे। लाहोर में भी कोशिश की।  फिर हैदराबाद (१९२८-१९४२) में सरकारी दफ़्तरी नौकरी करते रहे। वहां से वज़ीफ़ा (१५ रुपये माहाना) लेकर लखनऊ में रहने लगे। माली तंगी सहन करते रहे। १९४८ से जोश मलीहाबादी की फ़रमा’एश पर हिन्दुस्तानी सरकार से १०० रूपये माहाना मिलता रहा।  किसी दोस्त को चिट्ठी में आपत्तिजनक मज़्हबी/धार्मिक बातें लिखीं। उनके दोस्त ने उनकी चिट्ठी छपवा दी। उन के घर के बाहर एक मज्मा जमा’ हुआ और उन को पकड़ कर गधे पर बिठा दिया गया, मुंह काला करके शहर की गलियों में फिराया गया। उन्होंने अपनी साफ़-गोई हमेशा बरक़रार रखी।

यार की तस्वीर ही दिखला दे अए मानी मुझे

कुछ तो हो इस नज़’अ की मुश्किल में आसानी मुझे

 

१-प्रेमिका २-प्राचीन पारस का कलाकार ३-मरने का आख़री वक़्त

 

अपनी आख़िरी घड़ियों में, मौत के बिस्तर पर, शा’एर मुसव्विर /कलाकार (मानी) से कह रहा है के उसे महबूब की एक तस्वीर ही दिखा दे। रिवाज तो ये है के महबूब आख़िरी वक़्त में ख़ुद आशिक़ से मिलने आता है, मगर इस शा’एर को ऐसी कोई उम्मीद नहीं है। इस लिये वो चाहता है के महबूब का चेहरा—चाहे वो महज़ एक तस्वीर ही क्यूं न हो—देखकर उसकी निकलती हुई जान को थोड़ी राहत और आसानी मिल जाए।

उफ़ भी कर सकता नहीं अब करवटें लेना कुजा

ज़ख़्म-ए पहलू से है वो तक्लीफ़-ए रूहानी मुझे

 

१-घाव २-बाज़ू, सीना, दिल ३-आध्यात्मिक

 

शा’एर की तक्लीफ़ जिस्मानी हद से आगे निकल गई है। वो इतना कमज़ोर हो गया है के “उफ़” तक नहीं कर सकता, करवट लेना तो बहुत दूर की बात है। उसके पहलू (सीने/बदन) का ज़ख़्म अब सिर्फ़ जिस्म की चोट नहीं रहा बल्के एक रूहानी अज़ाब बन गया है। ये दर्द इतना ज़्यादा है के करवट बदलने से भी कम नहीं होगा, और वैसे भी वो इतने दर्द में है के न हिल सकता है और न आह भर सकता है।

ज़ाहिद-ए मग़्रूर रोने पर मेरे हँसता है क्या

बख़्शवाएगा यही अश्क-ए पशेमानी मुझे

 

१-उपदेशक, पंडित २-अभिमानी ३-क्षमा, मा’फ़ी, मुक्ति ४-आंसू ५-पछतावा, शर्मिंसगी

 

यगाना उस घमंडी ज़ाहिद (उपदेशक) का मज़ाक़ उड़ा रहे हैं जो उनके रोने पर हँसता है। ज़ाहिद को अपने सूखे रिवाजों और ग़ुरूर पर भरोसा है, मगर शा’एर को यक़ीन है के उसकी नजात (मुक्ति) उसके टूटे हुए दिल में है। ये शर्मिंदगी के आँसू (अश्क-ए पशेमानी) ही आख़िर में उसे ख़ुदा से माफ़ी दिलवाएंगे। जैसे एक़्बाल ने कहा था —

मोती समझ के शान-ए करीमी ने चुन लिये

क़तरे जो थे मेरे अरक़-ए इन्फ़े’आल के

दिल को उस पर्दा-नशीं से ग़ा’एबाना लाग है

खींच लेगा एक न एक दिन जज़्ब-ए रूहानी मुझे

 

१-जो पर्दे के पीछे हो – महबूब या ख़ुदा २-अंदेखा ३-जज़्बा, जुनून ४- आध्यात्मिक

 

शा’एर उस पर्दा-नशीं (ख़ुदा या कोई छुपा हुआ महबूब) से एक गहरे अनदेखे रिश्ते का ज़िक्र कर रहा है। उसे अपनी रूहानी कशिश (जज़्ब) पर पूरा भरोसा है; उसका मानना है के उसकी अंदरूनी तड़प इतनी ताक़तवर है के एक न एक दिन वो उसे किसी मक़नातीस (चुंबक) की तरह इस दुनिया से खींचकर उस छुपी हुई हक़ीक़त तक ले जाएगी।

यारब, आग़ाज़-ए मोहब्बत का बख़ैर अंजाम हो

दिल लगा कर हो रही है क्या पशेमानी मुझे

 

१-आरंभ २-अच्छा ३-अंत ४-डर, शंका

 

यहाँ इंसानी कमज़ोरी का एक लम्हा है: वो दुआ कर रहा है के उसकी मोहब्बत का सफ़र ख़ैरियत से मुकम्मल (पूरा) हो जाए। वो क़ुबूल करता है के उसके अंदर अब एक पछतावा और फ़िक्र पैदा हो रही है, और वो इतनी तक्लीफ़ देखने के बाद सोच रहा है के क्या दिल लगाकर उसने कोई ग़लती तो नहीं कर दी।

लौ लगी है यार से, अपनी तरफ़ खींचेगा क्या

जल्वा-ए नक़्श-ओ-निगार-ए आलम-ए फ़ानी मुझे

 

१-रिश्ता जोड़ना २-प्रेमिका, भगवान ३-चमक, सौंदर्य ४-श्रंगार, सजावट ५-दुनिया ६-अस्थायी

 

“लौ लगना” का मतलब है गहरा रिश्ता जुड़ जाना। शा’एर ए’लान करता है के अब उसकी मोहब्बत महबूब से पक्की हो चुकी है। वो इस ख़तरे को रद्द करता है के इस फ़ानी (नश्वर) दुनिया की चमक-दमक उसे भटका सकती है या अपनी तरफ़ खींच सकती है। इसका मतलब ये है के महबूब रूहानी है और दुनिया की चीज़ों से बहुत ऊपर है।

वहशियों के वास्ते क़ैद-ए लिबास अच्छी नहीं

ज़ेब देता है यही तश्रीफ़-ए उर्यानी मुझे

 

१-पागल, जुनूनी २-बंधन ३-वस्त्र ४-जचना ५-वस्त्र ६-नंगापन

 

मोहब्बत में पागल लोगों (वहशियों) के लिये समाज के बनाए हुए कपड़े एक क़ैद की तरह हैं। वो कहता है के ये “उर्यानी” (नंगापन)—जो के दुनियावी रुतबे, अना (अहंकार) और समाज के तौर-तरीक़ों को छोड़ने की निशानी है—ही वो लिबास है जो उसकी हालत पर जचता है। ये बिल्कुल मजनूँ या क़ैस की तस्वीर जैसा है जिसका ज़िक्र ग़ालिब ने किया था —

शौक़ हर रंग रक़ीब-ए सर‐ओ‐सामाँ निकला
क़ैस तस्वीर के पर्दे में भी उर्याँ निकला

जोश-ए वहशत में ज़मीं पर पाँव पड़ने का नहीं

ले उड़ेगी निक’हत-ए गुल की परेशानी मुझे

 

१-उत्साह, जुनून २-पागलपन, मोहब्बत ३-ख़ुश्बू ४-गुलाब, फूल ६-फैलना

 

उस का जुनून और कैफ़ियत इतनी ज़्यादा है के उसके पाँव ज़मीन पर नहीं टिकते। वो इतना हल्का और रूहानी हो गया है के फूल की बिखरी हुई ख़ुशबू (निक’हत-ए गुल) में भी इतनी ताक़त है के वो उसे हवा में उड़ा ले जाए।

ख़ाक हो जाने पे भी मुमकिन न होगा दस्तरस

हाथ मलवा’एगी तेरी पाक-दामानी मुझे

 

१-मिट्टी, राख २-संभव ३-हाथ पहुंचना, पकढना ४-हाथ मलना, निराश होना ५-दामन बचा कर चलना, बच कर निकल जाना

 

मौत के बाद जब शा’एर मिट्टी/ख़ाक बन जाएगा, तब भी महबूब उसकी पहुँच से दूर रहेगा। रिवाज तो ये है के जब महबूब चलता है तो आशिक़ की मिट्टी/ख़ाक उसके दामन से लग जाती है। मगर महबूब की “पाक-दामानी” (अपने दामन को मिट्टी से साफ़ रखने की आदत) एक रुकावट बन जाएगी और आशिक़ हमेशा की तरह हाथ मलता रह जाएगा।

१०

दर्द का साग़र भी साक़ी मेरी क़िस्मत में न था

शौक़ में करना पड़ा आख़िर लहू पानी मुझे

 

१-प्याला २-इच्छा, प्रेम ३-ख़ून

 

शा’एर अपनी क़िस्मत पर अफ़्सोस कर रहा है के साक़ी ने उसे “दर्द का प्याला” तक नहीं दिया, शराब या ख़ुशी तो दूर की बात है। इसके बजाए उसे अपनी ही ज़िंदगी की ताक़त ख़र्च करनी पड़ी—अपने ख़ून को पानी करना पड़ा (शा’एद ख़ून के आँसू रोने पड़े)—ताके वो अपने जुनून की शिद्दत को महसूस कर सके।

११

मर्द-ए-जाहिल हूँ कुजा मैं और कुजा अहल-ए-कमाल

यास क्या मालूम अंदाज़-ए ग़ज़ल-ख़्वानी मुझे

 

१-अज्ञानी पुरुष २-कहां, किधर ३-उत्तम/कुशल लोग ४-उपनाम ५-शैली, ढंग ६-ग़ज़ल लिखना/सुनाना

 

आख़िरी शेर (मक़्ता) में यगाना ने अपने पुराने तख़ल्लुस “यास” का इस्तेमाल किया है और बड़ी तंज़ भरी इन्केसारी (ironic humility) दिखाई है। वो पूछता है के मुझ जैसे “जाहिल मर्द” का भला कमाल वाले लोगों से क्या मुक़ाबला? वो कहता है के उसे ग़ज़ल कहने का तरीक़ा ही नहीं मालूम, हालाँके ऊपर के तमाम शे’र ये साबित करते हैं के हक़ीक़त इसके बिल्कुल उलट है। ये ग़ज़ल ग़ालिब की एक ग़ज़ल की ज़मीन में लिखी गई है, जो १९०९ की है—यगाना के “ग़ालिब शिकन” १९३४ में लिखी।

 

andaaz-e Ghazal-Khwaani mujhe – mirza vaajid husain yaas yagaana chaNgezi
1
yaar ki tasviir hi dikhla de aye maani mujhe
kuchh to ho is naz’a ki mushkil meN aasaani mujhe
2
uff bhi kar sakta nahiN ab karvaTeN lena kuja
zaKhm-e pahlu se hai vo takliif-e roohaani mujhe
3
zaahid-e maGhroor ron’e par mere haNsta hai kya
baKhshvaa’ega yahi ashk-e pashemaani mujhe
4
dil ko us parda-nashiiN se Ghaa’ebaana laag hai
khiiNch lega ek na ek din jazb-e roohaani mujhe
5
yaarab, aaGhaaz-e mohabbat ka baKhair anjaam ho
dil laga kar ho rahi hai kya pashemaani mujhe
6
lau lagi hai yaar se, apni taraf khiiNchega kya
jalva-e naqsh o nigaar-e aalam-e faani mujhe
7
vahshiyoN ke vaaste qaid-e libaas achhi nahiN
zeb deta hai yahi tashriif-e uryaani mujhe
8
josh-e vahshat meN zamiiN par paauN paRne ka nahiN
le uRegi nik’hat-e gul ki pareshaani mujhe
9
Khaak ho jaane pe bhi mumkin na hoga dastras
haath malvaa’egi teri paak-daamani mujhe
10
dard ka saaGhar bhi saaqi meri qismat meN na tha
shauq meN karna paRaa aaKhir lahuu paani mujhe
11
mard-e jaahil huN kuja maiN aur kuja ahl-e kamaal
yaas kya maaluum andaaz-e Ghazal-Khwaani mujhe

mirza vaajid husain yaas yagaana changezi (1884-1956), aziimabad/paTna. Early pen-name ‘yaas’ (despair) and later ‘yagaana’ (unmatched, unique).   Egotistical, uncompromising, brusque and acerbic, he did not get along with fellow poets. For some reason he cast himself as a critic of Ghalib.  He got a booklet published in which there is a lengthy preface critical of Ghalib and of his many admirers, followed by many rubaaii deriding Ghalib. He tried to make a living tutoring children of rich people, trying the same thing in kalkatta.  But soon he came to lucknow and tried working as a teacher, editor and in the government.  He even tried his hand in lahore; tried publishing a magazine.  Finally (1928-1942) he moved to hyderabad state working in clerical/administrative positions. Retired on a pension of 15 rupees per month and settled in lukhnau.  Financial difficulties continued, until 1948, when on the recommendation of josh malihabadi he was awarded 100 rupees a month by the govt of India, which continued for his lifetime.  He made some controversial statements about religious belief in a private letter to a ‘friend’, who exposed him and published the letter.  He was attacked by a mob, made to ride a donkey through town, sitting backwards, with his face blackened.  He remained outspoken to the end.
1
yaar1 ki tasviir hi dikhla de aye maani2 mujhe
kuchh to ho is naz’a3 ki mushkil meN aasaani mujhe

1.friend, beloved 2.ancient Persian painter 3.death struggle

In his final moments (naz’a), on his death bed, the poet calls upon the painter (maani) to show him a portrait of his beloved. It is customary for the beloved to visit the lover on his death bed.  But this poet has no such expectation.  Thus, he hope that the sight of the beloved’s face-even if just a representation-can offer some respite or “ease” to his departing soul.
2
uff bhi kar sakta nahiN ab karvaTeN1 lena kuja
zaKhm-e pahlu2 se hai vo takliif3-e roohaani4 mujhe

1.changing sides, tossing and turning 2.side, bosom, chest 3.pain 4.spiritual

The poet’s suffering has moved beyond the physical. He is so debilitated that even a sigh (uff) is impossible, let alone turning his body. The “wound in his side/bosom” has transitioned from a bodily injury into a spiritual or “soulful” torment.  It is so intense that tossing and turning will not relieve it and in any case, he is no much pain that he cannot turn or even sigh.
3
zaahid1-e maGhroor2 ron’e par mere haNsta hai kya
baKhshvaa’ega3 yahi ashk4-e pashemaani5 mujhe

1.preacher 2.proud 3.get salvation/forgiveness 4.tears 5.repentence, regret

yagaana mocks the arrogant preacher (zaahid) who looks down on his weeping. While the preacher relies on his dry rituals and pride, the poet believes his own salvation lies in his brokenness. It is these very tears of sincere repentance (pashemaani) that will ultimately earn him divine forgiveness.  Said mohammed iqbal ….
moti samajh ke shaan-e kariimi ne chun liye
qatr’e jo th’e mere araq-e infe’aal ke
4
dil ko us parda-nashiiN1 se Ghaa’ebaana2 laag3 hai
khiiNch lega ek na ek din jazb4-e roohaani5 mujhe

1.veiled 2.hidden 3.attachment 4.short for jazba emotion 5.spiritual

The poet describes a deep, “unseen” attachment to the veiled one (the divine or a hidden beloved). He trusts in the power of spiritual attraction (jazb); he believes that his internal yearning is so strong that it will eventually act like a magnet, pulling him out of this world toward that hidden reality.
5
yaarab1, aaGhaaz2-e mohabbat ka baKhair3 anjaam4 ho
dil laga kar ho rahi hai kya pashemaani5 mujhe

1.lord, god 2.beginning 3.good, happy 4.result, ending 5.regret, shame

A moment of human vulnerability: he prays for a “safe” conclusion/fulfilment to this journey of love. He admits to a burgeoning sense of regret or anxiety (pashemaani), wondering if he has made a mistake by giving his heart away, given the sheer weight of the suffering it has brought.
6
lau lagi1 hai yaar2 se, apni taraf khiiNchega kya
jalva3-e naqsh-o-nigaar4-e aalam5-e faani6 mujhe

1.getting attached 2.friend, beloved 3.manifestation, glory 4.adornment 5.world 6.mortal, fleeting

lau lagnaa is to become attached.  The poet declares that now his feelings of love are attached to the beloved. He dismisses the danger that the temporary beauty and decorations of this “transient world” (aalam-e faani) have the power to distract him or pull him away from his singular devotion.  This implies that the beloved is the divine/spiritual and beyond material attractions.
7
vahshiyoN1 ke vaaste qaid2-e libaas3 achhi nahiN
zeb4 deta hai yahi tashriif5-e uryaani6 mujhe

1.wild, passionate 2.confinement 3.garments 4.suits, fits 5.garments 6.nakedness

For those “crazed” by love (vahshiyoN), the social requirement of clothing is a prison. He argues that “nakedness” (uryaani) – symbolizing the shedding of worldly status, ego, and societal norms – is the only garment that truly honors or “suits” his state of being.  This is much like the conventional picture of manjuN/qais as in Ghalib’s sh’er ….
shauq har-raNg raqiib-e sar-o-saamaaN niklaa
qais tasviir ke parde meN bhii uryaaN niklaa
8
josh1-e vahshat2 meN zamiiN par paauN paRne ka nahiN
le uRegi nik’hat3-e gul4 ki pareshaani5 mujhe

1.passion 2.madness 3.fragrance 4.rose 5.scattering, spreading

His madness/ecstasy is so intense that it blows him off his feet – his feet no longer touch the ground. He suggests that he has become so ethereal that even the “spreading” or “scattering” scent of a flower (nik’hat-e gul) is enough of a force to carry him away into the air.
9
Khaak1 ho jaane pe bhi mumkin2 na hoga dastras3
haath malvaa’egi4 teri paak-daamani5 mujhe

1.dust 2.possible 3.reach, grasp 4.rubbing hands as in regret 5.cleanliness of the garment hem, fastidiousness, scrupulousness

Even after death, when the poet has turned to dust, he believes the beloved will remain out of reach. Convention is that when the beloved walks the dust of the dead lover will rise to the hem of her garment.  But the beloved’s “purity” or “virtue”; her ability to keep her daaman paak – clean of dust, (paak-daamani) acts as a barrier that will leave him wringing his hands in perpetual longing.
10
dard1 ka saaGhar2 bhi saaqi meri qismat meN na tha
shauq3 meN karna paRaa aaKhir lahuu4 paani mujhe

1.pain 2.cup, goblet 3.desire, love 4.blood

The poet laments his luck, noting that even the “cup of pain” wasn’t handed to him by the cupbearer, leave aside a cup of wine/pleasure. Instead, he had to use his own life force – to “turn his blood into water” – perhaps cry tears of blood – just to experience the intensity of his passion.
11
mard-e-jaahil1 huN kuja2 maiN aur kuja ahl-e-kamaal3
yaas4 kya maaluum andaaz5-e Ghazal-Khwaani6 mujhe

1.ignorant man 2.where 3.people of excellence 4.pen-name 5.style 6.Ghazal composing

In the traditional maqta (closing verse), yagaana uses his earlier taKhallus (yaas) to display a sharp, ironic humility. He asks how an “ignorant man” like himself could possibly be compared to the “people of perfection.” He claims to know nothing of the true art of the Ghazal, though the brilliance of the preceding verses proves exactly the opposite.  This Ghazal is titled bar Ghazl-e Ghalib and is in the zamiin of Ghalib’s Ghazal.  It is dated 1909, early in the career of yagaana and long before he wrote Ghalib shikan in 1934.